डिजिटल मीडिया पर कसती नकेल
Sarita|March Second 2021
देश में तमाम डिजिटल प्लेटफौर्स पर प्रसारित होने वाले कंटेंट को ले कर सरकार द्वारा 30 पृष्ठों के दिशानिर्देश जारी किए गए हैं. इन दिशानिर्देशों के जारी किए जाने के बाद सरकार की मंशा पर कई सवालिया निशान खड़े हो गए हैं. इसे व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता पर चोट भी समझा जा रहा है. ऐसा क्यों और सरकार को ये दिशानिर्देश क्यों जारी करने पड़े, जानें इस खास रिपोर्ट में.
शांतिस्वरूप त्रिपाठी

कुछ समय से देश के एक सैक्शन द्वारा ओटीटी प्लेटफोर्स पर प्रसारित हो रही फिल्मों, डौक्यूमैंट्री और वैब सीरीज को सैंसर बोर्ड के तहत लाने की मांग उठती रही है. इसी मांग के अनुरूप नवंबर 2020 में सरकार ने डिजिटल प्लेटफौर्म व ओटीटी आदि को सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन लाने का फैसला लिया था. उधर रचनात्मक सामग्री को सैंसर करने की मांग देश का एक तबका लगातार उठाता रहा. मगर सरकार भी समझ रही थी कि सैटेलाइट चैनल हों, ओटीटी प्लेटफोर्स हों या सोशल मीडिया हो, इन्हें सैंसरशिप के दायरे में लाना व्यावहारिक नहीं है.

ये सारे प्लेटफौर्स अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत संचालित होते हैं. वहीं, बौलीवुड से मनोज बाजपेयी, महेश भट्ट, हंसल मेहता, स्वरा भास्कर, रिचा चड्ढा सहित तमाम हस्तियां सैंसरशिप का लगातार विरोध करती रहीं.

एमेजौन पर अली अब्बास जफर निर्मित वैब सीरीज 'तांडव' के प्रसारण के साथ ही कई हिंदूवादी संगठनों व हिंदू नेताओं ने हिंदू धर्म व देवीदेवताओं के साथ खिलवाड़ करने का मुद्दा उठाते हुए हंगामा खड़ा कर दिया. जिस के चलते कुछ लोग अदालत में याचिका ले कर पहुंच गए. सरकार को हरकत में आना ही था. सूचना प्रसारण मंत्रालय ने एमेजौन की अपर्णा पुरोहित व वैब सीरीज के निर्माताओं को तलब किया. 'तांडव' के निर्माता व कलाकारों ने ट्विटर पर बयान जारी कर माफी मांगी और वैब सीरीज से कुछ दृश्यों को हटा दिया.

अफसोस की बात यह है कि देश में सर्वधर्म व सभी समान हैं की बात करने वाली सरकार या किसी भी इंसान का ध्यान इस वैब सीरीज में दलितों के अपमान की तरफ नहीं गया. वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'तांडव' के खिलाफ दायर याचिका व पुलिस में दर्ज एफआरआई के ही संदर्भ में एमेजौन की अपर्णा पुरोहित की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि उन्हें जो अपराध करना था वह तो वे कर चुकीं, इसलिए अब उन्हें सजा के लिए तैयार रहना चाहिए." माननीय न्यायाधीश ने इस पर अपनी लंबीचौड़ी टिप्पणी की है.

इधर 'तांडव' के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने ओटीटी प्लेटफौर्स, डिजिटल यानी वैब मीडिया व सोशल मीडिया को ले कर दिशानिर्देश जारी करने की मंशा जाहिर कर दी.

आननफानन सरकार की तरफ से दिशानिर्देश तैयार किए गए और गुरुवार, 25 फरवरी को केंद्रीय आईटी व कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद तथा सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्रैस कौन्फ्रेंस कर इन दिशानिर्देशों, आईटी एक्ट 2021 और नियम 19बी व 69ए का भी उल्लेख किया. आननफानन शब्द इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इन दिशानिर्देशों में काफी विरोधाभास है. दूसरी बात, एक ही मसले पर एक ही सरकार के 2 नियम कैसे हो सकते हैं?

सरकार के नए निर्देश

सोशल मीडिया और ओटीटी के प्रयोग को ले कर सरकार की यह गाइडलाइन त्रिस्तरीय नियमन है. प्रथम स्तर पर यह नियमन रचनात्मक सामग्री प्रकाशित करने वाले प्लेटफौर्म के स्तर पर होगा. दूसरे स्तर पर स्वनियमन का प्रावधान है जिसे लंबे समय से लोग समाचार चैनलों व सैटेलाइट टीवी चैनलों के संदर्भ में देखते आए हैं और तीसरे स्तर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार का नियमन होगा. नियमन के इस नए प्रावधान के चलते ओटीटी प्लेटफौर्स , सोशल मीडिया व डिजिटल मीडिया का काम और औपचारिकताएं पहले से बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी. इतना ही नहीं, यह भी संभव है कि आम इंसान जिस तरह का कंटैंट देखना चाहता है वह उसे देखने को न मिले.

पहली नजर में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफोर्स के लिए जो गाइडलाइंस जारी की हैं उन में रचनात्मकता पर अंकुश लगाने वाला मसला नजर आता है. सरकार इन गाइडलाइंस के बहाने कहीं न कहीं अपरोक्ष रूप से आम इंसान के अंदर डर का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रही है, तो वहीं डिजिटल न्यूज पोर्टल पर शिकंजा कसने की तैयारी भी लगती है.

