एमएसपी तो बाजार के भी हित में
Outlook Hindi|December 28, 2020
इसके कारण देश के कृषि बाजारों में कीमतों में उतार-चढ़ाव 20 से 25 फीसदी तक कम, नेताओं ने इसका इस्तेमाल वोट जुटाने में भी किया
अजित कुमार झा

मुक्त बाजार बनाम सरकारी नियम। केंद्र बनाम राज्य। केंद्र सरकार बनाम किसान। किसानों के विरोध प्रदर्शन और कृषि संकट से जो बहस उभरी है, उसे इन्हीं तीन विरोधाभासों से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत काफी जटिल है और उस पर काफी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। करीब दो सप्ताह से दिल्ली की सीमा पर विरोध प्रदर्शन करने वाले किसान संगठनों की दो प्रमुख मांगें हैं। पहला, तीनों नए कृषि कानूनों को रद्द किया जाए और दूसरा, किसानों से सभी उत्पादों की कम से कम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद का कानूनी प्रावधान हो। केंद्र सरकार ने कानून वापस लेने की संभावना से इनकार किया है, लेकिन एमएसपी जारी रखने की बात वह लिखकर देने को तैयार है। अलबत्ता कानूनी दर्जा देने को तैयार नहीं है। 1960 के दशक में लगातार कई साल सूखा पड़ने और देश के कई हिस्सों में अनाज की लूट के बाद 1965 में पहली बार एमएसपी व्यवस्था लाई गई। अनाज की काफी कमी थी, इसलिए उपज बढ़ाना और बाजार मूल्य में अचानक तेज गिरावट से किसानों को सुरक्षित करना इसका मकसद था। कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय किया जाता है, जिस पर सरकारी एजेंसियां खरीद करती हैं।

बाजार समर्थक दशकों पुरानी अनाज संकट की स्थिति और मौजूदा सरप्लस की स्थिति की तुलना करते हुए 'एक देश एक बाजार' की बात करते हैं। उनका मानना है कि नए सुधारों से किसानों को नए विकल्प मिलेंगे, अभी एमएसपी व्यवस्था में किसान कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) से जुड़े होते हैं।

इक्रियर के प्रोफेसर अशोक गुलाटी कहते हैं, "एमएसपी 1960 के दशक के मध्य में आए अनाज संकट का परिणाम है। उसके बाद भारतीय कृषि काफी बदल चुकी है। हम अनाज की कमी से सरप्लस की स्थिति में आ गए हैं। सरप्लस अर्थव्यवस्था में अगर हम बाजार की भूमिका नहीं बढ़ाएंगे और कृषि को मांग आधारित नहीं करेंगे तो एमएसपी से बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है।"

नेशनल रेनफेड अथॉरिटी के सीइओ अशोक दलवई, जो किसानों की आय दोगुनी करने की सिफारिश करने वाली समिति के चेयरमैन भी हैं, कहते हैं, "एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से महंगाई काफी बढ़ेगी और ऊंची कीमत पर कृषि उत्पादों का निर्यात मुश्किल होगा। अभी किसानों के सामने एपीएमसी मंडी और मुक्त राष्ट्रीय बाजार के रूप में विकल्प उपलब्ध हैं, जो खत्म हो जाएंगे।"

सीएसीपी के पूर्व चेयरमैन और पूर्ववर्ती योजना आयोग के सदस्य रहे अभिजीत सेन इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। वे कहते हैं, "यह कहना अतिशयोक्ति है कि एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से बड़ा आर्थिक नुकसान होगा, महंगाई काफी बढ़ जाएगी या निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएगा।" सेन के अनुसार एमएसपी, मुक्त बाजार के विचार के खिलाफ नहीं है, बल्कि इससे तो कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव से बचने में मदद मिलती है। इस तेज उतार-चढ़ाव से देश के करोड़ों किसानों का जीवन और उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है। वे कहते हैं, "अनाज सरप्लस होने की बात कहने वाले बाजार समर्थक यह क्यों भूल जाते हैं कि आज कीमतों में उतार-चढ़ाव पहले से कहीं ज्यादा होता है।'

एमएसपी को कानूनी दर्जा देने का मतलब

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