"एलजीबीटी समुदाय का इंसान भी हमारे जैसा ही है" -फराज अंसारी
Sarita|October First 2021
सिनेमा में फराज अंसारी एलजीबीटीक्यू समुदाय के चित्रण को ले कर विशेष समझ रखते हैं. उन का मानना है कि एक 'गे' फिल्मकार ही सिनेमा में 'गे' किरदार को असल न्याय दे सकता है. इसीलिए समाज की समलैंगिकता, स्त्री व मुसलिम विरोधी प्रकृति को उजागर करने के मकसद से वे फिल्म 'शीर कोरमा' ले कर आए हैं.
शांतिस्वरूप त्रिपाठी

1996 में जब फिल्म 'फायर आई थी, उस वक्त फिल्म के पोस्टर पर 2 महिला कलाकारों को एकदूसरे के प्यार में खोए हुए देखा गया था और अब 25 वर्षों बाद 'शीर कोरमा' के पोस्टर में लोग ऐसा देख रहे हैं. यह महज संयोग है कि इन दोनों फिल्मों में शबाना आजमी हैं. 25 वर्षों बाद यह साहस फिल्मसर्जक फराज अंसारी ने दिखाया है.

लेखक, निर्माता, निर्देशक, अभिनेता फराज अंसारी कभी खुद डिस्लैस्किया से पीड़ित रहे हैं और 'डिस्लैक्सिया' पर अमेरिका में एक लघु फिल्म भी बनाई थी. उसी के चलते मुंबई में उन्हें 'डिस्लैक्सिया' पर आधारित आमिर खान व दर्शील सफारी वाली फिल्म 'तारे जमीं पर' में एसोसिएट डायरैक्टर के रूप में काम करने का अवसर मिला. उस के बाद फराज अंसारी ने बतौर एसोसिएट निर्देशक फिल्म 'स्टेनली का डिब्बा' भी की. फिर स्वतंत्ररूप से काम करते हुए भारत की एलजीबीटीक्यू प्रेम कहानी पर मूक फिल्म 'सिसक' बनाई, जिसे 60 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया था.

अब उन्होंने समाज की समलैंगिकता, स्त्री विरोधी और प्रतिगामी प्रकृति को उजागर करने के मकसद से फिल्म 'शीर कोरमा' का लेखन, निर्माण व निर्देशन किया है. 'शीर कोरमा' एलजीबीटीक्यू समुदाय पर बनी पहली फिल्म है जिस में सारे किरदार औरतें हैं. फिल्म की कहानी एक मुसलिम परिवार से आने वाली लेस्बियन महिलाओं के इर्दगिर्द घूमती है जो एकदूसरे से प्यार करती हैं.

फिल्म 'शीर कोरमा' कई वर्जनाओं को चुनौती देती है और कुछ समुदायों या लोगों के समूहों को सौंपी गई रूढ़ियों को तोड़ने की कोशिश करती है. शबाना आजमी, दिव्या दत्ता और स्वरा भास्कर के अभिनय से सजी फिल्म 'शीर कोरमा' ने पूरे विश्व के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में न सिर्फ हंगामा बरपा रखा है बल्कि 10 से अधिक पुरस्कार भी हासिल कर लिए हैं. हाल ही में फिल्म 'शीर कोरमा' को इंडियन फिल्म फेस्टिवल औफ मेलबर्न (आईएफएफएम) में 'इक्वैलिटी इन सिनेमा' के अवार्ड से नवाजा गया.

फराज ने अमेरिका में रहते हुए डिस्लैक्सिया पर एक लघु फिल्म बनाई थी. जब उन से पूछा गया कि वहां काम के दौरान बच्चों के साथ जो कुछ उन्होंने सीखा, क्या वह 'तारे जमीं पर' भी काम आया. इस पर वे बताते हैं, "उस सीख ने मेरी बेहिसाब मदद की. भारत में बच्चों के साथ काम करने की समझ ही नहीं है. बच्चों से अभिनय कराने के लिए सब से पहले खुद एक इंसान बनना पड़ता है. आप अच्छे इंसान न हों तो भी आप को अच्छा इंसान बनना पड़ता है.

"इस के अलावा, बच्चों का दोस्त बनना पड़ता है. आप बच्चों के साथ निर्देशक जैसा व्यवहार नहीं कर सकते. आप को उन के स्तर पर जा कर उन की भाषा में बात करनी पड़ती है. इस का मुझे ज्ञान था.

फिल्म 'तारे जमीं पर' में आमिर को ले कर फराज कहते हैं, “आमिर खान फिल्म में इंटरवल के बाद आते हैं. फिल्म की कहानी तो दर्शील सफारी के बारे में थी. आमिर खान के आने से फिल्म में स्टार पावर आ गया था. इस ने फिल्म को ज्यादा लोगों तक पहुंचाया. फिर आमिर खान बेहतरीन कलाकार हैं."

पर जब उन से कहा गया कि कुछ लोगों की राय में फिल्म 'तारे जमीं पर' का माइनस पौइंट आमिर खान थे तो वे कहते हैं, "फिल्म देखने से पहले यूएसपी आमिर खान थे. मगर फिल्म देखने के बाद लोगों को फिल्म की यूएसपी दर्शील सफारी नजर आया. फिल्म देख कर लोगों की अपने बच्चों के प्रति सोच बदली."

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