राज्य भी केंद्र को लोहे के चने चबवा सकते हैं
Outlook Hindi|December 28, 2020
झारखंड के गठन के बीस साल हुए। इन वर्षों में झारखंड की दशा-दिशा क्या रही और चुनौतियां क्या हैं? इन सवालों के साथ एक साल पूरा कर रही झामुमो-कांग्रेस गठजोड़ सरकार के युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कोरोना के दौर में खाली खजाना और विपक्ष से भी मुकाबिल हैं। उन्होंने चुनौतियों और कामकाज पर आउटलुक के नवीन कुमार मिश्र से अपने अनुभव साझा किए। बातचीत के प्रमुख संपादित अंशः

• एक साल में अपके सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?

सामाजिक सुरक्षा, क्योंकि सरकार बनते ही हम लोग गंभीर मुसीबत में फंसे। झारखंड जैसे पिछड़े राज्य के लिए वैश्विक महामारी कोविड-19 बड़ी चुनौती थी। देश में अफरातफरी मची थी। ऐसे में बाहर से कामगारों को सुरक्षित तरीके से लाए, घर तक पहुंचाए। मृत्यु का आंकड़ा भी झारखंड में एक हजार से पार नहीं गया। यह देश में सबसे बेहतरीन प्रबंधन था। न मुकम्मल अस्पताल थे, न जांच की व्यवस्था थी। कोरोना के दौर में ही इनकी व्यवस्था की गई जबकि देश में इस दौरान आवागमन बंद रहा।

• वह जो आप करना चाहते थे, नहीं कर पाए। किस इलाके में फोकस रहेगा?

सरकार बनने के बाद हम लोगों ने सोच रखा था कि राज्य को एक गति देनी है। ऐसी लकीर खीचें जो इतनी लंबी हो कि उससे बड़ी लकीर खींचनी मुश्किल हो। उसे खींचने में विलंब हुआ। कोरोना के दौरान हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। कार्यपालिका के अंदर की गतिविधियों को समझने का मौका मिला। हमारी कार्य योजना को जमीन पर उतारना बड़ी चुनौती थी। पूर्व की सरकार ने वित्तीय व्यवस्था को पूरी तरह से घ्वस्त कर रखा था। एक प्रकार से हमें शून्य से शुरू करना पड़ा। मुझे लगता है कि अलग राज्य होने के बाद पहला सरप्लस बजट विधानसभा पटल पर रखा गया। उसके बाद जो स्थिति रही, वह स्थिति इतनी बुरी रही कि सरकार ने कभी भी अपने आंतरिक संसाधनों को बढ़ाने, वैल्यू एडीशन पर ध्यान ही नहीं दिया, कोई नया रास्ता की नहीं निकाला कि राज्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

केंद्र और राज्य के बीच संबंध ठीक नहीं दिख रहा। डीवीसी का बिजली मद में बकाया पैसा भी राज्य के खजाने से काट लिया गया।

झारखंड ही नहीं, कई राज्यों का केंद्र के साथ अच्छा संबंध नहीं दिख रहा। जहां गैर-भाजपा सरकार है, वहां समस्याएं ज्यादा हैं। छोटी-छोटी चीजों पर केंद्र सौतेला व्यवहार करता है। ठीक है, आपने हमारा पैसा काट लिया। आपने हमारे राज्य में बच्चों को मेडिकल कॉलेज में दाखिला क्यों बंद कर दिया? हमारे तीन-तीन मेडिकल कॉलेज, जिसमें हर कॉलेज में डेढ़-डेढ़ सौ बच्चों का एडमिशन होना था यानी साढ़े चार सौ बच्चे मेडिकल शिक्षा ग्रहण करने से वंचित रह गये। हम यहां डॉक्टरों की तलाश करते हैं, नों की तलाश करते हैं, ऐसा क्यों। पैसा काटना माना कि वित्तीय प्रबंधन का हिस्सा था। और उन्हीं कॉलेजों का जब उद्घाटन करना था तो आनन-फानन आधीअधूरी बिल्डिंग में उद्घाटन भी हुआ (पलामू, दुमका और हजारीबाग मेडिकल कॉलेज का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया था)। बच्चों का दाखिला भी हुआ और जब हम आज लगभग सारी अर्हताएं पूरी कर रहे हैं, एडमिशन रोकना न्यायोचित नहीं है। मेरे साथ छोड़िए, बच्चों के साथ न्यायोचित नहीं रहा। इस तरह की सोच दुखी करती है।

पूर्ववर्ती सरकार के समय के भ्रष्टाचार के अनेक मामलों जैसे मैनहर्ट, कंबल, जेरेडा घोटाला को आपने एसीबी के हवाले किया। भाजपा का आरोप है कि यह टार्गेटेड, पूर्वाग्रह से ग्रस्त कार्रवाई है

मैं पूर्वाग्रह से ग्रस्त हूं? परिणाम आने दीजिए। अगर गलत होगा तो मैं यही कह सकता हूं कि मै गुनाह भी नहीं करूंगा तो आप लोग सूली पर चढ़ा दें। ये हमने तो नहीं किया। ये कागजों के माध्यम से आये, कागज बोलता है, कागज तो मरता नहीं है। अखबारों में, मीडिया में विधायकों ने कई संस्थाओं के माध्यम से सूचनाएं उजागर हुई थीं। ऐसा नहीं कि हमारी सरकार ने आकर उन सब को कुरेदा हो या खुद निकाला हो या नया बनाकर फंसाने का प्रयास हुआ हो। ऐसा कोई एक उदाहरण बता दें कि सारा कुछ अच्छा चल रहा था और मैने कोई जांच बैठा दी। उनके पाप के घड़े भरकर छलक चुके थे, हमने कहा कि इसे थोड़ा ठीक कर दो।

सीबीआइ की डायरेक्ट एंट्री पर आपने रोक लगा दी। कुछ और राज्यों ने भी लगाया है। ऐसी क्या जरूरत पड़ी?

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