कोई भी संविधान नहीं बदल सकता
Outlook Hindi|December 28, 2020
संसद की नई इमारत के प्रस्ताव से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला खासे उत्साहित हैं। उन्हें पूरा भरोसा है कि 2022 में भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर संसद का सत्र नए भवन में आयोजित होगा। उनका कहना है कि किसी भी संसदीय लोकतंत्र में संविधान उसकी आत्मा होती है और कोई भी सरकार उसकी मूल भावना में बदलाव नहीं कर सकती। उन्होंने आउटलुक के एडिटर-इन-चीफ रूबेन बनर्जी और पॉलिटिकल एडिटर भावना विजअरोड़ा से खास बातचीत की है। उसके मुख्य अंश:

• आप लोकतंत्र के मंदिर में लोकसभा के पीठासीन अधिकारी हैं। क्या आपको लगता है कि भारत में अब भी मजबूत लोकतंत्र है?

निश्चित तौर पर भारत में लोकतंत्र बेहद मजबूत है। आप इसे चुनावी प्रक्रिया में लोगों के भरोसे और भागीदारी के रूप में देख सकते हैं। 1952 से अब तक 17 लोकसभा और 300 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता गया है, जो लोकतंत्र की मजबूती दर्शाता है। इसके अलावा हमने शिक्षा के विकास में लंबा सफर तय किया है। जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ती है, वह लोकतंत्र को मजबूत करने में अहम योगदान देती है। लोग मुद्दों पर चर्चा करते हैं, उनके बारे में जानकारी लेते हैं और उसके आधार पर बड़ी संख्या में वोट डालकर अपनी सरकार चुनते हैं। पिछले 17 आम चुनावों में आठ बार सरकारें बदली हैं। नई सरकार को बेहद सहजता से सत्ता का हस्तांतरण हुआ है, जो हमारी संविधान की मजबूती को दिखाता है। संविधान में बड़े स्पष्ट तरीके से विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिका परिभाषित की गई है।

• हाल ही में गुजरात के केवडिया में आयोजित अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि कई बार न्यायपालिका अपने दायरे से बाहर चली जाती है, जबकि कई लोगों का मानना है कि न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है। इस पर आपका क्या कहना है?

सम्मेलन में जब यह मुद्दा सामने आया तो उस समय चर्चा का विषय यह था कि विधायिका और न्यापालिका आपस में बेहतर सहयोग कर कैसे लोकतंत्र को मजबूत कर सकते हैं।' उप-राष्ट्रपति की तरह सभी ने अपने विचार रखे थे। मेरा मानना है कि जब संविधान ने हर चीज को स्पष्ट तरीके से परिभाषित कर दिया है, तो यह महत्वपूर्ण है कि सभी, तय कर्तव्यों के अनुसार काम करें। लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को आपस में मिलकर काम करना चाहिए और किसी को भी अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए। यह अच्छे से चल भी रहा है। अगर कोई विवाद है तो हम साथ बैठकर चर्चा कर सकते हैं। संसद कोई कानून बना भी देती है, तो उसके बावजूद न्यायपालिका के पास उसकी समीक्षा करने का अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायपालिका कानून बनाने में लग जाए और कार्यपालिका, विधायिका के काम करने लगे। अगर लोग इन मूल्यों पर नहीं चल रहे होते तो भारत एक लोकतांत्रिक गणतंत्र नहीं होता और कार्यपालिका देश पर शासन कर रही होती। लोकतंत्र में कार्यपालिका का एक ही काम होता है कि वह चुनी हुई सरकार के लिए गए फैसले को नियमों और प्रक्रियाओं के तहत लागू करे।

• जैसा कि उप-राष्ट्रपति ने कहा, क्या आपको भी लगता है कि न्यायपालिका दायरे से बाहर जा रही है?

हर व्यक्ति के अपने विचार होते हैं। उपराष्ट्रपति एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं, उन्होंने अपनी राय रखी है।

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कोई भी संविधान नहीं बदल सकता

संसद की नई इमारत के प्रस्ताव से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला खासे उत्साहित हैं। उन्हें पूरा भरोसा है कि 2022 में भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर संसद का सत्र नए भवन में आयोजित होगा। उनका कहना है कि किसी भी संसदीय लोकतंत्र में संविधान उसकी आत्मा होती है और कोई भी सरकार उसकी मूल भावना में बदलाव नहीं कर सकती। उन्होंने आउटलुक के एडिटर-इन-चीफ रूबेन बनर्जी और पॉलिटिकल एडिटर भावना विजअरोड़ा से खास बातचीत की है। उसके मुख्य अंश:

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