घाटी में खौफ की वापसी
India Today Hindi|October 27, 2021
जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर के एक कश्मीरी पंडित सामाजिक कार्यकर्ता (सुरक्षा कारणों से नाम नहीं दिया जा रहा है) पिछले एक पखवाड़े से पुलिस की हिफाजत में रह रहे हैं. 5 अक्तूबर की मध्यरात्रि पुलिस का एक जत्था आया और उन्हें उनके घर से एक किलोमीटर दूर ज्यादा सुरक्षित जगह ले गया. वे कहते हैं, "उन्होंने कहा कि मैं उग्रवादियों की रडार पर हूं और मुझे उनके साथ चलना होगा."
मोअज्जम मोहम्मद

कुछ ही घंटों पहले उग्रवादियों ने श्रीनगर के इकबाल पार्क इलाके में फार्मेसी मालिक 68 वर्षीय कश्मीरी पंडित माखन लाल बिंदरू की हत्या कर दी थी. सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बिंदरू भी उन 808 कश्मीरी पंडित परिवारों में थे, जिन्होंने 1990 के दशक में तब भी घाटी में रहना चुना जब उग्रवाद ने हिंदुओं को घाटी से सामूहिक रूप से पलायन करने को मजबूर कर दिया था.

इस महीने घाटी में खौफ और पहले जैसी अशुभ घटनाओं के घटित होने का डरावना एहसास लौट आया, जब उग्रवादियों ने निशाना बनाकर एक के बाद सात लोगों को मार डाला. मारे गए लोगों में तीन हिंदू और एक सिख महिला थीं. सबसे जघन्य वह थी जिसमें उग्रवादियों ने बॉयज हायर सेकंडरी स्कूल में हर व्यक्ति के पहचान पत्र की जांच करके दो शिक्षकों बडगाम के बीरवाह गांव की सुपिंदर कौर और जम्मू के दीपक चंद को अलग किया और स्कूल के भीतर ही गोली मारकर हत्या कर दी. कश्मीरी पंडितों के अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के प्रमुख संजय टिक्कू कहते हैं, "यह डोडा और राजौरी के नरसंहारों की तरह था जहां एक समुदाय विशेष के लोगों को अलग करके मार डाला गया था. टिक्कू उन लोगों में हैं जो उग्रवाद के बावजूद यहां रुके रहे.

साल 2010 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के पटल पर रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, '90 के दशक से मारे गए कश्मीरी पंडितों की तादाद 209 थी. केपीएसएस के मुताबिक, ताजा आंकड़ा 677 है. गृह मंत्रालय का आंकड़ा कहता है कि 62,000 से ज्यादा परिवार, जिनमें ज्यादातर कश्मीरी पंडित थे, घर छोड़कर चले गए. उनमें से करीब 40,000 अब जम्मू में, 20,000 दिल्ली में और बाकी भारत के दूसरे हिस्सों में रह रहे हैं.

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