पश्चिम परेशान चढ़ता चीन
Sarita|July First 2021
चीन से निकले कोरोना वायरस की दहशत ने दुनिया का चक्का जाम कर रखा है. कामधंधे ठप हैं, व्यापार चौपट हैं और लगभग हर देश अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को ले कर चिंतित है. मगर आश्चर्यजनक रूप से चीन ने न सिर्फ कोरोना पर पूरी तरह काबू पा लिया बल्कि 2021 की पहली तिमाही में उस की अर्थव्यवस्था ने गजब का उछाल दर्ज किया है. दुनिया को पीछे छोड़ती चीन के विकास की बुलेट ट्रेन जिस रफ्तार से भाग रही है उस ने अमेरिका और यूरोप की चिंता बढ़ा दी है. भारत तो अब कहीं है ही नहीं.
नसीम अंसारी कोचर

40 वर्षों में चीन की शानदार आर्थिक और सैन्य वृद्धि के बाद उस का मनमाना रवैया और हर क्षेत्र में चीन का बढ़ता वर्चस्व अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है. दुनियाभर के बाजारों पर चीन का कब्जा, बंदरगाहों पर चीनी फौजों का जमावड़ा, उस के परमाणु हथियारों की बढ़ती ताकत, चीनी कर्जे में डूबते जा रहे विकासशील देश, लगातार अपनी सीमाओं को नाजायज तरीके से बढ़ाने की कोशिश और इस सब के बीच अचानक चीन से शुरू हुआ कोरोना बम विस्फोट.

चीन में यह कब, कैसे और कहां पैदा हुआ, इस का जवाब देने के लिए चीन तैयार नहीं है. वह इस बात की जांच भी नहीं होने देना चाहता है. चीन अपनी लैब में अमेरिकी चिकित्सकों व वैज्ञानिकों की टीम को घुसने की इजाजत देने को तैयार नहीं है. चीन की इस हरकत से अमेरिका का पारा चढ़ा हुआ है. बीते माह दक्षिणपश्चिमी इंग्लैंड में हुए जी-7 सम्मलेन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साफ कहा, 'हम चीन की प्रयोगशाला तक नहीं जा पाए.

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन इस बात से चिंतित हैं कि इतना समय बीत जाने पर भी यह साफ नहीं हो सका कि कोरोना वायरस का संक्रमण चमगादड़ से इंसानों में आया या यह संकट चीन की किसी प्रयोगशाला से निकला. चीन इस मामले में लगातार विश्व को गुमराह कर रहा है. वह नहीं चाहता कि बाहर से कोई आ कर उस की प्रयोगशालाओं को खंगाले.

कोरोना के कारण अमेरिका सहित पूरी दुनिया को मानवीय जिंदगियों का ही नहीं, बल्कि भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. मगर दुनिया को तबाही के मुहाने पर पहुंचाने वाले चीन ने खुद बहुत जल्दी न सिर्फ कोरोना पर कंट्रोल कर लिया बल्कि आर्थिक मोरचे पर भी वह मजबूती बनाए हुए है.

बीते 2 वर्षों के दौरान कोरोना के कारण कामधंधों पर लगी रोक से जहां दुनिया के हर देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है, भुखमरी, बेरोजगारी और मौतों का आंकड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा है, वहीं चीन की अर्थव्यवस्था में 2021 की पहली तिमाही में ही रिकोर्ड उछाल दर्ज किया गया है. चीन की जीडीपी विकास दर 2021 की पहली तिमाही में 18.3 फीसदी रही.

कोरोनाकाल में जब दुनिया के बाकी देश कमजोर मांग, लाखों नौकरियां जाने और बंद होते कारोबारों से जूझ रहे हैं, तो वहीं चीन ऐसी अकेली इकोनौमी है जिस में इस कदर उछाल देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि निर्यात और घरेलू बाजार में अच्छी मांग और चीन सरकार द्वारा लगातार छोटे कारोबारियों को सहयोग देने की वजह से यह रिकौर्ड बढ़त हुई है.

