बिगड़ती अर्थव्यवस्था का जिम्मेदार कौन कोरोना या सरकार की नीतियां
Sarita|April First 2021
देश की अर्थव्यवस्था इस समय नाजुक दौर से गुजर रही है. लोगों के पास खर्च करने को पैसा नहीं है जबकि महंगाई चरम पर है. सरकार इस स्थिति का जिम्मेदार कोरोना को बता रही है. लेकिन क्या सिर्फ कोरोना ही जिम्मेदार है?
रोहित और शाहनवाज

केंद्र की सत्ता पर काबिज नरेंद्र मोदी की सरकार के 7 वर्षों के कार्यकाल में जिस चीज का सब से अधिक नुकसान आमजन और व्यापारियों को उठाना पड़ा है वह है सरकार की दोषपूर्ण नीतियों के चलते देश की लगातार गिरती अर्थव्यवस्था. सत्ता में आने के बाद से ही सरकार ने उन नीतियों पर जोर दिया जिस ने अर्थव्यवस्था को मुट्ठीभर लोगों के हाथों में मोनोपोलाइज करने का काम किया. इस से देश का बड़ा हिस्सा दरकिनार हो गया. मंझोले, लघु उद्योगी व उन से सीधे जुड़े करोड़ों मजदूर परिवारों व छोटेबड़े दुकानदारों, व्यापरियों को इन नीतियों का भारी खमियाजा लगातार भुगतना पड़ रहा है.

वैसे तो मोदी कार्यकाल में बिगड़ती अर्थव्यवस्था को ले कर कई नामी अर्थशास्त्रियों ने इस की शुरुआत 2016 में हुई नोटबंदी से बताई लेकिन सरकार इसे मानने को कभी तैयार नहीं हुई और इसे कालेधन व आतंकवाद पर नकेल कसने वाले हथियार के तौर पर स्वघोषित करती रही व इसे अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला कदम कहती रही.

नोटबंदी के बाद जीएसटी प्रक्रिया ने भी देश के छोटेबड़े सभी बाजारों को नुकसान पहुंचाया. लेकिन सरकार लगातार जनता में यह भ्रम फैलाती रही कि इन कायदेकानूनों के दूरगामी फायदे मिलेंगे. ये नीतियां देशहित में मजबूत कदम साबित होंगी. इन्हीं वादों में समयसमय पर 'विश्व गुरु', '5 ट्रिलियन इकोनौमी' और 'चाइना-अमेरिका की इकोनौमी को टक्कर' देने का सपना भी शामिल होता गया.

कटु सत्य यह है कि इन 7 सालों के मोदी कार्यकाल में देश की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक गिरावट झेल रही है. देश में रिकौर्ड बेरोजगारी दर्ज की गई है. लगातार बढ़ती महंगाई आमजन को त्रस्त कर रही है. ऐसे में मोदी सरकार ने इन बिगड़ते हालात का जिम्मेदार कोरोना को बताया है और अपने हाथ खड़े कर, जनता से कोई सरोकार न रखते हुए उसे आत्मनिर्भर बनने को भी कह दिया है. लेकिन मुख्य सवाल यह है कि क्या देश के बिगड़ते हालात का जिम्मेदार सिर्फ कोरोना है? क्या रोजगार की समस्या लौकडाउन के बाद ही देखने को मिली है? क्या इकोनौमी अभी से ही बरबाद होनी शुरू हुई? और बड़ा सवाल यह कि महंगाई का जिम्मेदार कोरोना है या सरकार की पहले की वे नीतियां हैं जिन का परिणाम आज देश के लोगों को भुगतना पड़ रहा है?

एमएसएमई अर्थव्यवस्था की रीढ़

दिल्ली अपनेआप में सारा देश समेटे हुए है. यहां अमीर व शिक्षित ही नहीं, गरीब व सताए हुए, लड़कियां, दलित, मुसलिम विभिन्न राज्यों से आ कर बसे हुए हैं. देश को जानने के लिए दिल्ली का दिल परखना कारगर है. दिल्ली के व्यापारी, मजदूर किन हालात में हैं, यह पता करते ही देश की हालत पता चल जाती है. इन्हीं उक्त सवालों को ले कर 'सरिता' की टीम ने दिल्ली के स्मौल स्केल इंडस्ट्रियल इलाकों का दौरा किया. ये माइक्रो स्मौल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) सैक्टर के अंतर्गत आते हैं और अभी इस समय यह सैक्टर बिगड़ती अर्थव्यवस्था की भारी मार झेल रहा है.

