कुव्यवस्था से हाहाकार
Sarita|May First 2021
देश में मौजूदा हालात बताते हैं कि सरकारें जनहितैषी कभी नहीं बन सकतीं. सरकारें गरीबों के बारे में कभी नहीं सोच सकतीं.सरकारें तो बनी ही जनता पर शासन करने को हैं. जनता को सिर्फ वोटबैंक समझने की जिद इन्हें उस की लाशों से खेलने की इजाजत देती है.
रोहित

"पिछले साल की कई गलतियों को भुला दिया जाए तो माना जा सकता है कि कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी एक आपदा थी लेकिन इस बार यह आपदा नहीं, बल्कि सरकारों का एक सिस्टमेटिक फैलिएर है. मेरी मां दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में थी. वह वहां 5 दिनों तक जूझती रही. अस्पताल में किसी ने कोई केयर नहीं की. उस की मौत कल (20 अप्रैल) रात को 3 बजे हुई. उस से पहले पूरे दिन अस्पताल में मेरी मिसेज 8वीं मंजिल से यहां से वहां भागती रही कि मांजी का बीपी चैक कर लो, औक्सीजन चैक कर लो लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं. आखिर में झगड़ा करने पर अटेंडेंट ने बीपी मशीन ही मेरी मिसेज को पकड़ा दी और कहा कि खुद ही चैक कर लो. मेरी मां बीमारी से नहीं मरी है, बल्कि उसे सरकार ने मारा है," सरिता पत्रिका से बात करते हुए 44 वर्षीय अरशद आलम भावुक हो गए.

भारत में कोरोना का दूसरा फेज देश के इतिहास में उस बदनुमा दाग की तरह हमेशा याद रहेगा जो मिटाने से नहीं मिटने वाला. दूसरे फेज का हाल यदि ऐसा ही रहा तो यह भी संभव है कि इस की दुर्गत स्मृति को याद करने के लिए सिर्फ मानव कंकाल ही बचेंगे, नेता उन्हीं कंकालों के ढेर पर चढ़ कर वोट की अपी कर रहे होंगे. माफ कीजिए, कटु वचन हैं लेकिन हाल ए वक्त को मद्देनजर रख पाठकों के मन में धूल झोंकना ठीक नहीं.

इस समय देश की तमाम सरकारों का हाल ऐसा हो चुका है जैसे पूरे साल बिन पढ़ाई किए छात्रों का परीक्षा में बैठने पर होता है. कोरोना ने एक साल पहले जो अल्टीमेटम सरकार को दिया था उसे मनमौजी नेता 'बीत गई सो बात गई' मान कर चल रहे थे. महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने कहा था, "इतिहास जब खुद को दोहराता है तब वह पहली बार ट्रेजेडी के रूप में होता है और दूसरा मजाक की तरह." प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में शायद यह स्थिति 2 बार सटीक बैठी है, एक 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से मोदी के बहुमत से जीत जाने पर और दूसरे, कारोना के एक साल बाद दूसरे फेज पर. दोनों ही स्थितियों में फेल और कोई नहीं, भारत की विराट जनता ही हुई है.

कोरोना से हालात बदतर

आज स्थिति यह है कि पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है. यह हाहाकार आमजन के घरों से निकलने के बाद, अस्पतालों की चीखपुकार से होते हुए शमशानघाटों और कब्रिस्तान तक फैल चुका है.

जिन्हें अभी भी यह हकीकत मजाक लग रही हो तो एक बार उन सुनसान सड़कों पर पढ़िए जहां लगातार हर मिनट तेज रफ्तार में चलती एम्बुलैंस शोर मचा रही हैं. दावे के साथ कह सकता हूं रात को सोते समय उन के सायरन की आवाज कानों में बिनबिनाने लगेगी.