दरअसल, दुनिया के 2 बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक अमेरिका फेसबुक, गूगल, ट्विटर जैसे सोशल साइट्स के छद्म खेल में फंस गया है, जबकि दूसरा सब से बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत धर्म, जाति और इस पर आधारित राजनीति व अपराध के दलदल में समा चुका है. दोनों ही जगह लघुकुटीर उद्योग मरने की कगार पर हैं जबकि चीन तकनीक और शारीरिक श्रम के मिश्रण का भरपूर दोहन कर अपने उद्योगों के दम पर बढ़त बनाए हुए है. उस के लोग न तो सोशल मीडिया के गुलाम हैं और न ही धर्म के. चीन का नागरिक समाज एक मेहनतकश समाज है. वहां हर युवा शिक्षित है, उसे तकनीक की अच्छी जानकारी है और वह किसी न किसी छोटेबड़े कुटीर उद्योग से जुड़ा है.

आज पूरी दुनिया अपनी रोजमर्रा की छोटी से छोटी जरूरत के लिए चीन का मुंह देखती है. चीन दुनिया को सूई से ले कर जहाज तक सप्लाई कर रहा है. अमेरिका में क्रिसमस का त्योहार चाइनीज लाइट के बिना फीका है तो भारत में भगवान की आरती चाइनीज दीयों से होती है. दीवाली में चाइनीज पटाखे फोड़े जाते हैं, चाइनीज दीप जलते हैं, तो होली में रंग खेलने के लिए बच्चों को चाइनीज पिचकारी चाहिए. हमारे प्रधानमंत्री ने 'मेक इन इंडिया' का सिर्फ नारा बुलंद किया जबकि पूरी दुनिया में 'मेड इन चाइना' का बोलबाला है. आज चीन पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी वर्कशौप बन गया है.

वो कहां और हम कहां

भारत की तरह ही चीन एक बहुत पुरानी और महान सभ्यता है. उस ने भी सदियों तक विदेशी ताकतों की मार सही है. गुलामी में नरक भोगा है, मगर सालों तक दबाए जाने के बाद चीन अब दुनिया के नक्शे पर अपनी चमक बिखेर रहा है. वह आत्मविश्वास से लबालब है क्योंकि उस ने हर विपरीत परिस्थिति को सकारात्मक दिशा दी. उस ने दुनिया के सामने अपनी बढ़ी हुई आबादी का रोना नहीं रोया, बल्कि बढ़ी हुई आबादी को श्रम में लगाया, सब को भरपेट खाना दिया और गरीबी से उबारा.

चीन शिक्षा और तकनीक को गांव की झोंपड़ी तक ले गया ताकि राष्ट्र की तरक्की में किसी का योगदान छूट न जाए. चीन ने पिछले 30-35 सालों में जिस तेज गति से विकास किया है उस से पूरी दुनिया अचंभित है. रामराज्य की कल्पना भारत में हुई मगर असली रामराज्य चीन में है. वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ और 1949 में पीपल्स रिपब्लिक औफ चाइना बना. 1980 में आर्थिक विकास के महत्त्वपूर्ण पैमाने ग्रास डोमैस्टिक प्रोडक्ट पर चीन और भारत एक ही पायदान पर थे. प्रतिव्यक्ति आय में भारत आगे था मगर आज लगभग 34 वर्षों बाद हम कहां और चीन कहां.

हालांकि, बिना लोकतंत्र के आगे बढ़ रहे चीन की समस्याएं कम नहीं हैं. वहां जनता के पास बहुत सीमित आजादी है. लोग अपनी पसंद का नेतृत्व नहीं चुन सकते. निष्पक्ष न्यायपालिका जैसी कोई चीज चीन में नहीं है. चीन में प्रदूषण लगातार बढ़ा है और इस के खिलाफ आवाज भी नहीं उठाई जा सकती. लेकिन इस सब का यह मतलब भी नहीं है कि चीन से सीखने लायक कुछ भी नहीं है. अब यह हम पर है कि हम चीन से कौन से सबक लेते हैं.

उल्लेखनीय है कि 1981 से 2013 के बीच चीन ने अपने 68 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला. मानव इतिहास में इतनी तेजी से इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने कभी गरीबी से अमीरी का सफर तय नहीं किया है.

