दिवालिया पहल से दिवाला
India Today Hindi|September 08, 2021
दिवालिया संहिता भारी उम्मीदों के बावजूद वसूली और समाधान की समय सीमा के मामले में खरी नहीं उतरी
श्वेता पुंज

अमल में आने के पांच साल बाद भी ऋणशोधन और दिवालिया संहिता (आइबीसी) उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी. करीब एक दशक के सोच-विचार के बाद उसे 2016 में पारित किया गया और तब जोरदार दावा किया गया कि यह देश की सुस्त दिवालिया समाधान प्रक्रियाओं और कमतर वसूली का एकमुश्त हल है. इस साल जून में एनसीएलटी (राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण) की एक टिप्पणी इसके नाकाफीपन को उजागर कर दिया. उद्योगपति अनिल अग्रवाल की कंपनी ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज को वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज खरीदने की मंजूरी देते हुए पंचाट ने कहा कि इस खरीद के लिए ट्विन स्टार अपनी जेब से तकरीबन कुछ भी नहीं' चुका रहा था, और यह भी कि मौजूदा लेनदारों को अपने दावों पर 99.28 फीसद 'हेयरकट' (बैंकिंग शब्दावली में नुक्सान) झेलने के लिए मजबूर किया जा रहा था, जो हेयरकट से कहीं ज्यादा उन्हें पूरी तरह मूंड़ना' था. एनसीएलटी ने कहा कि कुल दावे 64,838 करोड़ रुपए के हैं जबकि समाधान से महज 2,962 करोड़या 4.5 फीसद रुपए ही मिले. मौजूदा लेनदारों में बड़ी तादाद एमएसएमई (लघु, छोटे और मध्यम उद्यम) की है और उनमें से कई के हाथ दावों की महज 0.72 फीसद रकम ही लगेगी.

आइबीसी दिवालिया फर्मों से निपटने के लिए 2016 में पहले के वसूली/समाधान कानूनों की जगह लाया गया, जिनमें बीमार औद्योगिक कंपनी कानून 1985 और बैंक तथा वित्तीय संस्थानों को देय ऋण की वसूली कानून 1993 शामिल थे. इसके दो उद्देश्य बताए गए. एक, दिवालिया प्रक्रिया में तेजी लाना और बैंकों को अपनी बैलेंस शीट साफ करके फिर से कर्ज देने में समर्थ बनाना. दूसरे, उन कानूनी खामियों को दूर करना जिनका दुरुपयोग करके नाकाम कारोबारों के मालिक अपने कर्मों को रफा-दफा करके कंपनियों पर नियंत्रण बनाए रखते हैं.

आइबीसी का एक सबसे अहम पहलू यह था कि यह समाधान प्रक्रिया को तेज करने के लिए लाया गया था, ताकि मामलों को 180 दिनों (जुलाई 2019 में बढ़ाकर 330 दिन) के भीतर बंद किया जा सके. दूसरा पहलू यह था कि दिवालिया मामलों में कर्जदाताओं को होने वाले नुक्सान को कम से कम करने के लिए वसूली का प्रतिशत बढ़ाया जाए. मगर वीडियोकॉन की बिक्री पर एनसीएलटी की टिप्पणी इसकी विडंबना उजागर कर देती है. यह उन कर्जदाताओं के लिए खासकर अहम है जिनकी उधार देने की क्षमता ऐसे मामलों के चलते घट जाती है. आइबीसी का मसौदा बनाने वाली दिवालिया कानून सुधार समिति ने 2015 में कहा कि 'जब कर्जदाताओं को पता है कि उनके अधिकार कमजोर हैं जिसके कारण वसूली दर कम है, तो वे कर्ज देने से कतराते हैं. इसीलिए देश में कर्ज कुछेक ऐसी बड़ी कंपनियों तक सीमित है जिनके नाकाम होने की संभावना कम है.' भारतीय दिवाला और ऋणशोधन बोर्ड के पास मौजूदा आंकड़ों (2019 तक) के मुताबिक, आइबीसी से पहले समाधान की कार्यवाहियों के पूरा होने में औसतन छह साल का वक्त लगता था और वसूली दर करीब 22 फीसद थी. सरकार का दावा है कि आइबीसी की बदौलत यह बढ़कर करीब 43 फीसद हो गई है. लेकिन पूर्व वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा की अगुआई वाली संसदीय समिति ने अगस्त में संसद में पेश रिपोर्ट में कहा है कि आइबीसी से वसूली में काफी सुधार का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा है और कुछ मामलों में लेनदारों को 95 फीसद तक हेयरकट को मजबूर किया जा रहा है.

परिसंपत्तियों का मामला

आइबीसी उम्मीदों पर तो खरी नहीं उतरी. इसकी बदौलत बंद मामलों की तादाद बढ़ी है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसने लेनदारों के सामने कर्ज चुकाने से चूकने वालों के खिलाफ एनसीएलटी में कानूनी कार्यवाही शुरू करने का स्पष्ट ढांचा रखा. आइबीसी के बड़े पैरोकारों में एक, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरविंद पानगड़िया कहते हैं, "स्थिति में भारी सुधार आया है."

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सत्ताधीश

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इसे चाहे लचीलेपन की ताकत कह लें, लेकिन आगे के पन्नों पर नमूदार 50 दिग्गजों में से ज्यादातर ऊंचे और असरदार लोगों की हमारी सालाना फेहरिस्त में पिछले कई बार से बने हुए हैं. इसमें कोई शक नहीं कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट और उसकी वजह से घोर आर्थिक बदहाली के दौरान सत्ता, संपदा और शोहरत का कवच साथ होना अच्छा है और महामारी की शुरुआत के बाद यह 'रसूखदार लोगों' की हमारी दूसरी फेहरिस्त है. फिर भी ऐसे साल में जब बहुत-से नीचे की ओर लुढ़क रहे हों, कामयाबी की बागडोर थामे रखना सिर्फ विशेषाधिकार के बूते संभव नहीं. ऐसे अनिश्चित दौर में देश के कारोबार, संस्कृति और मनोरंजन जगत की प्रमुख शख्सियतें खुद को प्रासंगिक बनाए रखकर ही शिखर पर बनी रह सकती हैं. उद्योग दिग्गज दूसरी लहर के संकट के दौर में अनिवार्य सामान और सेवाएं मुहैया कर मैन्युफैक्चरिंग के पहियों को गति देते रहे. डिजिटल रुझान वालों को महामारी से भारी उछाल मिली. बड़ी फार्मा कंपनियों ने जरूरी दवाइयां मुहैया कराके रसूख और साख का नया आभामंडल हासिल किया. अब महामारी के आतंक की जगह उम्मीद का नाजुक एहसास अंगडाई ले रहा है, हमारी फेहरिस्त उनकी प्रतिभा और भूमिका की भी कायल है जो घोर अंधेरे दिनों में हमारा दिल बहलाते रहे और हमें एकजुट किए रखा.

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