मुसीबत के भंवर में छोटे कारोबारी
India Today Hindi|November 17, 2021
मांग में कमी, कच्चे माल के बढ़ते दाम और आसमान छूती ढुलाई की लागत ने बहुत छोटे, छोटे और मझौले उद्योगों पर ऐसा कहर बरपाया कि कई दिवालिया होने की कगार पर आ गए
एम.जी. अरुण

मुंबई के 51 वर्षीय सुनील कुमार खासे चिंतित हैं. वे आवास क्षेत्र के लिए धातु की फिटिंग के छोटे उत्पादक और निर्यातक हैं. अर्थव्यवस्था के काफी हद तक खुल जाने के बावजूद उनके उत्पादों की मांग में कमी है. पश्चिम एशिया के देशों को निर्यात कई सालों से उनका मुख्य सहारा था, जो इस साल घटकर आधा रह गया और बढ़ने के आसार भी नहीं दिखते. वहीं आगत लागते, खासकर स्टील के दाम, महामारी के पहले के मुकाबले चार गुना बढ़ गए, जबकि शिपिंग लागतें दोगुनी से ज्यादा हो गईं. हैरान-परेशान कुमार कहते हैं, "कुछ पक्का नहीं है, महामारी हो या कारोबारी माहौल या सरकारी नीतियां." उन्हें उम्मीद है कि त्योहारी सीजन के चलते मांग में सुधार आएगा.

सुनील की तरह लाखों उद्यमी हैं जो कोविड के ज्यादा से ज्यादा टीके लगने और मामलों में कमी आने के साथ अर्थव्यवस्था के खुलने पर आस लगाए बैठे हैं. बड़ी कंपनियों ने तो महामारी से खुद को बचा लिया और यहां तक कि लागतों में कटौती करके मुनाफे की गुंजाइशें बढ़ा लीं. यह जून में खत्म होने वाली तिमाह में जीडीपी में 20 फीसद की उछाल से में भी पता चलता है, हालांकि इसकी वजह बहुत ज्यादा निचला आधार भी था. मगर एमएसएमई (बहुत छोटे, छोटे और मझोले उद्यम) क्षेत्र की इकाइयां घाटे से उबरने के लिए अब भी हाथ-पैर मार रही हैं. कई लोगों का कहना है कि भारतीय उत्पादन क्षेत्र की रीढ़ एमएसएमई क्षेत्र में जब तक दोबारा जान नहीं आती, आर्थिक वृद्धि टिकाऊ नहीं होगी. अपने आकार की वजह से ही इस क्षेत्र का कुल निवेश और खपत पर भारी असर पड़ता है और अप्रैल-जून की तिमाही में दोनों ही पिछड़ गए.

भारत के 6.34 करोड़ एमएसएमई की देश के मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन में 45 फीसद और इसके निर्यात में 40 फीसद हिस्सेदारी है और यह करीब 12 करोड़ लोगों को रोजगार देता है. 2020 में जब केंद्र ने दुनिया के सबसे सख्त लॉकडाउन में से एक लगाया, तब यह आर्थिक गतिविधियों के एकाएक ठहर जाने की सबसे बदतर मार सहने वाले क्षेत्रों में से एक था. पिछले साल जून में ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गेनाइजेशन के सर्वे से पता चला कि भारत के 35 फीसद एमएसएमई और 37 फीसद स्वनियोजित लोगों को महामारी के कारण अपने कारोबार बंद करने पड़े. इस साल मई में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्कल्स के 171 जिलों में फैले 6,000 स्टार्ट-अप पर किए गए एक सर्वे में करीब 60 फीसद उत्तरदाताओं ने आशंका जाहिर की कि अगले छह महीनों के दौरान उन्हें फर्म का काम घटाना, बेचना या बंद करना पड़ सकता है. करीब 41 फीसद ने कहा कि उनकी पूंजी खत्म हो चुकी है या महीने भर से भी कम की पूंजी बची है. अजीब बात तो यह है कि केंद्र कहता है उसके कोविड-19 लॉकडाउन की वजह से कारोबार की नाकामियां सहने वाले एमएसएमई की संख्या के बारे में उसके पास कोई डेटा नहीं है.

एमएसएमई संकटः समस्याएं और समाधान

मई में, एमएसएमई की स्थिति के आकलन के लिए हुए सर्वे में लगभग 60 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें लगता है कि अगले छह महीने में उन्हें अपना कारोबार सिकोड़ना होगा या बेचना या बंद करना पड़ेगा

चुनौती

कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि. इस साल जून से स्टील मिलों ने कीमतों में 4,500 रु. प्रति टन तक की बढ़ोतरी की है और साल जनवरी से एल्युमीनियम की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं.

समाधान

केंद्र को प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की निगरानी करने की जरूरत है. जरूरी हो तो मामलों को प्रतिस्पर्धा आयोग के पास भेजना चाहिए. एमएसएमई चाहते हैं कि केंद्र आयात शुल्क युक्तिसंगत बनाए और प्रमुख कच्चे माल पर शुल्क शून्य करे

चुनौती

शिपिंग सुविधाओं में कमी और उच्च परिवहन लागत. शिपिंग का खर्चा विश्व स्तर पर दोगुना हो गया है. दुनिया के कुल माल परिवहन का 80 प्रतिशत से अधिक पानी के जहाजों से होता है. परिवहन लागत में वृद्धि के में कारण कीमतों में वृद्धि हुई है

समाधान

भारतीय अधिकारियों को ईंधन पर करों को युक्तिसंगत बनाने की जरूरत है ताकि स्थानीय परिवहन सस्ता हो

चुनौतियां

उच्च एनपीए. एमएसएमई क्षेत्र में संकट से एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) के बढ़ने की आशंका है. इस साल मार्च में हुए फिक्कीइंडियन बैंक एसोसिएशन के सर्वे में शामिल 84 फीसद उत्तरदाता एमएसएमई क्षेत्र से एनपीए में वृद्धि की संभावना जता रहे थे.

समाधान

केंद्र को एमएसएमई को अभियोजन और दंड से बचाने की जरूरत है जो महामारी के कारण शर्तों का अनुपालन नहीं कर पाए. इसे संभावित एनपीए के संबंध में मौजूदा कानूनों की भी समीक्षा करनी चाहिए ताकि एमएसएमई को उबरने और उनके ऋणों का भुगतान करने के लिए अधिक गुंजाइश मिल सके.

चुनौती

अर्थव्यवस्था के खुलने के बावजूद बंद और घटती मांग ने एमएसएमई के नकदी प्रवाह को प्रभावित किया है, जिससे उनके लिए अपना परिचालन खर्च भी पूरा करना मुश्किल हो गया है

समाधान

अधिकांश एमएसएमई ऐसे उद्यमी चलाते हैं जिन्हें ऋण के आवेदन की प्रक्रिया और लंबी-चौड़ी कागजी कार्रवाई बहुत जटिल लगती है. उनको व्यवसाय फिर से शुरू करने/इनपुट लागत घटाने के लिए तत्काल वित्तीय सहायता की जरूरत है

आसमान छूती लागते

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