इसराईल-फिलिस्तीन युद्ध धर्म के हाथों तबाह मध्यपूर्व एशिया
Sarita|June Second 2021
इसराईल और फिलिस्तीन का सारा झगड़ा धर्म, वर्चस्व, जमीन हथियाने आदि के इर्दगिर्द है. यहूदी और मुसलमान जिन के धर्म का मूल स्रोत एक ही है, बावजूद इस के दोनों एकदूसरे की जान के प्यासे हैं. दुनिया में धर्म ही हर फसाद की जड़ है. धर्मयुद्धों ने पूरे मध्यपूर्व एशिया को तबाह कर डाला है.
नसीम अंसारी कोचर

इसराईल और फिलिस्तीन के बीच 011 दिनों तक चला खूनी संघर्ष थम गया. अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते आखिरकार इसराईल ने गाजा पट्टी में सैन्य अभियान को रोकने के लिए 21 मई से सीजफायर का ऐलान कर दिया. गाजा पट्टी से हमास के अधिकारियों ने भी लड़ाई रोकने की पुष्टि कर दी. इसराईल और फिलिस्तीन के बीच जारी जंग को खत्म करने के लिए अमेरिका का भारी दबाव इसराईल पर था. पहले इसराईल ने अमेरिकी अपील को नकार दिया था और लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक ले जाने की बात कही थी लेकिन बाद में इसराईल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की हाईलैवल सिक्योरिटी कैबिनेट के मंत्रियों ने सर्वसम्मति से गाजा में सीजफायर के समर्थन में वोट किया.

इसराईल के रक्षा अधिकारियों ने मंत्रियों के सामने ब्रीफिंग करते हुए कहा कि इसराईल ने फिलिस्तीनी आतंकी समूह हमास के खिलाफ तटीय इलाके में सभी संभावित उपलब्धियों को हासिल कर लिया है (जैसा कि उस की मंशा थी). हमारे हमलों से हमास काफी डर गया है और उसे काफी चोट पहुंची है.

इसराईल और फिलिस्तीन के बीच भीषण संघर्ष की शुरुआत तो पहली रमजान को ही हो गई थी जब इसराईली पुलिस ने येरुशलम की अलअक्सा मसजिद में घुस कर तोड़फोड़ मचाई और वहां लगे लाउडस्पीकर के केबल काट कर पूरे परिसर में तांडव किया था. इस का बदला लेने के लिए फिलिस्तीन की गाजा पट्टी से हमास, जिसे आतंकी संगठन कहा जाता है, ने इसराईल के खिलाफ मोरचा खोल दिया. इसराईल को शायद इसी मौके का इंतजार था. देखते ही देखते उस के लड़ाकू विमान फिलिस्तीन पर मिसाइल हमले कर के तबाही मचाने लगे. वहीं, गाजा पट्टी से हमास भी लगातार इसराईल पर रौकेटों की बारिश करने लगा.

गौरतलब है कि तकरीबन 2 हफ्ते की ताजा लड़ाई में फिलिस्तीन में 230 लोग मारे गए और इसराईल में 12 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं. फिलिस्तीन के 41 बच्चों की जानें भी इस खूनी संघर्ष में चली गईं. संघर्ष के चलते करीब 58 हजार फिलिस्तीनियों ने पलायन किया है. गाजा में हमास के मुखिया याह्या अल सिनवार के घर को इसराईली मिसाइलों ने मिट्टी के ढेर में बदल दिया है. वहीं अरब और यहूदियों की मिश्रित आबादी वाले इसराईली शहरों में भी नागरिकों के बीच काफी झड़पें व हिंसा हुई है, जबकि अमूमन उन के बीच शांति और सौहार्द का माहौल रहता था.

हालिया संघर्ष से पहले इसराईल और फिलिस्तीन के बीच लंबे वक्त तक शांति बनी रही. इस की वजह इसराईल पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव था. हालांकि कभीकभी राजनयिक स्तर पर कुछ विवाद उभरते थे, मगर जल्दी ही दब भी जाते थे. लेकिन अप्रैलमई में अचानक जंग के हालात पैदा हो गए और संभावना ऐसी बनने लगी कि अगर हालात काबू से बाहर हुए और जंग येरुशलम तक पहुंची तो दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी होगी.

झगड़े का इतिहास

इसराईल और फिलिस्तीन यानी यहूदी और मुसलमान का सारा झगड़ा धर्म, वर्चस्व, जमीन हथियाने व तेल के कुओं के इर्दगिर्द ही है. यहूदी और मुसलमान दोनों के धर्मों का मूल स्रोत एक ही है. बावजूद इस के, ये दोनों एकदूसरे की जान के प्यासे हैं. दरअसल, दुनिया में धर्म ही हर झगड़े, हर फसाद की जड़ है. धर्म मासूमों की जानें लेता है. धर्म देशों को तबाह करता है. पूरे मध्यपूर्व एशिया को धर्म ने तबाह कर डाला. अमेरिका पर आतंकी हमले के पीछे धर्म और उस से उपजी कुंठा ही वजह थी. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिंदुस्तान हर जगह धर्म मानवजाति के विनाश पर उतारू है. धर्म धरती का सब से बड़ा बोझ है. मगर कोई इस बोझ को उतार फेंकने को तैयार नहीं है.