एमएसएमई का मतलब सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम है. दुनिया में एमएसएमई सैक्टर का सब से बड़ा जाल चीन में है. इस लिस्ट में भारत दूसरे स्थान पर है. सूक्ष्म उद्यम का अर्थ, वे उद्यम जहां 10 से कम कर्मचारी काम करते हों. देश में ऐसे उद्यमों की संख्या करीब 6 करोड़ 3 लाख के आसपास है. ऐसे ही लघु उद्योग में 10 से ले कर 50 कर्मचारी काम करते हैं. इन की देश में कुल संख्या मौजूदा समय में 3 लाख 30 हजार के आसपास है. वहीं, मध्यम उद्योग में यह संख्या बढ़ कर 50 से 250 कर्मचारियों तक हो जाती है जिन की संख्या 5 हजार के आसपास है. ये सभी उद्यम मिल कर देश में पारंपरिक से ले कर हाईटैक आइटम के 6 हजार से ज्यादा उत्पादों के निर्माण में लगे हुए हैं. इन में कुल मिला कर 11 करोड़ भारतीय कार्यरत हैं.

7 दिसंबर, 2020 को 3-दिवसीय टीआईई ग्लोबल समिट के उदघाटन सत्र में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, "एमएसएमई सैक्टर वर्तमान में भारत के कुल निर्यात का 48 फीसदी निर्यात करता है. एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है." लेकिन यह रीढ़ आज किस हालत में है और इस की गिरती हालत का जिम्मेदार कौन है, इस की सुध सरकार को नहीं है.

व्यापारियों में सरकारी नीतियों से निराशा

'सरिता' टीम दिल्ली के नजफगढ़ रोड पर स्थित रामा रोड इंडस्ट्रियल इलाके में गई. इस इलाके में पहले बड़ेबड़े सरकारी और निजी प्लांट हुआ करते थे, जहां सैकड़ों कर्मचारी काम किया करते थे लेकिन आज यहां सरकारी प्लांट बंद कर दिए गए हैं और बड़े निजी प्लांट कहीं दूर शिफ्ट हो चुके हैं.

यहां अब स्मौल इंडस्ट्रीज ही बची हैं. वहां देखने में यह आया कि यहां मालिकों से ले कर मजदूरों की स्थिति काफी हलकान है. वे एक प्रकार की भारी असुरक्षा में जी रहे हैं. कब क्या सरकार द्वारा नया घटित हो जाए, इसे ले कर आतंकित हैं. औफ रिकौर्ड तो मालिक तबका अपनी परेशानियां खुल कर बताता है लेकिन औन रिकौर्ड बात करने से कतराता है. मालिक तबका कुछ बोलने से डरता है कि न जाने उन पर कब क्या कार्यवाही हो जाए. इस इलाके में कई पुरानी छोटी फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं. जो चालू हैं भी, उन में चरमराए बाजार के चलते असर साफ देखा जा सकता है. कहीं मजदूरों की छंटनी की गई है तो कहीं ओवरटाइम काम काफी कम होता है.

पिछले 18 सालों से दिल्ली के रामा रोड इंडस्ट्रियल इलाके (कर्मपुरा) में ग्राफिक डिजाइनिंग और बोर्ड साइनेज बनाने वाले मंझोले व्यापारी राजकुमार ने 'सरिता' टीम से बात की. उन का औफिस रामा रोड पर सावन बैंक्वेट और ला अमौर बैंक्वेट के बीच से निकलने वाली गली नंबर 54 में है. उन का यह औफिस पहली मंजिल पर 400 गज के स्पेस में किराए पर है. नोटबंदी और जीएसटी की मार झेलतेझेलते उन का काम दोबारा से पटरी पर आने ही लगा था कि लौकडाउन ने उन का पूरा बिजनैस खा लिया. पहले जहां 40 कर्मियों से औफिस में खुशनुमा माहौल था, अब वहां मात्र 3 लोग काम कर रहे हैं.

हमारी जब उन से बात हुई तो उन के मुंह से उदास मुसकान में पहला वाक्य निकला, "आप को इस 'बरबाद नगर' का पता किस ने दिया?" फिर अपने लैपटौप में डिजाइनिंग के काम में 5 मिनट के लिए व्यस्त हुए. काम निबटाने के बाद वे हम से फिर से मुखातिब हुए.

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