बरोजगारी का गहराता संकट
Sarita|July First 2021
देश में करोड़ों लोग इस समय बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. कइयों की घर में भूखे मरने की नौबत आ गई है और कई गहरे अवसाद में जी रहे हैं. बढ़ती बेरोजगारी भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है, यदि इस समय इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो अर्थव्यवस्था का वापस जल्दी पटरी पर आना बेहद मुश्किल होने वाला है.
रोहित

बढ़ती बेरोजगारी भारत में कोई मुद्दा हो, यह बात गुजरीबिसरी सी लगती है. सत्तापक्ष ने कभी इसे मुद्दा माना ही नहीं और विपक्ष ने निष्क्रियता के चलते इसे मुद्दा बनाया भी नहीं. बाकी जनता पर धर्मांधता और अंधराष्ट्रवाद का नशा इतना हावी कर दिया गया कि इस तरह के सवालों से रूबरू होना अपनी देशभक्ति पर संदेह करने जैसा हो गया.

लेकिन बेरोजगारी का दंश कितना भयानक हो सकता है, इसे उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से आई दिल दहला देने वाली घटना से समझा जा सकता है. वहां 3 दिनों तक मासूम बच्चे भूख से तड़पते रहे और उन बच्चों का पिता पिता मनोज फांसी के फंदे पर लटका रहा. जब बच्चों को बरदाश्त न हुई तब उन्होंने पड़ोसियों से मदद में खाना मांगा.पता चला कि मनोज पिछले डेढ़ साल से बेरोजगार था. घर में भारी तंगी थी, नौकरी मिल नहीं रही थी और खाने के लाले थे. यह कोई अकेले मनोज का मामला नहीं.

विश्व बैंक के आंकड़ों के आधार पर प्यू रिसर्च सेंटर ने अनुमान लगाया है कि भारत में गरीबों की संख्या महामारी के कारण केवल एक वर्ष में 13.40 करोड़ हो गई है. इस का मतलब है कि भारत 45 वर्षों बाद आज फिर सामूहिक गरीबी का देश' कहलाने की स्थिति में वापस आ गया है. इस का एक बड़ा कारण बड़ी संख्या में नौकरियों का जाना है.

36 वर्षीय नरेंद्र कौशल मूलरूप से आगरा के रहने वाले हैं. नरेंद्र ने तब से दिहाड़ी मजदूरी करनी शुरू कर दी थी जब उन की उम्र महज 14 साल थी और वे 7वीं क्लास में पढ़ रहे थे. उस दौरान उन के पिताजी राजपाल कौशल एक मकान में मजदूरी कर रहे थे. लेकिन वक्त इतना बेरहम हो चला था कि मजदूरी करते हुए उन के पांव में भारीभरकम सिल्ली जा गिरी. सिल्ली के गिरने से एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया, जिस के बाद एक फुट की रौड पैर में डाली गई और फिर वे कभी भारीभरकम काम करने लायक न रहे.

घर में पिताजी एकमात्र कमाऊ व्यक्ति थे. घर का चूल्हा चलना उन दिनों मुश्किल हो गया था. हालत यह कि नरेंद्र को नाबालिग उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़ दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ गई. यह बीते दिनों की बात है लेकिन नरेंद्र के जीवन को इसी घटना ने बदल कर रख दिया. आज इतने सालों बाद फिर वक्त ने ऐसा सितम ढाया कि थोड़ीबहुत संभली जिंदगी फिर से बेपटरी हो गई.

नरेंद्र दिल्ली के आनंद पर्वत इलाके की 10 नंबर गली में लोहेलंगड़ का काम कर रहे थे. पिछले साल के लौकडाउन के कोड़े के निशान नरेंद्र के शरीर से मिटे नहीं थे कि इस साल दोबारा लौकडाउन लगने से खाल छिल गई सी लगती है. पिछले वर्ष आधे समय फैक्ट्री पर ताला लटका पड़ा था लेकिन नौकरी बची थी. लेकिन इस साल की शुरुआत में उन्हें काम से निकाल दिया गया. इन महीनों में घर की आर्थिक स्थिति बुरी तरह प्रभावित हो गई. घर में एकएक निवाला गिना जाने लगा. 3 वक्त की जगह 2 वक्त से गुजारा चलाना पड़ा.

सामूहिक गरीबी का देश

2019 में यूनाइटेड नैशन की ग्लोबल मल्टीडायमैशनल पौवर्टी इंडैक्स (एमपीआई) ने बताया था कि भारत ने 2006 से 2016 के बीच लगभग 27 करोड़ नागरिकों को गरीबी से बाहर निकाला था. लेकिन अगर आज 2020 की स्थिति के साथ इस की तुलना करें तो भारत में सब से अधिक वैश्विक गरीबी वृद्धि हुई है. भारत ने 2011 के बाद से अपने गरीबों की गिनती नहीं की, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने 2019 में देश में गरीबों की संख्या 36.4 करोड़ या आबादी का 28 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया था.

महामारी के कारण सभी अनुमानित नए गरीब अभी इस आंकड़े के अतिरिक्त हैं. साथ ही, जैसा कि अनुमान बताते हैं, शहरी क्षेत्रों में लाखों लोग भी गरीबीरेखा से नीचे खिसक गए हैं. प्यू सैंटर के अपने अनुमान के मुताबिक, मध्यवर्ग भी एकतिहाई ही सिकुड़ कर रह गया है. कुल मिला कर, लाखों भारतीय या तो गरीब हो गए हैं या गरीब होने की कगार पर हैं. रिपोर्ट की मान कर चलें तो देश में लोगों का कंज्यूमिंग पावर खत्म हो गया है. उन्होंने अपनी बचत पहले ही इलाज में समाप्त कर ली है या वे इसे आपातकाल के लिए बचाए रखना चाहते हैं, जिस से खर्च करने की उन की क्षमता बेहद कम हो गई है. ऐसे में महामंदी का संकट गहराता जा रहा है.

नरेंद्र कौशल दिल्ली के नेपाली बस्ती इलाके में ढाई हजार के किराए के कमरे में रह रहे हैं. छोटा सा कमरा है जिस की चारों दीवारें नंगी ईंटों की हैं. ईंटों के बीच सीमेंट में कीलें विश्वगुरु भारत और अच्छे दिन के ताबूत में ठोकी गई सी लग रही थीं. नरेंद्र की 4 बेटियां हैं, जिन्हें पढ़ाने की इच्छा तो वे रखते हैं लेकिन उन का मानना है कि यही हाल रहा तो कैसे पढ़ाईलिखाई पर खर्चा कर पाएंगे.

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