दलितपिछड़ा राजनीति घट रही आपसी दूरियां
Sarita|July First 2021
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुटने लगी हैं, बंद कमरों में गुप्त मीटिंगें हो रही हैं, कुछ के आंतरिक कलह खुल कर सामने भी आने लगे हैं. इस बीच जमीन पर जनता क्या सोच रही है, उस का क्या मूड है, जानने के लिए पढ़ें यह ग्राउंड रिपोर्ट.
शैलेंद्र सिंह

देहाती कहावत है कि हांडी के चावल पके हैं या कच्चे हैं, यह देखने के लिए पूरी हांडी के चावल निकालने की जरूरत नहीं होती, केवल चावल का एक दाना ही पूरी हांडी के चावल का हाल बता देता है. गांव में दलितपिछड़ा राजनीति में जो बर्फ 1990 से 2010 तक जमी थी वह 10 सालों में कितनी पिघल गई है, इस को समझने के लिए जब नंदौली गांव के लोगों से बात की गई तो समझ आया कि दलितपिछड़ों में अब पहले जैसी दूरी नहीं रह गई है.

दलितपिछड़ों में घटती दूरी के परिणामस्वरूप 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों में नए समीकरण बनने की उम्मीद दिख रही है. यही वजह है कि बसपा से टूटने वाले विधायकों की पहली पसंद सपा बन गई है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके का एक गांव है नंदौली. यह जिले का सीमावर्ती गांव है. इस गांव के बाद ही रायबरेली का जिला शुरू हो जाता है. दलित और पिछड़ा समाज के जमीनी सच को समझने के लिए नंदौली गांव को बातचीत के लिए इस कारण चुना क्योंकि यह राजधानी से मात्र 50 किलोमीटर की दूरी पर ही बसा है. यह लखनऊ-रायबरेली मुख्यमार्ग से 6 किलोमीटर अंदर है. इस गांव में दलित, पिछड़ा, मुसलिम और सवर्ण आबादी है. दलित आबादी सब से ज्यादा है. यहां बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और भाजपा का प्रभाव रहता है.

गांव की आबादी करीब 2,000 लोगों की है. 1,450 यहां वोटर हैं. सवर्णों में ठाकुर बिरादरी है. दलितों में पासी, चमार और अन्य जातियां हैं. इसी तरह पिछड़ों में अन्य पिछड़ा वर्ग की गड़रिया जाति है. इस के अलावा मुसलिम हैं. इस गांव में पिछड़ी आबादी तो कम है लेकिन पहले कांग्रेस, बाद में बसपा का समर्थन करने वाले दलित भी बिना किसी भेदभाव के सपा के साथ खड़े होते रहे हैं. दलित और पिछड़ों मे आपसी दूरियां कम होती रही हैं. गांव के पंचायत चुनाव से ले कर विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में इस बात को कसौटी पर कस कर देखा जा सकता है.

पंचायत चुनावों में यहां 1990 में शीतला बक्श सिंह, 1995 में राम बहादुर रावत, 1999 में जगन्नाथ, 2005 में चंदा देवी, 2010 में रीना सिंह, 2015 में अमृत लाल और 2019 में रीना सिंह प्रधान चुनी गई थीं. नंदौली गांव के पंचायत चुनावों से ले कर मोहनलालगंज विधानसभा चुनाव तक एकजैसे नतीजे ही दिखे हैं. इस से यह भी पता चलता है कि गांव के लोग सामाजिक समरसता की सोच रखते हैं. किसी भी तरह के भुलावे या नेता की हवा में आ कर वोट नहीं देते हैं.

गांव पूरी तरह से खेती पर निर्भर है. गरीब गांव है. कुछ घरों को छोड़ दें, तो कच्चे मकान अधिक हैं. आर्थिक हालत सभी की करीबकरीब एकजैसी ही है. किसानी केवल पेट पालनेभर की है. राजधानी के करीब होने के बाद भी गांव में केवल एक ही सरकारी नौकर है. वह भी केवल स्कूल मास्टर. पहले इस गांव में 3 सरकारी शिक्षक और 3 लोग रेलवे में सरकारी नौकरी करते थे. सरकारी योजना का लाभ पा कर दलितों के कुछ घरों में पक्की छत पड़ गई है. यहां के रहने वाले लोग राजनीतिक रूप से काफी समझदार हैं. गांव के पंचायत चुनावों में ही नहीं, विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी ग्रामीणों की रुचि रहती है.

1990 के करीब इस गांव में पक्की सड़क का निर्माण हुआ. इस के बाद ही बिजली आई. गांव में सड़क और बिजली आने के बाद भी बहुत विकास नहीं हो पाया है. सरकारी स्कूल कक्षा 8 तक है. गांव में शिक्षा का स्तर काफी कम है. रोजगार नहीं है. गांव के युवाओं में नशे की लत भी उन के पिछड़ेपन का बड़ा कारण है. इस के साथ ही, कई युवा ऐसे भी हैं जो जागरूक हैं. वे राजनीतिक रूप से प्रगतिशील सोच रखते हैं.

युवावर्ग में सपा नेता अखिलेश यादव के प्रति लगाव है. पिछड़े ही नहीं बल्कि अगड़े, मुसलिम और दलितवर्ग के लोग भी उन को बेहतर नेता मानते हैं. पहले यहां के लोग कांग्रेस, मायावती और भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेई के प्रति रुचि रखते थे. 2017 के बाद कुछ युवाओं में योगी आदित्यनाथ के प्रति लगाव बढ़ा पर गांव में खेतों को नुकसान पहुंचाने वाले छुट्टा जानवरों के कारण योगी से इन की नाराजगी बढ़ गई. गांव के लोगों का मानना है कि योगी की यह सोच किसानों को सब से अधिक नुकसान पहुंचा रही है. इस सोच के कारण ही पंचायत चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा. कोरोना के समय जिस तरह के गांव के लोगों को अस्पताल दर अस्पताल भटकना पड़ा, वह दर्द कम नहीं हो रहा है.

रोजीरोजगार चाहते हैं युवा

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