उग्रवाद की वापसी!
India Today Hindi|December 01, 2021
म्यांमार सीमा के पास एक सैन्य काफिले पर भीषण हमले ने राज्य में हालिया अतीत में कायम शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया है और भारत में सबसे लंबे चलने वाले विद्रोहों में से एक को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं
संदीप उन्नीथन और कौशिक डेका

नवंबर की 13 तारीख की सुबह थी. 41 वर्षीय कर्नल विप्लव त्रिपाठी, अपनी 33 वर्षीया पत्नी अनुजा और आठ साल के बेटे अबीर के साथ काली महिंद्रा बोलेरो जीप में सवार होकर मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के लिए रवाना हुए. परिवार 1,643 किमी लंबी म्यांमार सरहद से कुछ किलोमीटर दूर बेहियांग टी गांव में रात्रि प्रवास करके लौट रहा था. इस सरहद की रखवाली असम राइफल्स करती है. उसकी 46वीं बटालियन के कमांडिंग अफसर कर्नल त्रिपाठी और उनके परिवार के साथ तीन मारुति जिप्सियों में दर्जन भर हथियारबंद सिपाही थे. वे गांव में सामुदायिक मेल-मिलाप के कार्यक्रम से लौट रहे थे. ऐसी यात्रा में अफसर आम तौर पर अपने परिवार को साथ ले जाते हैं.

यह छोटा-सा काफिला अभी गांव से निकला ही था कि वह संकरी सड़क एक के बाद एक धमाकों से दहल गई. घने जंगलों में घात लगाकर इंतजार कर रहे उग्रवादियों ने ऑटोमैटिक बंदूकों और राइफल ग्रेनेड से वाहनों पर ताबड़तोड़ गोलियां दागीं. कुछ मिनट बाद जब गोलाबारी रुकी, कर्नल त्रिपाठी और उनका परिवार बेजान पड़ा था. चार अन्य सैनिक मारे गए और छह गंभीर रूप से घायल हुए.

दो उग्रवादी संगठनों, पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और मणिपुर नगा पीपल्स फ्रंट (एमएनपीएफ), ने उसी दिन एक बयान जारी करके हमले की जिम्मेदारी ली. मणिपुर भारत के सबसे लंबे समय से चले आ रहे विद्रोहों में से एक का गवाह रहा है, यहां कम से कम 40 प्रतिबंधित भूमिगत संगठन सक्रिय हैं. फिर भी पिछले छह साल से उग्रवादी धड़ों ने इतना दुस्साहसी हमला नहीं किया था. इससे पहले बड़ा हमला 4 जून 2015 को हुआ था, जब यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथईस्ट एशिया (यूएलएफडब्ल्यूएसए) के अलगाववादियों ने चंदेल जिले में भारतीय सेना के काफिले पर घात लगाकर हमला किया और 18 सैनिकों को मार डाला था.

साल 2021 में मणिपुर में उग्रवाद में बढ़ोतरी देखी गई है. इस साल यहां अब तक162 आतंकवादी घटनाएं और 24 लोगों की मौत हो चुकी हैं. वहीं, आतंकी घटनाएं साल 2014 में 100 से घटकर 2020 में 113 पर आ गई थीं

राज्य के सिंघात सबडिविजन में 13 नवंबर की हत्याओं ने बीते कुछ साल से चली आ रही थोड़ी-बहुत शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया है. यह घटना ऐसे दौर में हुई जब इलाका उथल-पुथल से गुजर रहा है. म्यांमार की सेना ने 1 फरवरी को सरकार का तख्तापलट करके लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेताओं को हिरासत में ले लिया. सैन्य शासकों के अत्याचारों से त्रस्त होकर भाग रहे हजारों लोगों का मणिपुर सहित भारत के सरहदी राज्यों में तांता लग गया. इस अफरातफरी में म्यांमार के शिविरों में डेरा डाले पीएलए और एमएनपीएफ सरीखे धड़ों को खुलकर काम करने का मौका मिल गया.

खुली हुई लंबी सरहद

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