ब्लैक फंगस रंग बदलती मौत
Sarita|June First 2021
ब्लैक फंगस इन्फैक्शन या म्यूकरमाइकोसिस कोई रहस्यमय बीमारी नहीं है, लेकिन यह अभी तक दुर्लभ बीमारियों की श्रेणी में गिनी जाती थी. भारतीय चिकित्सा विज्ञान परिषद के मुताबिक म्यूकरमाइकोसिस ऐसा दुर्लभ फंगस इन्फैक्शन है जो शरीर में बहुत तेजी से फैलता है. इस बीमारी से साइनस, दिमाग, आंख और फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है.
उग्रसेन मिश्रा, नसीम अंसारी कोचर, सोमा घोष, रोहित

कोरोना से जूझ रही देश की जनता अब नई बीमारी म्यूकरमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस की चपेट में है. यह दुर्लभ किस्म की बीमारी कोरोना से उबरे उन मरीजों में तेजी से पनप रही है, जिन के इलाज में स्टेरौयड्स का इस्तेमाल हुआ है. कोरोना से रिकवर हो चुके कई लोगों के लिए यह दुर्लभ संक्रमण जानलेवा साबित हो रहा है. ओडिशा में इस का पहला केस मिला था. इस के बाद गुजरात और राजस्थान में सामने आने के बाद पूरे देश से ब्लैक फंगस इन्फैक्शन के केस सुनाई देने लगे हैं.

मध्य प्रदेश के जबलपुर से महाराष्ट्र के ठाणे तक में इस वजह से लोगों की जाने जा रही हैं. सब से ज्यादा उत्तर भारत में इस का प्रकोप है. उत्तर प्रदेश में तो ब्लैक फंगस कहर बनने की राह पर है.

भले ही सरकार आंकड़े पूरी तरह स्पष्ट न कर रही हो, लेकिन किसी मर्ज को खत्म करने की पहली शर्त ही उसे उजागर करना है. रिपोर्ट लिखे जाने तक भारत में कुल 11,717 सरकारी मामले सामने आ चुके हैं, जिस में महाराष्ट्र में 2,770, गुजरात में 2,869, आंध्र प्रदेश में 779, मध्य प्रदेश में 752 और तेलंगाना में 744 मुख्य हैं. इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में इस बीमारी के 701 मरीज मिले हैं, जिस में से 20 से अधिक लोगों की मौतें दर्ज की गई हैं. हालांकि कई लोगों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के आंकड़ों पर चुनाव का असर भी हो सकता है. मथुरा व कानपुर में 2 और लखनऊ में 10 मरीजों की मौत हो चुकी है.

लखनऊ केजीएमयू यूनिवर्सिटी के मुताबिक, ब्लैक फंगस की चपेट में आए 124 मरीज केजीएमयू में भरती हैं. कइयों की आंखों की रोशनी पर असर आ चुका है. जरूरी दवाएं दी जा रही हैं. इन में कइयों की रोशनी काफी हद तक प्रभावित है. वाराणसी में भी 84 मामले सामने आए हैं, जिन में 6 की मौत की पुष्टि हुई है. स्टेरौयड लेने वाले कोरोना मरीज इस वक्त हाई रिस्क पर हैं.

क्या है ब्लैक फंगस ब्लैक

फंगस इन्फैक्शन या विज्ञान की भाषा में म्यूकरमाइकोसिस कोई रहस्यमय बीमारी नहीं है, लेकिन यह अभी तक दुर्लभ बीमारियों की श्रेणी में गिनी जाती थी. भारतीय चिकित्सा विज्ञान परिषद के मुताबिक, म्यूकरमाइकोसिस ऐसा दुर्लभ फंगस इन्फैक्शन है, जो शरीर में बहुत तेजी से फैलता है. इस बीमारी से साइनस, दिमाग, आंख और फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है. यह संक्रमण मस्तिष्क और त्वचा पर काफी बुरा असर डालते हैं. इस में त्वचा काली पड़ जाती है, वहीं कई मरीजों की आंखों की रोशनी चली जाती है. संक्रमण की रोकथाम समय पर न हो पाए, तो मरीजों के जबड़े और नाक की हड्डी गल जाती है. समय पर इलाज न मिलने पर मरीज की मौत भी हो सकती है.

