पिछड़ों के लिए संग्राम
India Today Hindi|September 22, 2021
हर पार्टी के लिए ओबीसी वोट महत्वपूर्ण है, इसीलिए विपक्षी पार्टियां जाति जनगणना की जोरदार मांग कर रही हैं. सत्ताधारी भाजपा को अंदेशा है कि इससे उसकी सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति बिगड़ जाएगी और अगड़ी जाति का मुख्य जनाधार बिखर जाएगा
कौशिक डेका

जद(यू) प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अगस्त को अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी राजद नेता तेजस्वी यादव के साथ एक असहज गठजोड़ किया. तेजस्वी राज्य विधानसभा में विपक्ष के भी नेता हैं. इन दोनों ने बिहार की 10 दूसरी पार्टियों के नेताओं के साथ दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात कर जाति आधारित जनगणना की मांग की, हालांकि केंद्र सरकार ने जुलाई में ही संसद में कह दिया था कि "नीतिगत मामले के तहत" जाति जनगणना 2021 की जनगणना का हिस्सा नहीं होगी.

दो कट्टर प्रतिद्वंद्वियों को एकजुट कर देने वाली जाति जनगणना की जोरदार मांग का मुख्य उद्देश्य ओबीसी (अन्य पिछड़ी जातियों) की संख्या तय करना है, जो हाल में चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावशाली मतदाता समूह के रूप में उभरे हैं. हालांकि इसका कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है लेकिन धारणा है कि कुल आबादी में ओबीसी का हिस्सा 52 फीसद है (चार दशक पहले मंडल आयोग 1931 में की गई आखिरी जाति जनगणना के आधार पर इतना ही अनुमान लगाया था). लिहाजा उन्हें 27 फीसद आरक्षण मिलना चाहिए. अगर जाति जनगणना में इस धारणा की पुष्टि हो गई तो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की पुरजोर मांग उठ सकती है.

इसमें दांव पर होंगे देशभर में केंद्र और राज्यों की 90 लाख से ज्यादा सरकारी नौकरियां और 23 लाख इंजीनियरिंग सीटों और 80,000 से ज्यादा मेडिकल सीटों समेत शैक्षिक संस्थाओं में दाखिले. भाजपा नीत केंद्र सरकार दूसरे जाति समूहों, खासकर अगड़ी जातियों की नाराजगी मोल लेने के डर से यथास्थिति बदलने से हिचक रही है. लेकिन खासकर उत्तर प्रदेश में अगले छह महीने के अंदर विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अब यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है, जहां भाजपा दूसरी बार सत्ता में आने का प्रयास कर रही है.

इसी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो खुद ओबीसी समुदाय से हैं, के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अपने कैबिनेट सहयोगी राजनाथ सिंह के 2018 में किए वादे से मुकर गई है.

राजनाथ सिंह ने वादा किया था कि 2021 की जनगणना में ओबीसी की संख्या जुटाई जाएगी. इस बीच दूसरी राजनैतिक पार्टियां इस मांग के जरिए न केवल ओबीसी को रिझाना चाहती हैं बल्कि भाजपा को उसके चुनावी शस्त्रागार के कुछ महत्वपूर्ण हथियारों से वंचित कर देना चाहती हैं.

विकासशील समाज अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) ने पाया कि भाजपा का ओबीसी वोट प्रतिशत 2009 में 22 फीसद से बढ़कर 2019 में 44 फीसद हो गया. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 312 सीटें जीती और उसका ओबीसी वोट प्रतिशत 47 फीसद था. फिलहाल राज्य में उसके 32 फीसद विधायक ओबीसी समुदाय के हैं जो 10 साल पहले के मुकाबले 20 फीसद ज्यादा हैं.

लेकिन दूसरी पार्टियां ओबीसी वोट के लिए भाजपा को चुनौती देना चाहती हैं. जाति जनगणना की मांग सिर्फ बिहार के नेताओं ने ही नहीं की है, बल्कि कांग्रेस, एनसीपी, द्रमुक, सपा और बसपा समेत लगभग सभी दूसरी गैरभाजपाई राजनैतिक पार्टियों ने की है. भगवा पार्टी के ऐसा कराने से इनकार के कारण विपक्षी दलों को मोदी सरकार और खासकर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ नया हथियार मिल गया है. समाजवादियों और कांग्रेस ने ओबीसी सम्मेलनों का आयोजन शुरू कर दिया है और बसपा भी हंगामा कर रही है. अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण पर संसद की संयुक्त समिति के सदस्य और बसपा के सांसद शिरोमणि वर्मा का कहना है, "हमने हमेशा कहा है कि ओबीसी को उनका हक मिलना चाहिए और इसके लिए उन्हें आबादी में अपना हिस्सा मालूम होना चाहिए''

मोदी सरकार के लिए शर्मिंदगी की एक बात और है कि जद (यू) और अपना दल जैसे गठबंधन सहयोगियों ने भी यही राग अलापना शुरू कर दिया है. यहां तक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने भी इस विचार पर मुहर लगाई है. आयोग के चेयरमैन डॉ. भगवान लाल सहनी का कहना है, “आयोग का मानना है कि ओबीसी की जनगणना होनी चाहिए. अब सरकार के काम करने की बारी है."

