बढ़ती आत्महत्याएं गहराती चिंताएं
Sarita|June Second 2021
सरकार ने जनता को विध्वंस के कगार पर खड़ा कर दिया है. चारों ओर डर व दहशत का माहौल है.अर्थव्यवस्था चकनाचूर है. लोगों की नौकरियां छिन गई हैं. इस विध्वंस से जन्मी घनघोर निराशा व अवसाद के चलते आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगी हैं जो देश को गहराते अंधकार की तरफ धकेलती जा रही हैं.
पद्मा अग्रवाल

डाक्टर बनने का सपना देख मैडिकल कोर्स में प्रवेश करने वाली आदिवासी छात्रा स्नेहा ने 20 मई को घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. 21 वर्षीया स्नेहा भिवजी हिचामी गढ़चिरौली जिले के घोट गांव की रहने वाली थी. दिन के 2 बजे के आसपास स्नेहा ने अपने घर के खाली कमरे में लगे पंखे के हुक में नायलौन की रस्सी बांध कर आत्महत्या की. स्नेहा सरकारी मैडिकल कालेज चंद्रपुर में एमबीबीएस द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. उस के पिता पुलिस अधिकारी हैं और उस के परिवार में मां और एक भाई हैं.

सुसाइड करने से पहले स्नेहा ने कमरे की दीवार पर इंग्लिश में बड़े अक्षरों में डिप्रैशन लिखा था. वह उदास थी और अवसाद में थी. आशंका है कि कोरोना की स्थिति, लगातार लौकडाउन और खराब पाठ्यक्रम कार्यक्रम ने उसे ऐसा करने को मजबूर किया था. वह डाक्टर न बन पाने की संभावनाओं से घबराई हुई थी.

इसी प्रकार नोएडा में भी एक सौफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने घर पर आत्महत्या कर ली. मामला सैक्टर 74 स्थित अजनारा हैरिटेज हाउसिंग सोसाइटी का था. पुलिस के मुताबिक, तबरेज अपनी पत्नी के साथ जामिया नगर में रह रहा था और नोएडा के अजनारा आवासीय परिसर में एक फ्लैट का मालिक था. वह सोसाइटी में छठी मंजिल पर किराएदार से मिलने आया था. लेकिन 12वीं मंजिल पर जा कर अपना लैपटौप बैग में रखा और फिर कूद कर जान दे दी. आखिरी बार तबरेज ने अपनी पत्नी से बात की थी. यह आत्महत्या भी गहरे अवसाद के चलते हुई.

रिपोर्ट के मुताबिक उसी दिन 24 घंटे के भीतर अकेले नोएडा में 9 युवाओं ने अलगअलग कारणों से अवसाद में घिर कर आत्महत्या की.

ऐसे ही, 30 अप्रैल को भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएस) बेंगलुरु के 21 वर्षीय स्नातक छात्र रोहन ने अपने कमरे में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. पुलिस के अनुसार, वह परेशान था और अवसाद से घिरा था क्योंकि वह विदेश में अपनी पढ़ाई के सपने को पूरा नहीं कर पाया था. वहीं मार्च के अंत में मध्य प्रदेश के रीवां जिला निवासी 26 वर्षीय उमंग शर्मा ने बेरोजगार होने के चलते आत्महत्या कर ली. नौकरी न होने के चलते मानसिक तनाव में आ कर उमंग शर्मा ने कमरे में पंखे के कुंडे से फंदा लगा कर आत्महत्या की.

इंदौर की एमबीबीएस के फाइनल वर्ष की छात्रा नित्या ने प्रशासन के रवैए से परेशान हो कर अपने होस्टल के कमरे में पंखे से लटक कर फांसी लगा कर मौत को गले लगा लिया. कोटा में परीक्षा में असफल होने के कारण एक छात्र ने कीटनाशक पी कर जीवन समाप्त किया. कानपुर आईआईटी के प्रतिभाशाली छात्र ने तनाव के कारण फांसी लगाई. प्रयागराज में प्रतियोगी परीक्षा में असफल हो जाने के कारण 15 दिनों में 5 छात्रों ने आत्महत्याएं की. पिछले दिनों तेलंगाना के 20 छात्रों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने की खबर आई थी. कारण, तकनीकी खराबी की वजह से बच्चों का परीक्षा परिणाम ठीक से नहीं आने के कारण निराश बच्चों ने ऐसा कदम उठाया.

अहमदाबाद की आयशा, इंदौर के भय्यू महाराज (धर्मोपदेशक), फिल्म जगत के बहुचर्चित सुशांत सिंह राजपूत, टीवी आर्टिस्ट प्रत्यूषा बनर्जी, कैफे डे के मालिक वी जी सिद्धार्थ, युवा कवयित्री एकादशी त्रिपाठी आदि कई नाम हैं. ऐसी खबरें रोज ही अखबारों और न्यूज चैनलों की सुर्खियां बनती हैं. कुछ दिनों तक रोनाधोना, फिर सब शांत. दुनियाभर में होने वाली आत्महत्याओं में भारतीय महिलाओं की संख्या एकतिहाई से अधिक और पुरुषों की संख्या लगभग एकचौथाई है.

हमारे देश में ऐसी घटनाओं की दर वैश्विक औसत से भी ज्यादा है. आजकल देखा जा रहा है कि लोगों में किन्हीं भी कारणों से अपनी जान देने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है. भारतवर्ष में शिक्षा से उम्मीद की जाती है कि भविष्य में नौकरी के अच्छे मौके के साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तौर पर बेहतर पृष्ठभूमि तैयार हो सकेगी. अर्थात शिक्षा को रोजगार की कुंजी समझा जाता है. परंतु भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर्याप्त नौकरियों के विकल्प तैयार करवाने में असफल रही है.

भविष्य में जौब की कमजोर होती संभावनाओं के कारण छात्रों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव बढ़ता जा रहा है. पढ़ाई के दौरान जो मिलने वाला आनंद और मौजमस्ती थी उस से छात्र वंचित हो रहे हैं. लगातार बढ़ते तनाव के कारण छात्रों में सामाजिक जुड़ाव के प्रति अनिच्छा पैदा हो रही है. यही वजह है कि वे खुल कर लोगों के साथ मिलना पसंद नहीं करते और अकेलेपन के कारण जल्दी अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं.

बेरोजगारी कई समस्याओं की जड़ है. परंतु रोजगार में लगे युवाओं के मन में पलती निराशा के भी भयानक परिणाम दिखाई पड़ रहे हैं. ऐसी घटनाएं, दरअसल, रोजगार में होने वाली मुश्किलों के कारण लोगों में बढ़ती निराशा और अवसाद का खुलासा करती हैं.

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