गरमाती धरती कहर के करीब
Sarita|August Second 2021
कहीं बाढ़, कहीं भयंकर गरमी, कहीं सूखा तो कहीं बेमौसम बारिश. दुनियाभर में एकसाथ मौसम के कई रूप देखे जा रहे हैं. यह सब बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का नतीजा है. अगर जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले बदलाव यों ही जारी रहे तो सदी के अंत तक भारत के भी कई हिस्से समुद्र में समा जाएंगे.
नसीम अंसारी कोचर

प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि दुनियाभर में देखी जा रही है. अमेरिका और रूस के जंगलों में भयानक आग दहक रही है और पश्चिमी यूरोप के हिस्से विनाशकारी बाढ़ से प्रभावित हैं. इन में अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं. स्विट्जरलैंड, लक्जमबर्ग और नीदरलैंड्स ने भी भारी बारिश की मार झेली है.

मध्य चीन के कुछ हिस्सों में मूसलाधार बारिश के कारण भयंकर बाढ़ आई हुई है. हेनान प्रांत में अभूतपूर्व बारिश से हालात बिगड़ गए हैं. हेनान की राजधानी झेंगझाउ में बाढ़ के कारण 60 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं. यह चीन में 1,000 वर्षों में हुई अब तक की सब से भारी बारिश है.

इटली, रोमानिया जैसे देशों में आबादी को भंयकर गरमी की मार पड़ रही है. कनाडा जैसा ठंडा क्षेत्र गरमी की मार झेल रहा है. पिछले वर्ष यूरोप में गरमी से करीब एक लाख 40 हजार लोग प्रभावित हुए थे. आने वाले वक्त में परिस्थितियां और भी ज्यादा बुरी होंगी.

बीते साल अमेरिका में कैलिफोर्निया के जंगल आग की ऊंचीऊंची लपटों में घिरे रहे. आग तब भड़की जब पश्चिम में तापमान अत्यधिक बढ़ गया. आजकल अमेरिकी राज्य ओरेगन के जंगलों में आग लगी हुई है. इसे देश की सब से भयावह आग बताया जा रहा है. इस आग की चपेट में जंगल की 3 लाख एकड़ जमीन आ चुकी है. अमेरिका के अलगअलग 13 राज्यों में 80 जगहों पर आग लगी है. हीटवेव और तेज हवाओं के कारण लगी आग पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है जो स्थिति को खतरनाक बनाता जा रहा है.

आस्ट्रेलिया के लिए जंगलों में भी आग लगना कोई नई बात नहीं है. बढ़ते तापमान और सूखे की वजह से आस्ट्रेलिया के अलगअलग हिस्सों के जंगलों में कई बार आग भड़क चुकी है. बीते साल करीब 5 महीने तक जलती रही आग में 50 करोड़ से ज्यादा जानवरों की मौत हुई है. आग कितनी भयावह थी इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस आग से एक लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जल कर राख हो गया.

वहीं, जरमनी के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं और वहां 160 से ज्यादा लोग अब तक बाढ़ के कारण जान गंवा चुके हैं. सौ से ज्यादा लोग लापता हैं. जरमनी की चांसलर एंजेला मार्केल भीषण बाढ़ की त्रासदी से अपने लोगों को बचाने व उन की हिम्मत बढ़ाने के लिए लगातार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर रही हैं.

उन का कहना है कि 700 सालों में यह जरमनी में सब से बुरी बाढ़ है. बेल्जियम में भी बाढ़ की चपेट में आ कर 31 लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लापता हैं. दुनिया का कोई भी कोना ऐसा नहीं बचा है जहां मौसम के मिजाज में परिवर्तन न हो रहा हो. कहीं धीमे तो कहीं बहुत तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है जिस के चलते जीवजंतु, वनस्पति, मनुष्य और पक्षी सभी प्रभावित हैं.

वजह है ग्लोबल वार्मिंग

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है ग्रीनहाउस गैसों (कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऔक्साइड और मीथेन) के कारण पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोतरी होना. इसे सब से पहले न्यूजर्सी के साइंटिस्ट वैली ब्रोएक्केर ने परिभाषित किया था. ये गैसें वाहनों, कारखानों और अन्य कई स्रोतों से उत्सर्जित होती हैं. ये खतरनाक गैसें पृथ्वी के वातावरण में मिल कर तापमान में वृद्धि कर रही हैं.

आज हमारी धरती ताप युग के जिस मुहाने पर खड़ी है, उस विभीषिका का अनुमान काफी पहले से ही किया जाने लगा था. इस तरह की आशंका सर्वप्रथम 20वीं सदी के प्रारंभ में आर्हीनियस एवं थोमस सी चेम्बरलीन नामक 2 वैज्ञानिकों ने की थी. किंतु इस का अध्ययन 1958 से ही शुरू हो पाया. तब से कार्बन डाइऑक्साइड की सघनता का विधिवत रिकौर्ड रखा जाने लगा. भूमंडल के गरमाने के ठोस सुबूत 1988 से मिलने शुरू हुए. नासा के गोडार्ड इंस्टिट्यूट औफ स्पेस स्टडीज के जेम्स ईण्हेन्सन ने 1960 से ले कर 20वीं सदी के अंत तक के आंकड़ों से निष्कर्ष निकाला है कि इस बीच धरती का औसत तापमान 0.5 से 0.7 डिग्री सैल्सियस बढ़ गया है.