मुश्किल में फंस चुकी भाजपा का अब कहना है कि पार्टी "सिद्धांततः" इस विचार के विरुद्ध नहीं है लेकिन इस मुद्दे पर "व्यापक सहमति" चाहती है. पार्टी के भीतर भी विरोधाभास हैं. पार्टी की सांसद संघमित्रा मौर्य ने लोकसभा में यह मांग उठाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री व ओबीसी नेता धर्मेंद्र प्रधान ने जाति आधारित जनगणना को "क्रांतिकारी प्रक्रिया" करार दिया. ओबीसी संसदीय संयुक्त समिति के सदस्य और भाजपा सांसद राजेश वर्मा का कहना है, "प्रधानमंत्री मोदी इस मामले पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं. हमने इस विचार को खारिज नहीं किया है लेकिन इस मुद्दे पर संसद में पहले बहस होनी चाहिए.

जाति जनगणना की अचानक मांग क्यों

जाति जनगणना की मांग में तेजी 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद शुरू हुई, जिसमें अदालत ने महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में 27 फीसद ओबीसी कोटे को समुदायों के पिछड़ेपन के प्रायोगिक आंकड़ों की कमी की वजह से खारिज कर दिया था. लेखक, पुणे विश्वविद्यालय में महात्मा फुले चेयर के प्रमुख और ओबीसी एक्टिविस्ट प्रो. हरि नरके कहते हैं, "राज्य जाति जनगणना इसलिए चाहते हैं क्योंकि 9,00,0000 ओबीसी प्रतिनिधि देश में अपना पद गंवा सकते हैं, जिनमें अकेले महाराष्ट्र में 56,000 हैं."

देश की जनगणना में एससी/एसटी की गणना होती है जबकि दूसरी जातियों-'सामान्य' (मुख्यतः अगड़ी जातियां) और ओबीसी-की गणना नहीं की जाती. एससी/एसटी को कुल आबादी में उनकी संख्या क्रमशः-15 और 7.5 फीसद-के अनुपात में सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में आरक्षण दिया गया है.

सरकार कानूनी बाधा के कारण अपनी मर्जी से ओबीसी आरक्षण में इजाफा नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में फैसला सुनाया था कि नौकरियों में 50 फीसद से ज्यादा आरक्षण जाति पर आधारित नहीं हो सकता. आरक्षण में एससी और एसटी का हिस्सा 23 फीसद होने की वजह से ओबीसी का हिस्सा बढ़ाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं है. प्रायोगिक आंकड़े जाति आधारित जनगणना से ही मिल सकते हैं, लिहाजा इसकी मांग बढ़ गई; इसी से चुनावी उद्देश्य भी सध जाएगा. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, "भाजपा सांसद और सहयोगी दलों समेत राजनैतिक फलक के ज्यादातर लोगों ने इसका समर्थन किया और जाति जनगणना की मांग की है."

ओबीसी मुद्दे उठाने की बेसब्री इन समुदायों के चुनावी महत्व की वजह से अचानक उभरी है. पिछले तीन दशकों में यह समुदाय-या इसके घटक-सपा, राजद और जद (यू) जैसी जाति आधारित पार्टियों की रीढ़ रहे और वे दो राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के बदलते भाग्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं. इसकी भव्य एकता संसद से ज्यादा कहीं और नहीं दिखती. हाल में संपन्न संसद के मॉनसून सत्र में विपक्ष ने पेगासस जासूसी प्रकरण में सरकार की भूमिका का विरोध करते हुए किसी बहस में हिस्सा नहीं लिया. लेकिन जब राज्यों को किसी भी जाति समूह को ओबीसी घोषित करने का अधिकार देने वाला 127वां संविधान संशोधन विधेयक आया तो सभी पार्टियों ने न केवल बहस में हिस्सा लिया बल्कि एक साथ इस विधेयक के पक्ष में वोट भी कर दिया.

ओबीसी जनगणना के प्रति भाजपा की अनिच्छा

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