अगर इतने से भी यकीन न हो, तो उन कब्रिस्तानों और शमशानों में जा कर लाशों के लगते अंबारों का अनुभव बिना मन में 'पुनर्जन्म' और 'पापमुक्ति' के विचार लिए महसूस किया जा सकता है जहां लाशों को बिना 'राम नाम सत है' और 'दुआ पढ़ने' की औपचारिकता निभाने के महज मांस और हड्डी के लोथड़े की तरह जलाया या दफनाया जा रहा है. यकीन दिलाता हूं, दिमाग के सारे पापपुण्य, कर्मकांड वाले विचारों के परख्चे उड़ जाएंगे, फिर उमड़ने लगेंगे वह जीवंत सवाल जो कई सालों से हम सब ने, सरकारों से तो दूर की बात, खुद ही से पूछने छोड़ दिए थे.

आईटीओ के पास स्थित कब्रिस्तान शहर का सब से बड़ा कब्रिस्तान है. यह 'जदीद कब्रिस्तान अहले इसलाम' के नाम से जाना जाता है. यह दिल्ली पुलिस हैडक्वार्टर के पीछे लगभग 200-250 मीटर भीतर जा कर शुरू होता है. इस का क्षेत्रफल लगभग 50 एकड़ है.

इसी कब्रिस्तान में अपनी 65 वर्षीया मां नसीम बानो को दफनाने 44 वर्षीय अरशद आया था जिस के मुंह में कर्म और पापपुण्य के टंटे नहीं थे बल्कि सरकार को ले कर भारी रोष था. सरिता पत्रिका से बात करते हुए अरशद आलम कहते हैं, "कोरोना इतना नहीं है जितना सरकारों ने कर दिया है. जिस तरह के अस्पतालों को बनाने की जरूरत एक साल में होनी थी वह बिलकुल भी नहीं बनाए गए. शुरुआत से ही अस्पतालों में बैड नहीं थे, औक्सीजन नहीं थी, मशीनें नहीं थीं, बल्कि कहें कि अस्पताल ही नहीं थे.

"अरविंद केजरीवाल कहते फिर रहे हैं कि उन के पास व्यवस्था चाकचौबंद है लेकिन दिल्ली का हाल सब के सामने है. लोग सिर्फ दवाइयों की कमी, औक्सीजन की कमी और ट्रीटमैंट की कमी से मर रहे हैं. इस में अब आपदा वाली बात नहीं है. इतने समय में सरकारों को संभल जाना चाहिए था. लेकिन नहीं, समस्या यह है कि हिंदुस्तान चल रहा है हिंदू और मुसलिम से. लोग राममंदिर की कीमत चुका रहे हैं. जो हमारे हिंदू भाई हैं उन्हें इस सरकार ने मंदिर में फंसा दिया है.'

कब्रिस्तान में कोरोना के लिए अलग से ढाई एकड़ जमीन अलौट की गई है जहां काफी हद तक जगह कब्रों से भर भी चुकी है. कोरोना का मंजर, आंखोंदेखी तौर पर, इसी से समझा जा सकता है कि 20 अप्रैल को सुबह 11 बजे सरिता की टीम जब कब्रिस्तान में पहुंची तो वहां 2 घंटे रुकने पर ही हमारे सामने लगभग 6-7 कोरोना डैडबौडीज लाई जा चुकी थीं. कई लोग उन में से पिछले दिन के वेटिंग वाले भी थे.

मृतकों के परिजनों के मुंह में मास्क तो था लेकिन बाकी सुरक्षा के समान ग्लब्स, पीपीई किट, सोशल डिस्टैंस इत्यादि बिलकुल भी नहीं था. और यह बताने के लिए कोई औफिशल मौजूद नहीं था कि कितने लोग एकत्रित होने चाहिए और किस तरह की गाइडलाइंस फौलो की जानी चाहिए. कई चीजों को ले कर कब्रिस्तान के वाइस प्रेसिडेंट और केयरटेकर हाजी शमीम अहमद से फोन पर बात हुई.

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