तालिबान से आखिर किस तरह से निबटे भारत?
India Today Hindi|September 08, 2021
इस्लामी कट्टरपंथियों की वापसी ने अफगानिस्तान को अनिश्चतता के गर्त में धकेला. भारत को तालिबान की नई हुकूमत के बहिष्कार के बजाए उससे बातचीत करनी चाहिए
राज चेंगप्पा

अफगानिस्तान सल्तनतों की कब्रगाह रहा है. अब यहां प्रतिष्ठाएं भी दफ्न हैं. अमेरिका को तकलीफदेह तजुर्बे के बाद यह समझ आया. वैसे ही भारत को भी. दो-एक साल पहले तक हम उथल-पुथल से भरे इस मुल्क का भविष्य तय करने वाली अहम राष्ट्रों की मेज पर बैठते थे. मगर एक पखवाड़े पहले भारत वहां से रातोरात अपना दूतावास समेटकर कूच करने को मजबूर हो गया. राजदूत रुदेंद्र टंडन और उनके साथी राजधानी काबुल से रात के अंधेरे में बचकर निकले. अगले दो हफ्ते खौफनाक रहे, जब विदेश मंत्रालय को भारतीयों और भारतीय मूल के अफगानों को सुरक्षित निकालने के लिए पूरा कूटनीतिक जोर लगाना पड़ा.

बेशक अशरफ गनी की अगुआई वाली अफगान सरकार ने जिस तेजी से तालिबान के आगे घुटने टेके, उससे हक्का-बक्का रह जाने वालों में भारत अकेला नहीं था. ज्यादा तरतीबवार सत्ता हस्तांतरण के लिए बातचीत में जुटे सर्वशक्तिमान अमेरिका और कई पश्चिमी देशों को भी अपने लोगों को वहां से निकालने के लिए बहुत हाथ-पैर मारने पड़े. भारत के एक बड़े अफसर कहते हैं, "सब उम्मीद कर रहे थे कि तालिबान चार विकेट से जीतेगा. किसने सोचा था कि वह कई दिनों का खेल शेष रहते पारी के अंतर से जीत जाएगा."

तालिबान के अलावा किसी एक चेहरे पर मुस्कान थी, तो वह पाकिस्तान था. यही वह मुल्क था जिसने उसकी वापसी का तानाबाना बुना और रास्ता तैयार किया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने ऐलान किया कि "गुलामी की बेड़ियां" तोड़ दी गई हैं. उन्होंने जताया ऐसे कि मानो वही इस चढ़ाई की अगुआई कर रहे थे, पर इस वापसी का असल खाका राजगद्दी के पीछे की असल ताकत पाकिस्तानी फौज ने तैयार किया. पुरानी प्रशियाई कहावत में थोड़ा हेरफेर करते हुए एक राजनयिक तंज से कहते हैं, "ज्यादातर देशों की एक सेना होती है. मगर पाकिस्तानी फौज के पास अब एक नहीं बल्कि दो देश हैं." वे यह भी कहते हैं कि अगर हम सावधान नहीं रहे, तो "हो सकता है हमें दो टेररिस्तान से जूझना पड़े!"

भू-राजनैतिक असर

तालिबान की वापसी का दूरगामी भू-राजनैतिक असर हो सकता है, खासकर अल कायदा सहित बड़े आतंकी संगठनों के साथ उसके रिश्तों को देखते हुए. यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के एशिया सेंटर के बड़े विशेषज्ञ असफंदयार अली मीर ने एनपीआर के एक कार्यक्रम में "तालिबान की वापसी से दुनिया भर के जिहादियों में नया जोश भर गया है. तालिबान के साथ यह अल कायदा के लिए भी बड़ी फतह है. तालिबान के नजरिए से, इस कारगर बगावत का झंडा उसने ही बुलंद कहा, किया. उन्होंने एक विदेशी कब्जेदार को निकाल फेंका और उनसे जबरदस्ती छीन ली गई सरकार फिर बहाल की. वहीं अल कायदा के नजरिए से, उसने तालिबान की बगावत का समर्थन करके अपने मुख्य दुश्मन यानी अमेरिका को धूल चटा दी."

तालिबान की बगावत का समर्थन करने वाले रूस, चीन और ईरान सरीखे देशों में भी गहरी चिंता पैदा हो गई है कि उनके हितों के दुश्मन दूसरे आतंकी गुटों पर इस जीत का क्या असर होगा. ये तीनों देश खुश हैं कि तालिबान ने अमेरिका को नाकों चने चबा दिए पर उनमें से हरेक ने तालिबान नेताओं से गारंटी मांगी है कि वे अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल ऐसे गुटों के पनपने और फलने-फूलने के लिए नहीं होने देंगे. कारनेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में सीनियर फेलो एश्ले जे. टेलिस कहते हैं, "अब सब कुछ मूलतः इस पर टिका है कि तालिबान इस नए अवतार में क्या रवैया अपनाता है. अगर वे अपने देश से दूसरे देशों को होने वाले खतरों को कड़ाई से काबू में रखते हैं, तो अपने देश में वे चाहे जो करें और उस पर हम कितनी भी नाक-भौं सिकोड़ें, लोग उसकी हर अच्छी-बुरी करतूत को गवारा करेंगे और साथ रहना सीख लेंगे. लेकिन अगर वे 1990 के दशक के तालिबान ही बनते हैं और जिहाद निर्यात करते हैं तो हम सब वाकई मुश्किल में पड़ जाएंगे और इसके गंभीर भू-राजनैतिक नतीजे होंगे.'

