जैविक कृषि में जो ढूंढते हैं आनंद
India Today Hindi|October 20, 2021
खुशी की सौगातः किसानों को जैविक कृषि अपनाने के लिए तैयार करना और उनकी आय बढ़ाने में मददगार बनना
अनिलेश एस. महाजन

सुबह जल्दी उठना, डायरी से नंबर निकालकर पांच नए लोगों को फोन करके जैविक और प्राकृतिक खेती पर चर्चा करना, 58 वर्षीय उमेंद्र दत्त की पिछले 25 वर्षों से यही दिनचर्या है. कृषि पर चर्चा के लिए वे किसानों ही नहीं, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, शिक्षाविदों, अर्थशास्त्रियों, नागरिक समाज समूहों, यहां तक कि राजनेताओं को भी फोन करते हैं. उनका जोर खेती के ऐसे तरीकों को बढ़ावा देने पर है जिसमें रासायनिक अपशिष्ट बिल्कुल न हो.

पंजाब के फरीदकोट जिले के एक शांत छोटे-से शहर जैतू में रहने वाले दत्त ने अपना पूरा जीवन सभी प्रकार के किसानों, विशेष रूप से छोटे और सीमांत भूमिधारकों, भूमिहीन मजदूरों और यहां तक कि घरेलू बागबानी करने वालों को खेती की इस पद्धति से परिचित कराने के लिए समर्पित कर दिया है.

उनका प्रयास इसलिए भी खास हो जाता है, क्योंकि पंजाब में बाजार में आने वाली 85 प्रतिशत फसलों की खरीद भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) और भारतीय कपास निगम (सीसीआइ) जैसी केंद्रीय एजेंसियां कर लेती हैं, इसलिए वहां उपज बढ़ाने के लिए कीटनाशकों और उर्वरकों का भारी मात्रा में उपयोग होता है. इससे न केवल मिट्टी और भूजल की गुणवत्ता प्रभावित हुई है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य को भी बड़ा नुक्सान हो रहा है.

दत्त ने 20,000 से अधिक किसानों को प्रशिक्षित किया है जो अब लगभग 15,000 एकड़ में जैविक फसलें उगाते हैं. अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए दत्त कहते हैं कि पंजाब में लाखों किसान राज्य की कुल 42 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती करते हैं और उसे देखते हुए जैविक खेती करने वाले किसानों की संख्या भले ही छोटी हो सकती है "लेकिन परिवर्तन तो बड़ा है.

खुशी का मंत्र

"हम इनसान प्रकृति का एक हिस्सा हैं, इसलिए प्रकृति के खिलाफ हिंसा भगवान के खिलाफ हिंसा है. प्रकृति के साथ तालमेल बनाए रखने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. और बदले में प्रकृति हमें हमेशा तृप्ति, आनंद और आध्यात्मिक जुड़ाव की भावना से भर देती है"

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