खरे न उतरे तो मची खलबली
India Today Hindi|September 22, 2021
नए दौर के रुझानों के अनुरूप और उद्योग के नजरिए से प्रासंगिक बने रहने की खातिर संघर्षरत इंजीनियरिंग संस्थान अब छात्रों के लिए पहले जैसे आकर्षक नहीं रहे. अब वे या तो बंद हो रहे या फिर सीटें कम कर रहे हैं. क्या तकनीकी शिक्षा नियामक इस रुझान को रोक पाएगा?
अमरनाथ के. मेनन

साल 2014-15 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) से मान्यता प्राप्त इंजीनियरिंग संस्थानों में लगभग 32 लाख सीटें हुआ करती थीं जो कि अब तक की सर्वाधिक संख्या है. उस ऊंचाई से फिसलते हुए स्नातक, स्नातकोत्तर और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए सीटों की कुल संख्या दशक के सबसे निचले स्तर, लगभग 23.20 लाख पर आ गई है. एआइसीटीई के अध्यक्ष अनिल दत्तात्रेय सहस्रबुद्धे देश में इंजीनियरिंग शिक्षा के संकट में भी एक अवसर देखते हैं. भारत के तकनीकी शिक्षा नियामक के शीर्ष पद पर अपने सातवें वर्ष में चल रहे सहस्त्रबुद्धे कहते हैं, "इंजीनियरिंग संस्थानों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई थी जिससे उनके पास क्षमता से अधिक सीटें हो गईं और रिक्त सीटों की संख्या भी बढ़ गई थी. इंजीनियरिंग कॉलेजों को बंद करने या फिर सीटें कम करने की हालिया प्रवृत्ति से स्थिरता आएगी और आने वाले वर्षों में गुणवत्ता की निरंतरता सुनिश्चित होगी."

2019-20 में एआइसीटीई ने जहां 153 नए इंजीनियरिंग संस्थानों को मंजूरी दी, वहीं 53 अन्य कॉलेजों का बंद करने का अनुरोध भी स्वीकारा. 2020-21 में कोविड-जनित व्यवधान आने से पहले ही 2015-16 से हर शैक्षणिक वर्ष में कम से कम 50 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो रहे हैं. एआइसीटीई ने इस साल 63 कॉलेजों का संचालन बंद करने की मंजूरी दी है (देखें: खुले और बंद). इन कॉलेजों के बंद होने और छात्रों के कम दाखिले से इंजीनियरिंग सीटों की संख्या में 1,46,000 की कमी आएगी.

एआइसीटीई ने 2020 में फैसला किया कि 2022 तक किसी भी नए इंजीनियरिंग कॉलेज की अनुमति नहीं दी जाएगी और कॉलेजों की नई क्षमता के निर्माण की हर दो साल में समीक्षा की जाएगी. यह आइआइटी-हैदराबाद के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष बी.वी.आर. मोहन रेड्डी की अध्यक्षता वाली एक सरकारी समिति की सिफारिशों के अनुरूप था. पैनल ने यह भी सुझाव दिया कि संस्थान मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, सिविल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे इंजीनियरिंग के पारंपरिक विषयों की सीटों को नई उभरती प्रौद्योगिकियों में बदलने पर विचार करें. अब, एआइसीटीई केवल उन नए इंजीनियरिंग कॉलेजों को मंजूरी दे रही है जो या तो उदीयमान प्रौद्योगिकी विषयों पर फोकस करते हों या फिर पिछड़े क्षेत्रों में खोले जा रहे हों. इसने राज्यों को "अत्यधिक रोजगारपरक व्यावसायिक विषयों" में बीटेक कोर्स शुरू करने की अनुमति दी है.

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में तकनीकी शिक्षा की सीटों में करीब 80 फीसद हिस्सा इंजीनियरिंग का है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें आ रहे छात्रों की संख्या में कमी देखी जा रही है. 2019 के बाद से करीब 5,63,000 सीटें खत्म हो गई हैं. इनमें से 98,476 सीटों को एआइसीटीई ने और बाकी को कॉलेजों ने खाली सीटों और भविष्य में मांग में संभावित गिरावट को ध्यान में रखकर रद्द कर दिया था. 2012-13 में जहां इंजीनियरिंग कॉलेजों में छात्रों के लिए स्वीकृत संख्या 15.4 लाख (3,363 संस्थानों में) थी वह 2020-21 में गिरकर 12.8 लाख (2,978 संस्थानों में) हो गई है. 2020-21 में कुल नामांकन 7,06,533 था.

सहस्त्रबुद्धे का कहना है कि एआइसीटीई ने इंजीनियरिंग शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट को रोकने और इंजीनियरिंग स्नातकों की रोजगार क्षमता में सुधार करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. रोजगारयोग्य क्षमता का मूल्यांकन करने वाली फर्म एस्पायरिंग माइंड्स के 2019 के एक अध्ययन से पता चलता है कि लगभग 80 प्रतिशत भारतीय इंजीनियरिंग स्नातक नॉलेज इकोनॉमी (ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें विकास उपलब्ध संसाधनों पर नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है) में नौकरियों के लिए अयोग्य थे. सहस्त्रबुद्धे इसके लिए निगरानी और नियमन के मोर्चे पर कई खामियों को जिम्मेदार मानते हैं, जिसने भ्रष्टाचार को प्रश्रय दिया, बुनियादी ढांचे की समस्या खड़ी हुई, शिक्षकों की गुणवत्ता गिरी और कॉलेजों तथा उद्योगों के बीच वैसा जुड़ाव न हो सका. एआइसीटीई परीक्षा प्रणाली में सुधारों, विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य इंटर्नशिप और इंडक्शन प्रोग्राम, कोर्स में लगातार संशोधन और शिक्षकों के प्रशिक्षण के माध्यम से इन खामियों को दूर करने के लिए जूझ रहा है.

कॉलेजों के सामने चुनौतियां

इंजीनियरिंग कॉलेजों के सामने कई चुनौतियां हैं जिनसे उन्हें निबटना होगा. वे तेजी से महसूस कर रहे हैं कि विद्यार्थियों की पारंपरिक इंजीनियरिंग विषयों में रुचि खत्म हो रही है. साथ ही, नए मानदंडों और एआइसीटीई की तरफ से कड़ी निगरानी का मतलब है कि कई कॉलेज मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) जैसे कोर्स शुरू ही नहीं कर पाएंगे जिनकी बहुत मांग है. तमिलनाडु के स्व-वित्तपोषित प्रोफेशनल, आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के कंसोशियम के सचिव पी. सेल्वराज कहते हैं, "डिजिटल दुनिया ने डेटा साइंस, एआइ और मशीन लर्निंग में कुशल व्यक्तियों की बड़ी मांग पैदा कर दी है. लेकिन हम उनकी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ हैं क्योंकि एआइसीटीई ने उन कॉलेजों में नए कोर्स शुरू करने की अनुमति नहीं देने फैसला किया है जो पिछले वर्ष में अपनी 50 प्रतिशत सीटें नहीं भर सके." राज्य में 554 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं.

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