महिलाओं के परिधानों में पौकेट अ आर्थिक मजबूती का परिचायक
Sarita|November Second 2020
कमाऊ युवतियां आज ऐसे कपड़ों को तलाशती हैं जिन में पौकेट्स हों, ताकि छोटेमोटे सामान को हाथ में कैरी करने की जगह पौकेट में रखा जा सके. यह दिखाता है महिलाएं आर्थिकतौर पर खुद को नियंत्रित करने की तरफ आगे बढ़ रही हैं.
रोहित

फैशन से जुड़ी बातें मेरे लिए हमेशा अनजान रही हैं. किस पर कौन से कपड़े, फुटशूज या हेयरकट सूट करेंगे, इन विषयों में हमेशा हाथ टाइट रहा है. पुरुष चेतना के तौर पर विकसित हुआ, तो मुख्यतया पुरुष से जुड़ी चीजें ही जीवन में थोड़ीबहुत जानसमझ पाया. लेकिन उस में भी अधिकतम कोशिश यही रही कि जरूरत के हिसाब से ही स्टाइल स्टेटमैंट को अपनाया जाना चाहिए.

पिछले साल दीवाली के मौके पर मेरी चचेरी बहन का मेरे घर आना हुआ था. यकीन मानिए, यह कहना सुकून देता है कि वह इस समय हमारे परिवार में सब से सफल सदस्यों में से एक है. शानदार नौकरी, अच्छी सैलरी, इंडिपेंडेंट लाइफ, और काफी खुशमिजाज व्यक्तित्व. कपड़ों के पहनावे से ले कर बात करने के सलीके तक वह आत्मविश्वास से भरी लगती है और आसानी से लोगों के ध्यान का केंद्रबिंदु बन जाती है.

जिस दिन वह घर आई, उस ने गाढ़े नीले रंग की ट्रैडिशनल प्रिंटेड साड़ी पहनी हुई थी, जिस के बीचबीच में शानदार रंगबिरंगे फूल बने हुए थे. वह काफी सुंदर लग रही थी. मैं उसे देख हैरान हुआ. इस के 2 कारण थे जो शायद मेरी जड़त्व सोच से जुड़े हो सकते थे. पहला यह कि उस ने अब तक कभी साड़ी नहीं पहनी थी, तो अब क्यों पहनी. दूसरा, उस की साड़ी में बना साइड पौकेट था, जिस ने मेरे मन में जिज्ञासा पैदा कर दी.

पहली समस्या का जवाब इस तौर पर मिल गया कि उस पर वह साड़ी काफी जम रही थी और वह इसे मात्र फैशन का हिस्सा माने हुए थी. दूसरी साइड पौकेट वाली समस्या का सीधा जवाब तो यह था कि वह पौकेट फोन या छोटामोटा सामान रखने के मकसद से डिजाइन किया गया था लेकिन यहां सवाल सिर्फ फोन या सामान रखने से जुड़ा नहीं था, बल्कि किसी महिला के हाथ मुक्त होने और उस के पास आर्थिक ताकत के आने के संकेत से जुड़ा था.

बचपन में हम हर साल मेले के आयोजन के लिए गांव जाया करते थे. मेले में जाने के लिए हमारी कभी दादाजी से पैसे मांगने की हिम्मत नहीं होती थी. लेकिन दादी बहुत सरल व सौम्य थी, इसलिए उन पर हमारा खूब जोर चला करता था. लेकिन, दादी भी सीधे दादाजी से पैसे मांगने से कतराती थी. वे पहले से ही हमारे लिए यहांवहां से पैसे जोड़जाड़ कर अपनी साड़ी के पल्लू में गांठ बांध कर रख लिया करती थी. उस दौरान उन के पास न तो कोई पर्स था न ही कोई बक्सा. जेब तो दूर की बात थी. बस, साड़ी का पल्लू था जिस में वह अपनी जरूरत का छोटामोटा सामान बांध लिया करती थी. अमूमन आज भी है, जिन की पूरी निर्भरता अपने पतियों पर ही होती थी.

मेरी मां जिस पीढ़ी में हैं उस में भी उन की पूरी आर्थिक निर्भरता अपने पति यानी मेरे पिता पर ही रही है. चीजें बदली, तो हाथ में छोटेमोटे खर्चों के लिए छोटा सा पर्स थम जरूर गया, जिसे वह बाहर टहलते या बाजार से कोई सामान खरीदते समय अपने ब्लाउज के भीतर छिपा लेती है. लेकिन इस चीज ने दिखाया कि कभी हमारे समाज या बाजार ने महिलाओं के फैशन या कपड़ों को पुरुषों की तरह पौकेट फ्रैंडली नहीं बनाया.

पौकेट का जुड़ाव अर्थतंत्र पर पकड़ से

सोचने वाली बात यह है कि आखिर पौकेट क्यों पुरुषों के फैशन में जरूरी हिस्सा बन गया और महिलाओं के लिए अटपटा या आउट औफ फैशन बनता चला गया? जाहिर है, पौकेट को कपड़ों में आर्थिक दबदबे के सिंबल के तौर पर देखा जाता है, जो दिखाता है कि कौन आर्थिकतौर पर चीजों को नियंत्रित कर रहा है. 'जेब ढीली होना', 'अंटी में न ढेला, देखन चले मेला', 'लाख चुरा लो मोती, कड़न में जेब नहीं होती' इत्यादि कहावतें भी पैसों से संबंधित ही रहीं.

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