हम यह मान सकते हैं कि सरकार के नए दिशानिर्देशों के चलते आने वाले वक्त में इस प्रावधान से सोशल मीडिया पर कंटैंट के साथ ही कंटैंट की भाषा का फिल्टरेशन हो सकेगा. सरेआम जो गाली देने और ट्रोल किए जाने का काम होता है उस पर शायद विराम लग सकेगा और सरकार कुछ लोगों को दोषी बता कर सजा भी दे दे या उन पर कार्रवाई कर सके. मगर हकीकत में सरकार जिस के खिलाफ कार्रवाई करने का मन बना रही है उस के खिलाफ वह इन दिशानिर्देशों या नए आईटी कानून के बिना भी कर सकती थी. पर सरकार ने कभी किया नहीं.

एक टीवी चैनल पर इसी तरफ इशारा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने कहा, "मेरा मानना है कि वर्तमान कानून व न्यायव्यवस्था के चलते नए दिशानिर्देश लाने की जरूरत नहीं थी. एक तरफ सरकार कम कानूनों की बात करती है तो दूसरी तरफ नएनए कानून लाती जा रही है. यदि आज मैं भड़काऊ बात लिखता हूं तो क्या सरकार मेरे खिलाफ कार्रवाई करने के लिए नए कानून बनाने का इंतजार करती. जी नहीं, जब सरकार को कार्रवाई करनी होती है तब वह करती है.

"मुझे लगता है कि इन नए दिशानिर्देशों के साथ सरकार डिजिटल प्लेटफौर्स को अपने नियंत्रण में लाने की पूरी कोशिश में है. मसलन, इस में ओवरसाइट कमेटी की बात की गई है. इस में कौनकौन होगा? इस में गृहमंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय, कानून मंत्रालय, आईटी मंत्रालय और बाल व महिला मंत्रालय से जुड़े अधिकारी होंगे जोकि किसी भी शिकायत को ले गंभीर बता सकते हैं. फिर, उस कंटैंट को हटाने व उस प्लेटफौर्म को बंद करने की बात कर सकते हैं."

पीछे का सच

कई लोग सोशल मीडिया व डिजिटल मीडिया इत्यादि के संदर्भ में दिशानिर्देश लाने के समय पर भी सवाल उठा रहे हैं. ऐसे लोगों की राय में सरकार का अपने अंदर का डर भी एक वजह हो सकती है, क्योंकि पिछले वर्ष के दौरान सोशल मीडिया दिनप्रतिदिन अतिशक्तिशाली होता गया है.

कोरोना महामारी और लौकडाउन के वक्त हर आम इंसान के लिए मनोरंजन के साधन के तौर पर ओटीटी प्लेटफौर्म एकमात्र साधन बन कर उभरा. तो वहीं, अपना संदेश अपने परिचितों तक पहुंचाने के लिए व्हाट्सऐप, टैलीग्राम, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्स और अपने स्मार्टफोन पर ही खबरें देख लेने की प्रवृत्ति विकसित होने के साथ ही डिजिटल न्यूज पोर्टलों की संख्या तेजी से बढ़ी. इन के उपयोगकर्ताओं की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई.

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, एक भारतीय हर दिन अपने स्मार्टफोन पर लगभग साढ़े 4 घंटे व्यस्त रहता है. जबकि 2019 में वह सिर्फ 3 घंटे ही बिताता था. 2020 में 2019 के मुकाबले 30 प्रतिशत ऐप्स ज्यादा डाउनलोड की गईं. जी न्यूज की मानें, तो हर मिनट पर ऐप्स में 2,75,598 रुपए खर्च किए जा रहे हैं. हर मिनट 2,08,333 लोगों की जूम पर मीटिंग, 4,04,444 घंटे की वीडियो स्ट्रीमिंग, 12,88,889 लोग वीडियो या वौयस कौल कर रहे हैं. हर मिनट फेसबुक पर 1,47,000 फोटो अपलोड की गईं. जबकि हर मिनट 4,16,66,667 मैसेजेज शेयर किए गए. फेसबुक पर 41 करोड़, व्हाट्सऐप पर 45 करोड़, ट्विटर पर 1.7 करोड़ भारतीय सक्रिय हैं. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त सोशल मीडिया कितना ताकतवर हो सकता है. ऐसे में इस पर लगाम लगाने की सरकार को जरूरत महसूस हुई.

इन दिशानिर्देशों के दुष्परिणाम

अब तक सस्ते मोबाइल हैंडसैट, डेटापैक और नैटवर्क की सुविधा के चलते देश की एक बड़ी आबादी बिना प्रावधानों की पेचीदगियों को जानेसमझे इस का इस्तेमाल करती आई है. पर अब वह अबाध गति से इस का प्रयोग करने में हिचक महसूस करेगी. इस का असर यह होगा कि इस से सोशल मीडिया प्लेटफोर्स की लोकप्रियता पर असर पड़ेगा. इस का सीधा प्रभाव मोबाइल, नैटवर्क, सूचना एवं मनोरंजन उद्योग से जुड़े राजस्व पर भी पड़ सकता है. आखिर हर इंसान सोशल मीडिया प्लेटफौर्स तक पहुंचने से पहले कई स्तर पर ग्राहक और उपभोक्ता की भूमिका से गुजर रहा होता है.

आवाज को दबाने का प्रयास

सोशल मीडिया के ये नए प्रावधान यदि अनर्गल, तथ्यहीन, फेक सामग्री, नफरत, हिंसा और ट्रोल भाषा पर लगाम कसने के लिए लाए गए हैं तो हमें कुछ दिन इस के परिणाम पर नजर रखनी चाहिए. पर फिलहाल सरकार की यह सारी कवायद सोशल मीडिया पर आम इंसान की आवाज को दबाने का प्रयास भी लग रहा है. आर्टीफिशियल इंटेलिजैंस के तहत आम इंसान की निजता का सोशल मीडिया पर जो हनन हो रहा है उस पर सरकार चुप है.

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