उफ यह कमजोर वाई क्रोमोजोम
Sarita|November Second 2020
समाज न जाने क्यों बेटों को महत्त्व देता है. बेटी की बड़ाई भी की जाएगी तो मांबाप का पैमाना बेटा होता है. यानी कि नारी जाति का वजूद केवल इसलिए माने रखता है कि पुरुष की सहीसलामती बनी रहे. कैसी है यह दोगली मानसिकता?
रीता गुप्ता

बहुत ही ज्यादा मुश्किल प्रसव था परंतु अणिमा का चेहरा विजयी मुसकान से दिपदिप कर रहा था. आखिर 'वाई' क्रोमोजोम ने विजय पाई थी. पिछले 2 बार से इसी एक क्रोमोजोम के अभाव में 'एक्स' क्रोमोजोम ही बेशर्मी से पदार्पण किए जा रही थी. सिर्फ अणिमा ही क्यों पूरा परिवार ही मानो राजसूय यज्ञ में सफल हो चक्रवर्ती सम्राट बन गया था.

उस की सास तो ऐसे खुश हो रही थी कि यह कुलतारण अवतरण न लेता, तो उन की महान वंशावली मटियामेट ही हो जाती, अणिमा का पति दौड़ कर लड्डू खरीद लाया था और थाली पीटने की आवाज के बैकग्राउंड में विजित भाव से पूरी दिलदारी से लड्डू वितरण कर मानो अपने 'वाई' क्रोमोजोम को प्रचारित करने में लगा था. इन सब के बीच 2 छोटीछोटी बच्चियां शायद पहली बार उस मिठाई का स्वाद चख रही थीं और पूरे मनोयोग से लड्डू भक्षण में तल्लीन थी. पड़ोस वाली 4 बेटियों की अम्मा, दुखी भाव से, दरवाजा बंद कर थाली के शोर को कोस रही थीं. इस बार पड़ोस में बजने वाले शोक गीत के श्रवणसुख से वंचित जो रह गई थीं वे.

किसी शहर से सौ किलोमीटर अंदर एक गांव में इस पुत्ररत्न ने जन्म ले कर उतनी ही खुशियां दी थीं जितनी कोई शहर की बेटी ने आईआईटी में सफल होने पर दिया होगा. सोच तो बदली है पर शायद बेहद कम, मुट्ठीभर लोगों की. आज भी 'बेटा' टर्म अपनेआप में 'बेटी' से उच्च होता है. जैसे, लोगबाग कहेंगे

"वाह विनोदजी, आप ने तो अपनी बेटियों की परवरिश बेटों से बढ़ कर की है.'

या

"मेरी बेटी किसी बेटे से कम है क्या?"

यानी, यहां बड़ाई बेटी की हो रही है पर यूनिट या पैमाना 'बेटा' ही है. यहां अंतर्मन में बेटे की चाहत बहुत गहरी पैठ की हुई है. पहले जहां हर कोई ऐसी ही सोच रखता था, अब बदलाव की लहर में कम से कम पढ़ेलिखे मध्यम वर्ग की सोच में कुछ बदलाव आया है. यह सुखद है.

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