एसेट मॉनिटाइजेशन- इस बार बड़ा ख्वाब
India Today Hindi|September 29, 2021
मोदी सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों के 'मॉनिटाइजेशन' यानी निजी क्षेत्र को लंबे वक्त के लिए लीज पर देकर अगले चार वर्षों में 6 लाख करोड़ रुपए उगाहने की ख्वाहिश, क्या वह इस बड़े बदलाव में कामयाब हो पाएगी?
एम.जी. अरुण और श्वेता पुंज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभाली, तो उनके बड़े वादों में एक 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम राजकाज" भी था. उम्मीद यह थी कि उनकी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ संपत्तियों से अपना नियंत्रण हटा लेगी. उन्हें सीधे निजी क्षेत्र को बेच दिया जाएगा या उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रबंधन/संचालन में निजी क्षेत्र को शामिल कर लिया जाएगा. अपने पहले कार्यकाल में उनकी सरकार इस मोर्चे पर कुछ खास नहीं कर सकी. विपक्ष के 'सूट-बूट की सरकार' के ताने से वह घिर जो गई थी.

इस साल फरवरी में केंद्रीय बजट में मोदी सरकार ने विनिवेश और सरकारी परिसंपत्तियों के मॉनिटाइजेशन या मौद्रीकरण की दो जोरदार घोषणाएं कीं, जो निजी क्षेत्र से जुड़ी थीं. विनिवेश की उसकी कोशिशों के शुरुआती नतीजे मिले-जुले रहे.

एयर इंडिया की बिक्री में कुछेक निजी आवेदकों ने दिलचस्पी दिखाई और इसकी बोली की प्रक्रिया इसी वित्त वर्ष में पूरी होनी है, वहीं एलआइसी (जीवन बीमा निगम) इस साल शेयर सूचीबद्ध करवाने की तैयारी में जुटा है. हालांकि बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड), कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और आइडीबीआइ बैंक सरीखे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की बिक्री अधर में लटकी है. यही वह मोड़ है, जब सरकार ने अपना अगला बड़ा अभियान परिसंपत्तियों का मॉनिटाइजेशनशुरू करने का फैसला किया. इसके तहत सरकारी संपत्तियां अग्रिम शुल्क के एवज में निजी कंपनियों को दी जाएंगी. सरकार का मानना है कि इस तरह लक्ष्य हासिल करना आसान होगा. उसने निजीकरण के उस भारी विरोध को भी दरकिनार कर दिया, जिससे सार्वजनिक संपत्तियों से राजस्व उगाहने की पिछली कोशिशों को पलीता लगाया था.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 अगस्त को केंद्र की राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) लॉन्च करने का ऐलान किया. इसके तहत सरकार का इरादा अगले चार वर्षों में बुनियादी ढांचे की बड़ी परियोजनाओं को 15 से 30 साल तक की अवधि के लिए निजी कंपनियों को लीज पर देने का है. बदले में वह 6 लाख करोड़ रु. उगाहने की उम्मीद कर रही है, जो देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट के जोड़ के बराबर है. इससे वह अपनी महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में धन लगा पाएगी, बजट घाटे की भरपाई कर पाएगी और उम्मीद यह है कि निजी क्षेत्र में नई जान फूंक पाएगी. केंद्र को यह उम्मीद भी है कि इस तरह वह अपने उस सुधार एजेंडे को पूरा नहीं कर पाने की आलोचनाओं से भी पिंड छुड़ा लेगा, जिसका मकसद सरकारी प्रबंधन के नाकारापन की वजह से अपनी क्षमता से कमतर प्रदर्शन करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को नई जिंदगी देना था. इससे उसे पिछली यूपीए सरकार के उस पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) मॉडल की खामियों को दुरुस्त करने का भी मौका मिलेगा, जिसका खाका 2015 में विजय केलकर समिति की सिफारिशों में पेश किया गया था.

