अब लंबा कार्यकाल
India Today Hindi|December 01, 2021
नौकरशाही का विस्तार
कौशिक डेका

नवंबर की 14 तारीख को, संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने से दो हफ्ते पहले, केंद्र सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के निदेशकों के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के लिए एक अध्यादेश पारित किया. दोनों पदों का दो साल का निश्चित कार्यकाल था, भले ही उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष हो.

इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने दिल्ली पुलिस विशेष प्रतिष्ठान (डीपीएसई) अधिनियम और केंद्रीय सतर्कता अधिनियम (सीवीसी) में संशोधन करने के अलावा, 2005 में पेश किए गए केंद्रीय सिविल सेवा के मौलिक नियमों में भी संशोधन किया है. यह केंद्र सरकार को रक्षा सचिव, गृह सचिव, इंटेलिजेंस ब्यूरो (आइबी) के निदेशक और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) के सचिव के कार्यकाल को दो साल तक के लिए बढ़ाने की शक्ति देता है. इन अधिकारियों का भी अधिकतम कार्यकाल दो साल का होता है.

विपक्षी नेताओं ने सरकार के इस कदम के समय को लेकर हंगामा किया है. राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के राज्यसभा नेता मनोज झा कहते हैं, "संसद बुलाने से ठीक पहले सीबीआइ और ईडी प्रमुखों का कार्यकाल बढ़ाने का अध्यादेश केंद्र की मंशा पर संदेह पैदा करता है." 17 नवंबर को, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए अध्यादेश को सीबीआइ और ईडी प्रमुखों के कार्यकाल पर शीर्ष अदालत के पिछले फैसलों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी. उसी दिन, सरकार ने ईडी के निदेशक संजय कुमार मिश्र का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया. वह 18 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे.

हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि हाइप्रोफाइल जांच में निरंतरता बनाए रखने के लिए इस तरह के विस्तार की जरूरत होती है, वहीं, कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला का दावा है कि तीन साल के सेवा विस्तार का मकसद कुछ नौकरशाहों को 2024 की लोकसभा तक अपने विभागों के प्रमुख के रूप में बनाए रखना है, ताकि विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच का प्रबंधन लचीले अफसरों के जरिए किया जा सके. वे कहते हैं, "ईडी भाजपा का इलेक्शन डिपार्टमेंट बन गया है और सीबीआइ अब 'कॉम्प्रमाइज्ड ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' है."

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