लंदन स्कूल औफ इकोनोमिक्स के आंकड़ों के अनुसार, साल 1978 में चीन का निर्यात सिर्फ 10 बिलियन डॉलर था. 1985 में यह 35 बिलियन डौलर हुआ और अगले 2 दशकों के भीतर यह 4.3 ट्रिलियन डौलर तक पहुंच गया. इसी के साथ चीन व्यापार करने वाला दुनिया का सब से बड़ा देश बन गया. वहां के आर्थिक सुधारों का नतीजा यह हुआ कि करोड़ों चीनियों का रहनसहन बेहतर हो गया. इतना ही नहीं, चीन में गरीबी घटने के साथसाथ वहां शिक्षा के स्तर में सुधार भी हुआ. आंकड़े बताते हैं कि साल 2030 तक चीन के 27 फीसदी कामगार यूनिवर्सिटी स्तर की शिक्षा वाले होंगे. यह लगभग वैसा ही होगा जैसा आज जरमनी में है.

इसी दौर की चीनी फिल्मों और साहित्य पर नजर डालें तो वहां कोई रोनाधोना नहीं है, बल्कि श्रम और लड़ाई के तेवर नजर आते हैं. लड़ाई थी गरीबी व गुलामी से और चीन ने उस लड़ाई में विजय पाई है. आज चीन दुनिया का सब से बड़ा एक्सपोर्टर बन कर उभर रहा है. इस का उसे अहंकार भी है. वह आर्थिक महाशक्ति बन रहा है. दुनिया की दूसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था कायम कर रहा है. मात्र 3 दशकों के भीतर चीन ने जो ताकत हासिल कर ली है, मानव इतिहास में उस की कोई अन्य मिसाल नहीं है. आखिर इस की वजह क्या है? आखिर चीन ने ऐसा क्या किया कि दुनियाभर के बाजार उस के सामानों से पटे पड़े हैं?

तरक्की की शुरुआत

चीन की तरक्की की शुरुआत हुई 1978 में. पहले चीन की पहचान एक कम्युनिस्ट मुल्क के तौर पर थी. यानी ऐसा देश जहां निजी संपत्ति का अधिकार किसी को न था. जो था वह स्टेट का था. तब कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग की साम्यवादी विचारधारा और नीतियां सब से ऊपर थीं. पूंजीवादी सोच को जड़ से खत्म करने के लिए 1966 से 1976 तक माओ त्से तुंग ने एक आंदोलन चलाया जिस का नतीजा यह हुआ कि देश की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई.

1976 में माओ त्से तुंग की मृत्यु के बाद कम्युनिस्ट पार्टी पर डांग श्याओपिंग का नियंत्रण मजबूत हुआ. हालांकि औपचारिक तौर पर उन्होंने चीन की कमान नहीं संभाली लेकिन उन्होंने चीन की अर्थव्यवस्था को कम्युनिस्ट नीतियों से अलग करने की शुरुआत की. इस दौर को 'पीरियड औफ रिएडजस्टमैंट' कहा जाता है. इस के तहत विदेशी निवेश के रास्ते खोले गए. विदेश से तकनीकी मदद लेने में कोई गुरेज नहीं किया गया.

डांग श्याओपिंग ने दुनिया के दूसरे देशों के साथ चीन के संबंध सुधारने की शुरुआत की. इस का सब से बड़ा सुबूत था 1979 में अमेरिका का चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देना. इस के साथ ही ब्रिटेन और जापान से भी चीन ने बेहतर रिश्तों की शुरुआत की.

चीन की विदेश नीति में इस बड़े बदलाव की वजह थी डांग श्याओपिंग की आर्थिक सोच. उन का मानना था कि चीन को पूरी तरह सोशलिस्ट बनाने के लिए पहले उस की अर्थव्यवस्था का मजबूत होना जरूरी है और इस की शुरुआत तभी हो सकती है जब चीन की बंद आर्थिक व्यवस्था के दरवाजे पूरी दुनिया के लिए खोल दिए जाएं. डांग

श्याओपिंग के मुताबिक समाजवाद का मतलब गरीबी खत्म करना है. मगर कंगाली में जीना समाजवाद नहीं है बल्कि सब को सामानरूप से समृद्ध करना ही असली समाजवाद है. डांग श्याओपिंग की इसी सोच ने चीन को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता प्रशस्त किया. चीन को ताकतवर बनाने में 3 नेताओं का नाम लिया जाता हैमाओ त्से तुंग, डांग श्याओपिंग और वर्तमान नेता शी जिनपिंग. श्याओपिंग की आर्थिक क्रांति के 40 सालों बाद एक बार फिर से चीन शी जिनपिंग जैसे मजबूत नेता की अगुआई में आगे बढ़ रहा है.

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