भारत में सैंटर फौर साइंस एंड एनवायरनमैंट के सीनियर डायरैक्टर सुपर्णो बनर्जी कहते हैं, "ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप पृथ्वी पर जलवायु बहुत तेजी से गरम हो रही है जिस का पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. जलवायु परिवर्तन से जगहजगह तूफान, बाढ़, जंगलों में आग, सूखा और लू के खतरे, उष्णकटिबंधीय चक्रवात बढ़ते ही जा रहे हैं. इस के अलावा वन्य जीवों का विलुप्त होना, जीवों के आचरण में बदलाव, उन के प्रवास स्थलों का बदलना जैसी बातें सामने आ रही हैं.

सुपर्णो बनर्जी आगे कहते हैं, “वातावरण में गरमी बढ़ने पर वायुमंडल समुद्रों से अधिक पानी एकत्र कर लेता है जिस के कारण भयंकर बारिश और सैलाब का मंजर पैदा होता है. दूसरी ओर, ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र के जलस्तर में लगातार वृद्धि हो रही है. यह वृद्धि 2 तरीकों से हो रही है. एक ओर गरम तापमान के कारण ग्लेशियर और भूमि आधारित बर्फ की चादरें पिघल रही हैं और यह पानी समुद्र में जा रहा है.

"दूसरी ओर, ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री सतह का तापमान भी बढ़ रहा है क्योंकि पृथ्वी के वातावरण की अधिकांश गरमी समुद्र द्वारा अवशोषित होती है. गरम समुद्री सतह के कारण तूफान का बनना आसान हो जाता है. तूफान से वर्षा की दर बढ़ती है जिस से दुनियाभर में सैलाब की त्रासद घटनाएं हो रही हैं.

"धरती के जो हिस्से समुद्र के किनारे हैं वे धीरे धीरे पानी में समा रहे हैं. बंगाल के सुंदरवन के डेल्टा के आसपास के द्वीप डूब रहे हैं. ओडिशा के तटीय गांव डूब गए हैं और सरकार गांव वालों से उस डूबी भूमि का भूटैक्स चार्ज कर रही है जो गांव हैं ही नहीं. यही हाल कोलकाता, मुंबई और चेन्नई आदि का होने वाला है.

सिकुड़ते ग्लेशियर

पृथ्वी पर लगभग एक लाख 98 हजार ग्लेशियर हैं जो करीब 7 लाख 26 हजार स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं. हमारी जलवायु काफी हद तक ग्लेशियरों पर निर्भर करती है तो वहीं साफ पानी का सब से बड़ा स्रोत ग्लेशियर ही हैं. ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं और इस के भयावह परिणाम दुनियाभर में नजर आने लगे हैं.

आइसलैंड के सब से प्राचीन ग्लेशियरों में से एक 'ओकजोकुल ग्लेशियर' पूरी तरह सूख चुका है. 700 साल से ज्यादा पुराने उस ग्लेशियर से ग्लेशियर का दर्जा तक ले लिया गया है. यह असर जलवायु परिवर्तन के कारण ही हुआ. 2 अगस्त, 2019 को आइसलैंड के इतिहास में एक दिन में सब से ज्यादा व तेज बर्फ पिघलने की घटना दर्ज की गई थी. उस दिन वहां 24 घंटे में 12.5 बिलियन टन बर्फ की चादर पिघल गई.

'नेचर क्लाइमेट चेंज' जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, आर्कटिक की बर्फ समय से पहले पिघल रही है और वसंत के दौरान पौधों में पत्ते जल्दी आ रहे हैं. साथ ही, टुंड्रा वनस्पति नए क्षेत्रों में फैल रही है. एक तरह से आर्कटिक में तेजी से तापमान में बदलाव आ रहा है. इस से हरियाली को पनपने में मदद मिल रही है.

नासा की सैटेलाइट तसवीरें बताती हैं कि अंटार्कटिका में बर्फ की चादर के नीचे 130 झीलों का निर्माण हो चुका है. वहां बर्फ का रंग बदल रहा है. उन इलाकों में समुद्री एल्गी उग रही है जिस से बर्फ का रंग हरा पड़ने लगा है. वैज्ञानिक ग्रीनलैंड को ले कर भी चेतावनी जारी कर चुके हैं. उन का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन ऐसे ही जारी रहा तो एक दिन ग्रीनलैंड केवल घास का मैदान बन कर रह जाएगा.

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वर्ष 2100 तक 80 फीसदी ग्लेशियर पिघल कर सिकुड़ सकते हैं और समुद्र का स्तर 2100 तक 2000 के स्तर से 8 फुट से अधिक बढ़ सकता है.

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