भगवा दल को अन्नदाता की चुनौती
India Today Hindi|September 22, 2021
कृषि कानूनों के विरोध में आयोजित महापंचायत में किसान नेताओं ने भाजपा विरोधी सुर फूंका. काश्तकारों के मोहभंग के मद्देनजर अगले साल विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी के लिए मुश्किलें आने का अंदेशा
आशीष मिश्र

पश्चिमी यूपी के जिले मुजफ्फरनगर में 2013 के सांप्रदायिक दंगों के आठ साल बाद पहला मौका था जब पूरे जिले में सुरक्षा के इतने कड़े इंतजाम थे. कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर पिछले नौ महीने से पश्चिमी यूपी के गाजीपुर बॉर्डर पर धरना दे रहे किसान 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में महापंचायत कर अपने आंदोलन को विस्तार दे रहे थे. संयुक्त किसान मोर्चा के तत्वावधान आयोजित किसान महापंचायत के आयोजन स्थल मुजफ्फरनगर राजकीय इंटमीडिएट कालेज (जीआइसी) की ओर जाने वाली सभी सड़कों के चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात था. सुरक्षा के कड़े इंतजाम भी महापंचायत में भाग लेने वाले किसानों का उत्साह कम नहीं कर पाए. 5 सितंबर की सुबह 10 बजे महापंचायत शुरू होने से पहले जीआइसी ग्राउंड यूपी समेत देश के करीब 13 प्रदेशों से आए करीब डेढ़ लाख किसानों से भर गया था. जीआइसी ग्राउंड में जगह न होने से डेढ़ लाख के करीब किसान मुजफ्फरनगर की सड़कों पर जमा थे. संयुक्त किसान मोर्चा की महापंचायत में पहली बार देश भर के 40 किसान संगठन एकसाथ मंच पर मौजूद थे.

महापंचायत उस वक्त अपने चरम पर पहुंची जब दोपहर एक बजे भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत मंच पर पहुंचे. टिकैत ने तीनों कृषि कानूनों की वापसी, किसानों को एमएसएपी की गारंटी, गन्ना मूल्य बढ़ाने की मांग उठाने के साथ 27 सितंबर को "भारत बंद" करने की घोषणा की.

महापंचायत के जरिए “मिशन यूपी" की शुरुआत कर रहे टिकैत ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बाहरी बताते हुए इन्हें यूपी से भगाने का आह्वान भी किया. मौजूद किसानों की सहानुभूति बटोरने के लिए राकेश टिकैत ने कहा कि जब तक केंद्र की भाजपा सरकार कृषि कानूनों को वापस नहीं लेती है तब तक वे अपने घर नहीं जाएंगे, चाहे आंदोलन स्थल पर ही बलिदान क्यों न हो जाए. राजनैतिक दलों से दूरी बनाने वाली महापंचायत में यूपी-उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने का जिस तरह आह्वान किया गया, उससे किसान आंदोलन की राजनैतिक महत्वकांक्षा भी सामने आई.

किसान आंदोलन के नेताओं को यह एहसास था कि उनकी राजनैतिक महत्वकांक्षा हिंदू-मुस्लिाम एकता के बगैर पूरी नहीं हो सकती है. इसीलिए छह घंटे चली महापंचायत में बात खेती और किसानों की हो रही थी लेकिन मंच से बोलने वाला हर वक्ता 2013 को हुए मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाते हुए अमन का संदेश भी दे रहा था. किसान महापंचायत के अंत में राकेश टिकैत अब भाजपा को दंगे नहीं करने देंगे. वे लोगों को तोड़ेंगे तो हम जोड़ेंगे. अब पहले की तरह किसानों के मंच से अल्लाह हो अकबर और हर-हर महादेव के नारे गूंजेंगे.'

यूपी में 2022 को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर पश्चिमी यूपी के जिले मुजफ्फरनगर में राजनीति करवट ले रही है. पश्चिमी यूपी प्रदेश की राजनीति के लिहाज से इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव के चरणों की शुरुआत यहीं से होती है.

शुरुआती चरणों के चुनाव से ही भाजपा को चुनौती देने के लिए पश्चिमी यूपी किसान आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण हो गया है. इसीलिए किसान आंदोलन के जरिए पश्चिमी यूपी में कृषि से जुड़े दो प्रमुख समुदाय जाट और मुस्लिम में एकता का प्रयास हो रहा है. ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन" के मुजफ्फरनगर जिले के संयोजक हरीश त्यागी कहते हैं, "किसानों से जुड़ी समस्याओं पर भाजपा सरकारों के अड़ियल रवैये के चलते जाट और मुस्लिम समुदाय एक दूसरे के करीब आ रहे हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी से भाजपा की सीटों में बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी." किसान नेताओं का दावा है कि महापंचायत को मिले किसानों के भारी समर्थन को देखकर वे किसान भी सामने आएंगे जो भाजपा सरकार की नीतियों से त्रस्त हैं लेकिन सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग में पंजीकृत किसानों की संख्या 3.27 करोड़ है लेकिन अगर इनमें गैर पंजीकृत किसान और खेतिहर मजदूर को भी जोड़ लें तो यह संख्या छह करोड़ से अधिक बैठती है. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले किसान यूपी की राजनैतिक का केंद्र बनते जा रहे हैं.

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