जीएनसीटी दिल्ली एक्ट 2021 केजरीवाल सरकार पर मोदी का कब्जा
Sarita|April Second 2021
आखिर दिल्ली पर राज किस का है? एक तरफ 70 में से 62 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत से जीती आम आदमी पार्टी की सरकार है, दूसरी तरफ मोदी सरकार के बनाए उपराज्यपाल हैं. दिल्ली के अधिकारों के घाव को अब कुरेदा नहीं जा रहा, बल्कि इस बार कानूनी जूतों से मसल डाला गया है.
रोहित

कुछ ही रोज पहले प्रकाशित वर्ल्ड फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में देश की मौजूदा भाजपा सरकार पर नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के हनन के कई आरोप थे. इस रिपोर्ट के आने के बाद भारत में वाजिब खलबली मची जरूर थी लेकिन पक्ष से ले कर विपक्ष तक ने इसे एकसाथ ठंडे बस्ते में डाल दिया. न तो सत्तापक्ष ने जरूरत समझी कि उस की सरकार पर ऐसे गहन आरोप लगाने वालों पर ऐक्शन लिया जाए और न विपक्ष ने यह जरूरत समझी कि सरकार को इस मसले पर घेरा जाए.

खैर, अमेरिकी वर्ल्ड फ्रीडम हाउस की इस रिपोर्ट की संवेदनशीलता न सिर्फ मोदी के अथौरिटेरियन रूप से सरकार चलाए जाने के रवैए से थी, बल्कि भारत के सब से मजबूत स्तंभ कहे जाने वाले न्यायालय की कार्यवाहियों को संदेहों में धकेले जाने से भी थी. रिपोर्ट में कहा गया, "मोदी कार्यकाल में भारत की ज्युडिशियल स्वतंत्रता भी प्रभावित हुई है." नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों के संदर्भ में कहा गया कि मानवाधिकार संगठनों पर दबाव बढ़ गया है, शिक्षाविदों व पत्रकारों को डराया जा रहा है और बड़े हमलों का दौर चल रहा है. रिपोर्ट में मौजूदा सरकार के बनाए ऐसे कानूनों का हवाला दिया गया जिन्होंने नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का हनन किया.

इस रिपोर्ट को भ्रमित, असत्य और गलत' बताया. सरकार ने देश के संघीय ढांचे का हवाला दिया और कहा, "यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि भारत में संघीय ढांचे के तहत कई राज्यों में चुनाव प्रक्रिया के माध्यम से अलगअलग पार्टियों का शासन है और यह उस निकाय यानी चुनाव आयोग के तहत है जो स्वतंत्र व निष्पक्ष है.'

सरकार जैसेतैसे इस रिपोर्ट से पल्ला झाड़ ही पाई कि इसी महीने उस पर एक और रिपोर्ट का विस्फोट हो गया. स्वीडन के वी-डेम इंस्टिट्यूट ने ताजा रिपोर्ट जारी की जिस में दावा किया गया कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कम हुई है और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले देश ने इस तरह की सैंसरशिप शायद ही कभी देखी है.

रिपोर्ट के मुताबिक, सैंसरशिप के मामले में भारत की स्थिति अब पाकिस्तान के समान है और बंगलादेश व नेपाल से बदतर है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत में मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने देशद्रोह, मानहानि और आतंकवाद के कानूनों का इस्तेमाल अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए किया है. साथ ही, भाजपा के सत्ता संभालने के बाद 7 हजार से अधिक लोगों पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए हैं. और जिन पर आरोप लगे हैं उन में से ज्यादातर लोग सत्ता की विचारधारा से असहमति रखते हैं. यहां तक कि, इस रिपोर्ट में इसे भारत के संदर्भ में 'चुनावी निरंकुशता' की संज्ञा दी गई.

इस बात का ज्वलंत उदाहरण 'एनसीटी दिल्ली एक्ट-2021' के रूप में नयानया सामने आया है.

जीएनसीटी दिल्ली एक्ट 2021

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 28 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) विधेयक 2021 को स्वीकृति प्रदान कर दी है जो अब कानून बन गया है. यह कानून उपराज्यपाल की शक्तियों को बढ़ाता है और दिल्ली में निर्वाचित सरकार की शक्ति को सीमित करता है. अब इस के कानून बन जाने के बाद यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि आखिर दिल्ली पर राज किस का है, दिल्ली पर अधिकार किस का है ? एक तरफ 70 में से 62 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत से जीती आम आदमी पार्टी की सरकार है, दूसरी तरफ केंद्र सरकार के नियुक्त उपराज्यपाल हैं.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे 'असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक' करार दिया. वहीं, डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने इसे संविधान की व्याख्या के खिलाफ जाने वाला और जनता द्वारा चुनी सरकार की शक्तियां कम कर एलजी को निरंकुश शक्तियां प्रदान करने वाला बताया.

साधारण भाषा में कहें तो यह कानून कहता है कि दिल्ली का प्रतिनिधित्व अब जनता द्वारा चुने हुए मुख्यमंत्री नहीं करेंगे बल्कि केंद्र द्वारा चुने हुए उपराज्यपालरूपी बौस करेंगे. यह कानून अधिकारों के हस्तांतरण से है जिस में चुने प्रतिनिधि बिना उपराज्यपाल की आज्ञा के कोई नियमकानून नहीं बना पाएंगे.

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