मोदी सरकार और मीडिया
Sarita|August Second 2021
सत्ताधारियों के साथ मिल कर मीडिया का गला दबाने का जो कृत्य मीडिया ने ही किया है उस की सचाई तरहतरह की रिपोर्टों से सामने आ रही है. सत्ता की शह पर देश में सूचनाओं के जाल को योजनाबद्ध तरीके से कुतरा जा रहा है और खास तरह की सूचनाओं को ही प्रसारित किया जा रहा है.
रोहित

हाल ही में दुनियाभर में प्रैस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'रिपोर्ट्स विदाउट बौर्डर्स' ने 37 ऐसे राष्ट्राध्यक्षों यानी सुप्रीम नेताओं के नाम प्रकाशित किए जो उन के मुताबिक, प्रैस की आजादी पर लगातार हमले कर रहे हैं. ऐसे नेताओं को प्रैस की आजादी के लिए पूरी दुनिया में सब से ज्यादा खतरनाक माना गया. इस लिस्ट में 2 दशकों से ज्यादा समय से प्रैस का दमन करने वाले पुराने नेताओं के नाम तो थे ही, साथ ही, नेताओं की नई खेप भी जोड़ी गई. यानी सीधा मतलब है कि हाल के वर्षों में विश्व में बोलने की आजादी पर बाधा डालने वालों की नई खेप पैदा हुई.

7 जुलाई को अपडेट की गई यह लिस्ट 'रिपोर्ट्स विदाउट बौर्डर्स' (आरएसएफ) द्वारा 5 वर्षों बाद जारी की गई. इस से पहले यह 2016 में जारी की गई थी. इस रिपोर्ट के अनुसार, जारी की गई 37 नेताओं की लिस्ट में से 17 नाम पहली बार जोड़े गए. हमारे देश के लिए ध्यान देने वाली बात यह है कि इन नए जोड़े गए नामों में एक नाम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है.

रिपोर्ट में कहा गया कि इन नेताओं ने न सिर्फ अभिव्यक्ति पर रोक लगाने का प्रयास किया है बल्कि पत्रकारों को मनमाने ढंग से जेल भी भेजा है. इस लिस्ट में 19 देशों को लाल रंग से दिखाया गया, यानी इन देशों को पत्रकारिता के लिहाज से खराब माना गया. जबकि, 16 देशों को काले रंग से दिखाया गया, जिस का अर्थ उन देशों में स्थिति बेहद चिंताजनक है.

खास बात यह रही कि इस लिस्ट में नेताओं के प्रैस पर नियंत्रण लगाने के तौरतरीकों का विवरण भी जारी किया गया जिस में नेताओं के यूनीक तरीकों के बारे में ब्योरेवार बताया गया. आरएसएफ के महासचिव क्रिस्टोफ डेलौयर ने कहा, "इन में से प्रत्येक नेता की अपनी विशेष शैली है. कुछ सत्ताधारी नेता तर्कहीन और अजीबोगरीब आदेश जारी कर मीडिया की आवाज कुचलते हैं. कुछ शासक कठोर कानूनों के आधार पर सावधानीपूर्वक बनाई गई रणनीति अपनाते हैं. हमें उन के तरीकों को सामान्य नहीं बनने देना चाहिए.

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा सूची में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान, श्रीलंका के राष्ट्रपति गोताबया राजपक्षे, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नाम उल्लेखनीय हैं. लिस्ट में उन के नाम भी रहे जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तानाशाही का परिचायक माना गया है. उत्तरी कोरिया के किम जोंग-उन को हम घरबैठे भूरिभूरि गालियां देते रहे हैं, आज उसी के समतुल्य प्रधानमंत्री मोदी भी खड़े हैं.