यहूदी और मुसलमान हमेशा से एकदूसरे की जान के प्यासे रहे हैं. वहीं, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच भी नफरत की कई मिसालें हैं. जबकि इसलाम और ईसाई दोनों धर्मों की उत्पत्ति यहूदी धर्म से हुई है. ये तीनों ही धर्म एकदूसरे के खिलाफ हैं, जबकि तीनों ही धर्म मूलरूप में एकसमान ही हैं. आज पूरा मध्य एशिया यहूदी, ईसाई और मुसलमानों के बीच जारी जंग से तबाह और बरबाद है.

उल्लेखनीय है कि 613 में जब हजरत मुहम्मद ने उपदेश देना शुरू किया तब मक्का, मदीना सहित पूरे अरब में यहूदी धर्म, पेगन, मुशरिक, सबायन, ईसाई आदि धर्म थे. हजरत मुहम्मद द्वारा पहले से मौजूद धर्मों में बदलाव लाने के लिए एक नए धर्म को शुरू करना यहूदियों और ईसाइयों को पसंद नहीं आ रहा था.

मुहम्मद के कुछ समर्थक थे और कुछ विरोधी. विरोध करने वालों में यहूदी सब से आगे थे. यहूदी नहीं चाहते थे कि धर्म को बिगाड़ा जाए, जबकि हजरत मुहम्मद के अनुसार, वे इसलाम की शुरुआत कर के मौजूदा धर्मों में सुधार लाने की कोशिश कर रहे थे. बस, यहीं से यहूदियों, मुसलमानों और ईसाईयों के बीच फसाद व जंग की नींव पड़ी.

सन 622 में हजरत मुहम्मद अपने समर्थकों के साथ मक्का से मदीना चले गए. इसे 'हिजरत' कहा जाता है. मदीना में हजरत मुहम्मद ने लोगों को इकट्ठा कर के इसलामिक फौज तैयार की, सैनिकों के लिए कई कड़े नियम बनाए जिन में 30 दिन का रोजा और दिन में 5 वक्त की नमाज जैसी चीजें शामिल थीं. इसे हर सैनिक के लिए अनिवार्य किया गया और इस के बाद शुरू हुआ जंग का सफर. इसलामिक फौज ने जल्दी ही खंदक, खैबर, बदर और फिर मक्का को फतह कर लिया. ये लड़ाइयां अरसे तक चलती रहीं.

632 ईसवी में हजरत मुहम्मद के जाने के वक्त तक और उस के अगले सौ सालों में लगभग पूरे अरब में मुसलामानों का वर्चस्व कायम हो गया. इस के बाद मुसलमानों ने यहूदियों को अरब से बाहर खदेड़ दिया. हालत यह हो गई कि यहूदी इसराईल और मिस्र में सिमट कर रह गए. मगर वहां भी वे या तो मुसलिम शासन के अंतर्गत रहते या ईसाइयों के शासन में.1096-99 में पहले क्रूसेड यानी धर्मयुद्ध और 1144 में दूसरे क्रूसेड के बाद यहूदियों को अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए लगातार दरबदर रहना पड़ा.

फिलिस्तीन में भी यहूदी शरणार्थी के तौर पर रहते थे. 1948 में फिलिस्तीन के बंटवारे से पहले तक फिलिस्तीन पर सौ फीसदी फिलिस्तीनियों यानी अरबों का कब्जा था. मगर धीरेधीरे यहूदियों ने अपने लिए अलग मुल्क की मांग उठानी शुरू कर दी. इस मामले में ईसाईयों ने यहूदियों का साथ दिया और 1948 में अंगरेजों ने फिलिस्तीन के 2 टुकड़े कर दिए. जमीन का 55 फीसदी टुकड़ा फिलिस्तीन यानी अरबों के हिस्से में आया और 45 फीसदी इसराईल के रूप में यहूदियों को सौंप दिया गया. 14 मई, 1948 को इसराईल ने खुद को एक आजाद देश घोषित कर दिया और इस तरह पहली बार एक यहूदी देश दुनिया के नक्शे पर आया.

मगर येरुशलम को ले कर लड़ाई जारी रही क्योंकि इसराईल और फिलिस्तीन दोनों येरुशलम को अपनी राजधानी बनाना चाहते थे. धार्मिक लिहाज से येरुशलम न सिर्फ मुसलिम और यहूदी बल्कि ईसाइयों के लिए भी बेहद खास है. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र बीच में आया और उस ने फिलिस्तीन का एक टुकड़ा और अलग कर दिया. अब येरुशलम का 8 फीसदी हिस्सा संयुक्त राष्ट्र के कंट्रोल में आ गया, जबकि 48 फीसदी जमीन का टुकड़ा फिलिस्तीन और 44 फीसदी टुकड़ा इसराईल के हिस्से में रह गया.

येरुशलम पर नजर

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