तत्कालीन योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया कहते हैं कि सरकार को मॉनिटाइजेशन और निजीकरण दोनों की पहल करनी चाहिए "क्योंकि हमें नहीं पता कि बेहतर क्या है." निजीकरण को लोगों के गले उतारना ज्यादा कठिन है, क्योंकि इसमें जमीन सरीखी सरकारी संपत्तियों की मिल्कियत छोड़नी पड़ती है, जबकि 30 साल की लीज को सही ठहराना ज्यादा आसान है. एनएमपी तैयार करने वाला नीति आयोग यह भी बताता है कि उत्तर अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में टोल रोड, बंदरगाहों और हवाई अड्डों सरीखी मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में संस्थागत निवेशकों और फंडों के निवेश का इतिहास रहा है. अभी कुछ वक्त पहले ऐसे निवेश एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी हुए हैं.

केंद्र की संपत्ति मौद्रीकरण योजना के तहत सड़क, रेलवे, बिजली पारेषण, विमानन और बंदरगाह सहित 13 क्षेत्रों की पहचान (देखें फेहरिस्त में क्या-क्या) की गई है, जिनकी संपत्तियां निजी क्षेत्र को लीज पर दी जाएंगी. ये प्रतिस्पर्धी बोली लगाने की प्रक्रिया के तहत दी जाएंगी, और मिल्कियत सरकार के पास रहेगी. एनएमपी का लक्ष्य करीब 1.6 लाख करोड़ रुपए सड़क परियोजनाओं से, 1.5 लाख करोड़ रुपए रेलवे से, 45,000 करोड़ रुपए बिजली पारेषण से, 40,000 करोड़ रुपए बिजली उत्पादन से और इसी तरह अन्य परियोजनाओं के मॉनिटाइजेशन से हासिल करना है. इसमें 27,000 किमी सड़कें, 25 हवाई अड्डे और 21 लाख टन क्षमता के गोदाम तथा अन्य शामिल हैं.

सरकार की पेशकश ब्राउनफील्ड परियोजनाओं की है. मतलब जो पूरी हो चुकी हैं और सुचारु ढंग से काम कर रही हैं. सीतारमण ने कहा, "एनएमपी (में केवल वही) परियोजनाएं (हैं), जिनमें निवेश हो चुका है, जिनमें संपत्तियां तैयार हो चुकी हैं, जो या तो धूल खा रही हैं, पूरी तरह मॉनिटाइज नहीं की जा सकी हैं या जिनका इस्तेमाल कम हुआ है. निजी भागीदारी लाकर हम (इन्हें) बेहतर मॉनिटाइज कर पाएंगे और इन्फ्रास्ट्रक्चर में आगे भी निवेश पक्का कर पाएंगे." कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के एमडी नीलेश शाह कहते हैं कि एनएमपी 'गेमचेंजर' है. हालांकि वे जोर देकर यह भी कहते हैं कि इस पर अमल बेहद अहम है, खासकर "विनिवेश की नाकामियों से सीखना होगा."

संपत्तियों का मॉनिटाइजेशन कोई नया विचार नहीं है. पिछली सरकारें और कुछ हद तक मौजूदा सरकार भी पहले इसे लागू कर चुकी है. विशालकाय वैश्विक वित्तीय समूह मैक्वायरी ने 2018 में 9,681.5 करोड़ रुपए की बोली से टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (टीओटी) मॉडल के तहत एनएचएआइ (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) के मातहत सड़कों की नौ पट्टियों के संचालन का अधिकार हासिल किया था. 2004 में टोल अधिकार हासिल करके 15 साल तक मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का संचालन करने के बाद आइआरबी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स ने पिछले साल महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम को 6,500 करोड़ रुपए चुकाकर टीओटी के तहत 30 साल के लिए टोल वसूलने का अधिकार प्राप्त किया. मार्च में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि एनएचएआइ की योजना अगले पांच साल में टीओटी के तहत 1 लाख करोड़ रुपए जुटाने की है. इसी तरह कई हवाई अड्डे मौजूदा मॉनिटाइजेशन प्रक्रिया में कामयाब रहे हैं.

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