युद्ध या शांति?
India Today Hindi|September 29, 2021
असम सरकार ने 11 सितंबर को सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम, (एएफएसपीए), 1958 के तहत राज्य के अशांत क्षेत्र के दर्जे को फिर से अगले छह महीने के लिए विस्तार दे दिया है. राज्य सरकार ने इस विस्तार के पीछे की वजह को अभी तक नहीं बताया है. वहीं, इस कदम को ऐसे समय में उठाया गया है जब केंद्र और राज्य सरकार, दोनों की अगुआई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कर रही है, और जिसका लगातार यह दावा रहा है कि पूर्वोत्तर के इस राज्य में अब शांति वापस आ गई है.
कौशिक डेका

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 4 सितंबर को यह ऐलान किया कि केंद्र, राज्य और असम के कर्बी आंगलांग जिले में सक्रिय छह उग्रवादी समूहों के बीच त्रिपक्षीय समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'उग्रवादमुक्त, समृद्ध पूर्वोत्तर' की उनकी दृष्टि का एक अन्य मील का पत्थर है. फरवरी, 2020 में, केंद्र सरकार ने बोडो उग्रवादी समूह नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के सभी गुटों के साथ एक अन्य समझौते पर दस्तखत किए थे, जिसको बोडो उग्रवाद का अंत बताया गया था. इस हफ्ते की शुरुआत में, असम के सबसे खतरनाक उग्रवादी समूह यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (आइ) (उल्फा) के मुखिया परेश बरुआ ने भी पहली बार शांति वार्ता के लिए अपनी इच्छा जाहिर की है और इसमें असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है.

इन घटनाक्रमों से राज्य से एएफएसपीए को हटाने की मांग तेज हो गई है और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि राजनैतिक लाभ के लिए इस कठोर कानून का दुरुपयोग किया जाता रहा है. गुवाहाटी स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. दिव्यज्योति सैकिया कहते हैं, 'सरकार राज्य में शांति स्थापित करने के दावे का कोई मौका जाने नहीं देना चाहती, तो इसको एएफएसपीए की क्या जरूरत है? यह खुला रहस्य है कि बहुत सारे हितधारक हैं, जो चाहते हैं कि आतंक खत्म करने के नाम पर आने वाला केंद्रीय फंड नहीं रुके."

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