बिहार चुनाव परिणाम सरकारी नीतियों से दूर होता जनमत
Sarita|November Second 2020
बिहार विधानसभा चुनाव में जिन मुद्दों पर वोट होना चाहिए, उन की चर्चा में किसी ने दिलचस्पी नहीं ली. यह बात हर लिहाज से चिंताजनक है.
भारत भूषण श्रीवास्तव

बिहार विधानसभा चुनाव के और देश के कुछ राज्यों में हुए उपचुनावों के परिणामों का सियासी लिहाज से सिर्फ आंकड़ों में उलझते जाना लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी के तौर पर देखा जाना बहुत जरूरी हो चला है. बिहार विधानसभा चुनाव में शुरू से ही आंकड़ों का बोलबाला रहा कि 2015 के चुनाव में किस दल और गठबंधन ने कितनी सीटें जीती थीं. इस बात की चर्चा न के बराबर हुई कि उस चुनाव में मुद्दे क्या थे और तब और अब भी सरकार की नीतियां क्या थीं और हैं और क्या यह वोट करने का आधार नहीं होना चाहिए.

हालांकि आंकड़ों की अपनी अलग अहमियत है लेकिन इन का विचारों से कोई जमीनी मेल नहीं होता, जिस का फायदा सभी दल और उन के नेता जम कर उठाते हैं. सत्ताधारी दल चाहते हैं कि मतदाताओं का ध्यान अपनी खुद की परेशानियों और सरकारी कमियों की तरफ न जाए कि सरकार उन के लिए क्या कर रही है और जो थोडाबहुत कर भी रही है उस का फायदा, दरअसल, लोगों को मिल रहा भी है या नहीं.

आंकड़े बिहार चुनाव के

आंकड़ों के जरिए बिहार के नतीजे देख उन का संबंध अगर सरकारी नीतियों से जोड़ कर देखा जाए तो यह जान कर मायूसी ही हाथ लगती है कि वोट नीतियों पर बहुत कम संख्या में पड़े. लोगों ने यह मान लिया लगता है कि नीतीश कुमार हों या तेजस्वी यादव, दोनों उन के लिए कुछ नहीं कर सकते, इसलिए वोट एकतरफा भी नहीं पड़ा. एनडीए को जरूरी बहुमत से ज्यादा 3 यानी कुल 125 ही सीटें मिलीं. उलट इस के, महागठबंधन 110 सीटों पर सिमट कर रह गया.

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