भारत के लिए दोहरी चुनौती

तालिबान की वापसी भारत के लिए दोहरी चुनौती लेकर आई. अफगानिस्तान पर अमेरिका के नियंत्रण के वक्त हमारा वास्ता देश पर हुकूमत कर रही लोकतांत्रिक सरकारों से था. अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अशरफ गनी पाकिस्तान को दुश्मन की तरह देखते थे और प्रतिसंतुलन के लिए भारत को बढ़ावा देते थे. बीते दो दशकों में 3 अरब डॉलर (22,000 करोड़ रुपए) खर्च करने के बाद विकास कार्यक्रमों के सबसे बड़े दानदाताओं में होने के नाते हमारी इज्जत थी और रौब-दाब भी. अब बाजी उलट गई है. ड्राइविंग सीट पर पाकिस्तान है और हम हाथ मलते रह गए हैं. भारत को अब न केवल नई ताकत से उठ खड़े हुए तालिबान और उसके साथ आए अनेक स्वछंद कट्टरपंथियों से बल्कि जीत की खुशी से सराबोर पाकिस्तान से भी निबटना है. उस पाकिस्तान से जो अब कश्मीर में मुश्किल पैदा करने के लिए पूरी ताकत झोंकने का जतन करेगा.

आलोचकों का कहना है कि अमेरिका की वापसी के साथ ही हालात बिगड़ने के साफ संकेत थे. तब भी भारत सरकार ने तालिबान से रिश्ते बनाने की संजीदा कोशिश नहीं की. वे कहते हैं कि भारत को वहां हुकूमत के ढहने का इंतजार करने के बजाए नतीजे तय करने के तरीके निकालने चाहिए थे. तभी हम आज सांप की इस बांबी में नहीं होते. अफगानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत राकेश सूद कहते हैं, "हमने अपने सारे अंडे एक टोकरी में रख दिए. वह टोकरी अब टूट गई और अंडे फूट गए. पश्चिम तो सब छोड़-छाड़कर चले जाना गवारा कर सकता था, भारत इसी इलाके का हिस्सा है हम कहां जाएं?" सूद की सलाह है कि हम नए निजाम से रिश्ते कायम करने की नीति बनाएं. उससे पहले इंतजार करें और देखें कि बागडोर अंततः किसके हाथ में है. वे कहते हैं, "आप बाढ़ से उफनाती नदी में कूदकर तैरना नहीं सीख सकते. अब चूक जाने के डर के आधार पर नीति नहीं बनाई जा सकती."

सरकारी सूत्र इस आरोप से इनकार करते हैं कि भारत बहुत देर से जागा. वे बताते हैं कि तालिबान के शीर्ष सरगनाओं से अनौपचारिक संपर्क कायम किए गए थे. एक बड़े अफसर ने कहा, "अच्छी बात यह कही कि तालिबान कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच दोतरफा विवाद मानते हैं और इसमें नहीं पड़ेंगे. उन्होंने कहा कि वे अल्पसंख्यकों को नुक्सान नहीं पहुंचाएंगे और संकेत दिया कि वे चाहेंगे कि भारत विकास के जो काम कर रहा है, उन्हें जारी रखे. तो हम भीतर भले न हों पर हम निश्चत तौर पर ही बाहर भी नहीं हैं. कुछ हलकों में आलोचना की गई कि भारत ने दहशतजदा होकर अपने राजदूत को हड़बड़ी में काबुल से निकाल लिया. जवाब में अफसरों का कहना है कि राजधानी में अफरा-तफरी मची थी और दूसरे आतंकी धड़े इसका फायदा उठा सकते थे. एक चिंता यह थी कि कहीं 1999 की कंधार में आइसी-814 के अपहरण सरीखी स्थिति न हो, जिसमें बंधकों के बल पर भारत को रियायतें देने के लिए मजबूर किया जाए. दूसरी वजह यह थी कि भारत को नई हुकूमत को मान्यता और वैधता देने की कोई हड़बड़ी नहीं थी, बल्कि उसने "उचित समय पर इस कार्ड का इस्तेमाल करने" को तरजीह दी.

तालिबान 1.0 बनाम 2.0

क्या तालिबान 2.0 उस पुराने 1990 के दशक के अपने 1.0 अवतार की ड्रग और ठग वाली छवि से हटकर बर्ताव करेगा? राय बंटी हुई है. उसकी विचारधारा की बुनियाद भले न बदली हो, पर नेतृत्व और कमान श्रृंखला में बेशक तब्दीली आई है. पहले कार्यकाल में तालिबान की हुकूमत ने आदमियों और औरतों के लिए इस्लामी पहनावे और आचरण के सख्त नियम-कायदे लागू किए थे और इस्लामी कानून की अपनी व्याख्या का उल्लंघन करने वालों पर खुलेआम कोड़े बरसाए और फांसी पर लटकाया था. सिनेमाघर बंद कर दिए, मनोरंजन के सारे साधनों पर रोक लगा दी और बामियान में छठवीं सदी की दो बौद्ध प्रतिमाओं सहित अनगिनत सांस्कृतिक कलाकृतियों को तबाह-बर्बाद किया था.

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