दिक्कत भरी शुरुआत
India Today Hindi|September 29, 2021
रक्षा मंत्रालय की पनडुब्बियां, लड़ाकू विमान, युद्धक टैंक और हेलिकॉप्टर निर्माण के लिए दूसरी उत्पादन शृंखला बनाने की महत्वाकांक्षी योजना सुस्ती का शिकार हो गई है
संदीप उन्नीथन

सिंगल डिफेंस डील या एकल रक्षा सौदा, भारत की रक्षा आधुनिकीकरण योजना को प्रभावित करने वाली देरी का द्योतक है. 8 सितंबर को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने एयरबस इंडस्ट्रीज से भारतीय वायु सेना के लिए 56 सी-295 सैन्य परिवहन विमान खरीदने के 20,000 करोड़ रुपए के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 2015 में ही इस सौदे के लिए मंजूरी दे दी थी, लेकिन फिर भी इसे आखिरी हरी झंडी के लिए छह साल तक इंतजार करना पड़ा. अनुबंध पर अंततः हस्ताक्षर हो जाने के बाद, एयरबस अपने भारतीय सहयोगी टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) के साथ 56 सैन्य परिवहन विमानों में से 40 को भारत में असेंबल करेगा.

यह एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि सरकार के स्वामित्व वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) एकमात्र भारतीय कंपनी है जो सैन्य विमान बनाती है. यह सौदा भले ही बहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक हो सकता है, लेकिन यह देश के भीतर रक्षा स्वदेशीकरण के उस अभियान को बढ़ावा नहीं देगा जिसे सरकार आत्मनिर्भर भारत' अभियान कहती है, अभियान के तहत सरकार चाहती है कि भारतीय रक्षा कंपनियां न केवल सैन्य साजो-सामान का देश में उत्पादन करें बल्कि निर्यात भी करें. उदाहरण के लिए, टीएएसएल, सी-295 की अनुकृति या कॉपी बनाने, इसे अपग्रेड करने या यहां तक कि अपने विदेशी भागीदार के बिना निर्यात करने में सक्षम नहीं होगा क्योंकि इसके पास डिजाइन का स्वामित्व नहीं है. लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से बाहर निकलने में असमर्थता ऐसी समस्या है जिसने भारत की रक्षा स्वदेशीकरण प्रक्रिया को पंगु बना दिया है. सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व वाले बेकार सैन्य औद्योगिक परिसर और स्वदेशी डिजाइन तैयार के लिए आवश्यक स्वदेशी रक्षा अनुसंधान एवं विकास की कमी से लेकर सशस्त्र बलों की स्वदेशी उत्पादों में कम रुचि, इसके मुख्य कारण कहे जा सकते हैं.

इसका परिणाम क्या हुआ? भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बन गया है. 2016 और 2020 के बीच, अमेरिका, रूस, फ्रांस और इज्राएल से लड़ाकू जहाज, युद्धपोत और मिसाइलों की खरीद के सौदों के साथ, हथियारों के कुल वैश्विक आयात में भारत का हिस्सा 9.5 प्रतिशत रहा.

लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से बाहर निकलने में असमर्थता ऐसी समस्या है जिसने भारत की रक्षा स्वदेशीकरण प्रक्रिया को पंगु बना दिया

इस दशक में तीनों सेवाएं अपने पुराने हथियारों को उन्नत करने के लिए 100 अरब डॉलर (7 लाख करोड़ रुपए) से अधिक के लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, टैंक और पनडुब्बियां खरीदेंगी. यह सुनिश्चित करने के लिए कि इनका उत्पादन भारत के भीतर किया जाए-लागत कम करने और स्थानीय निर्माण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने 2017 में रणनीतिक साझेदारी (एसपी) मॉडल सामने रखा था. इसके तहत जो प्रावधान तय किए गए वे कहते हैं कि रक्षा मंत्रालय (एमओडी) को निर्धारित प्रक्रिया के बाद निजी क्षेत्र से एक निर्माता को रणनीतिक साझेदार के रूप में चुनना होगा. रणनीतिक साझेदार को देश में ही निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे और आपूर्ति श्रृंखला, आधुनिकीकरण, और अपग्रेड, शोध व अनुसंधान और आपूर्तिकर्ताओं के लिए एक ईकोसिस्टम बनाने की खातिर विदेशी ओईएम (मूल उपकरण निर्माता) के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की साझेदारी करनी होगी.

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