'यूएस सैंटर फौर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' की मानें, तो यह फंगस हमारे चारों ओर मुक्त रूप में मौजूद होता है, लेकिन किसी के शरीर के अंदर इन्फैक्शन को संभव बनाने के लिए इसे एक विशेष एनवायरमैंट की जरूरत होती है. यह उन लोगों पर हमला करता है, जिन की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर हो चुकी है. दूसरे, इस को पनपने के लिए नमी चाहिए. लिहाजा, यह सामान्यतः नाक, साइनस, आंखों या दिमाग में पाया जाता है और अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर तेजी से फैलता है. अगर एक बार यह फंगस दिमाग में फैल गया तो इस का इलाज बहुत कठिन है.

यह जानलेवा इन्फैक्शन है. इस के फैलने की गति काफी तीव्र होती है और इस में मृत्युदर काफी ऊंची है. म्यूकर से संक्रमित लोगों में मृत्युदर लगभग 50 से 70 फीसदी तक होती है. यह कैंसर की तरह व्यवहार करता है, लेकिन कैंसर में जानलेवा प्रभाव पैदा करने में कम से कम कुछ महीने तो लगते हैं, जबकि इस से कुछ दिनों या कुछ ही घंटों में मरीज की जान जा सकती है.

इतना खतरनाक होने के बावजूद अभी हाल तक म्यूकरमाइकोसिस यानी ब्लैक फंगस को इतना भयानक नहीं माना जाता था. यह एक दुर्लभ रोग था. किसी व्यस्त सैंटर पर भी 3-4 साल में कभी एकाध मामले ही आते थे. अत्यधिक कम इम्यून वाले मरीजों, जैसे कैंसर पीड़ित, जिन को अनियंत्रित डायबिटीज है या जिन को सर्जरी कर के नया अंग लगाया गया हो और वह इम्यूनो सप्रेसैंट यानी प्रतिरक्षा दमनकारी थेरैपी पर हो, ऐसे मरीजों में इस फंगस के फैलने का डर अधिक होता था. लेकिन अब कोविड के कारण इस के मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. इस की मुख्य वजह है कि हमारे इम्यून सिस्टम का बहुत कमजोर हो जाना.

डा. अलकेश अग्रवाल के मुताबिक, असल में यह एक फंगल इन्फैक्शन है. यह फंगल आसपास के वातावरण में होता है, मसलन मिट्टी, पेड़पौधों, हवा, मृत जानवरों आदि में और हवा द्वारा नाक के अंदर साइनस में यह फंगस त्वचा से चिपक जाता है. अधिकतर लोगों को इस की कोई तकलीफ महसूस नहीं होती. लेकिन कुछ लोगों, जो इम्यूनो कौम्प्रोमाइज वाले मरीज होते हैं, को इस की शिकायत होती है. अधिकतर कैंसर के मरीज, जिन की कीमोथेरैपी चल रही हो, अनकंट्रोल्ड डायबिटीज के मरीज, किडनी या लंग्स ट्रांसप्लांट किए गए मरीज आदि की इम्यूनिटी बेहद कम होती है, इसलिए उन में इस फंगस के फैलने का अवसर आसानी से मिल जाता है. यह अवसर वाला फंगस है. इसलिए यह नाक द्वारा साइनस से होते हुए आंख या जबड़े में पहुंच जाता है. अगर ध्यान न दिया गया तो यह आगे मस्तिष्क तक भी पहुंच सकता है.

कोरोना के साथ क्यों बढ़ा ब्लैक फंगस का खतरा

शुरुआत में यह फंगस इन्फैक्शन उन कोविड मरीजों तक सीमित था, जो गंभीर डायबिटीज या कैंसर के मरीज थे अथवा जो किसी दूसरी बीमारी के लिए इम्यूनो सप्रेसैंट थेरैपी पर थे. लेकिन हाल ही में सामान्य मरीजों में इस के तीव्र प्रसार का कारण है. कोरोना के इलाज के दौरान स्टेरौयड का विवेकहीन प्रयोग. लंबे समय तक स्टेरौयड का हाई डोज ब्लैक फंगस को पनपने का मुख्य कारण है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि स्टेरौयड हमारी इम्यूनिटी को कम करता है और इस में ब्लड शुगर लैवल बढ़ाने की प्रवृत्ति होती है. लिहाजा, जिन को डायबिटीज नहीं है, उन में भी स्टेरौयड ब्लैक फंगस इन्फैक्शन को फैलने के लिए अनुकूल एनवायरमैंट बना देता है.

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