इस लिस्ट में 2 महिला नेताओं के नाम भी जोड़े गए. ये दोनों एशिया की हैं. एक हौंगकौंग की चीफ एग्जीक्यूटिव कैरीलैम, जो 2017 से चीन सरकार द्वारा हौंगकौंग में स्थापित की गई हैं और शी जिनपिंग की कठपुतली की तरह शासन कर रही हैं. दूसरी, बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना, जो 2009 से देश की बागडोर संभाल रही हैं और अपने कार्यकाल में 70 से अधिक पत्रकारों पर मुकदमा चलवा चुकी हैं.

मोदी के संबंध में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम पहली बार इस सूची में शामिल किया गया है. यहां तक कि उन के 2014 में कार्यभार संभालने के बाद से उन्हें मीडिया की आजादी पर रोक लगाने वाला समझा गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में आरएसएफ का कहना है कि मोदी का प्रमुख हथियार उन के अरबपति व्यवसायियों के साथ घनिष्ठ मित्रता होना है. ये वे व्यवसायी भी हैं जिन के पास विशाल मीडिया साम्राज्य हैं. मोदी अपनी राष्ट्रीय लोकलुभावन विचारधारा को सही ठहराने के लिए भाषणों और सूचनाओं के फैलाव के लिए इन मीडिया साम्राज्यों का इस्तेमाल करते हैं.

यह रणनीति 2 तरह से काम करती है. एक, प्रमुख मीडिया आउटलेट्स के मालिकों के साथ प्रत्यक्षरूप से खुद को जोड़ना. दूसरे, इन मीडिया आउटलेट्स में विभाजनकारी और अपमानजनक भाषणों या सूचनाओं को प्रमुखता से कवरेज देना, ऐसी सूचनाएं जो दुष्प्रचार से भरी रहती हैं.

इस के बाद मोदी के लिए जो कुछ बचा है, वह उन मीडिया आउटलेट्स और पत्रकारों को बेअसर करना है जो उन के विभाजनकारी तरीकों पर सवाल उठाते हैं. सवाल उठाने वाले पत्रकारों को बेअसर करने के लिए मोदी कानूनी प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं, जिस में गंभीर कानूनों के सहारे ऐसे पत्रकारों के खिलाफ षड्यंत्र चलाए जाते हैं, जिस में सर्वाधिक कोशिश ऐसे पत्रकारों को मानसिक यातनाएं देने की होती है. उदाहरण के लिए, पत्रकारों पर राजद्रोह के झूठे आरोपों के तहत उन्हें आजीवन कारावास की संभावना की तरफ धकेलना है.

गौरी लंकेश, जिन्हें सितंबर 2017 में उन के घर के बाहर गोली मार दी गई थी, इस बात का सब से सटीक उदाहरण है क्योंकि वे हिंदुत्व कट्टरपंथी राजनीति पर सवाल उठा रही थी. आरएसएफ का मानना है कि "एक नियम के रूप में, कोई भी पत्रकार या मीडिया आउटलेट यदि प्रधानमंत्री की राष्ट्रीयलोकलुभावन विचारधारा पर सवाल उठाता है, तो उसे जल्दी से 'सिकुलर' के रूप में बैंडेड किया जाता है.''

'सिकुलर' शब्द को समझे जाने की जरूरत है. यह शब्द कट्टरपंथी संगठनों द्वारा प्लांट किया गया है. यह 'सिक' और 'सैक्युलर' से मिल कर बनाया गया है. जिस का अर्थ है 'बीमार धर्मनिरपेक्ष'. दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा गढ़ा गया 'सिकुलर' शब्द उन लोगों को टारगेट करता है जो लोग सामाजिक भाईचारे और भारतीय संविधान की बात करते हैं. दक्षिणपंथी संगठन आमतौर पर इस शब्द का इस्तेमाल 'भक्तों को अपने नियंत्रण में बने रहने के लिए करते हैं. फिर यही भक्त' पूरा दिन सोशल मीडिया पर उन लोगों को टारगेट करते हैं जो आपसी सद्भाव की बात करते हैं.

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