तालिबान की वापसी
India Today Hindi|July 28, 2021
अमेरिकियों का 2 जुलाई को अफगान एयरबेस बगराम को छोड़कर चले जाना अपनी सबसे लंबी जंग' से अमेरिकी वापसी का चिरस्थायी प्रतीक है. ठीक अगले दिन 13 जिले तालिबान के कब्जे में चले गए और रफ्तार सुस्त नहीं पड़ी है. वह भी तब जब अमेरिकी वापसी की प्रक्रिया दशक भर पहले शुरू हुई थी. हिलेरी क्लिंटन (तब सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) ने फरवरी 2011 में नीति बदलने विचार किया जब तालिबान के साथ बातचीत की पूर्वशर्ते–हिंसा छोड़कर हथियार डालना, अफगान संविधान को स्वीकार करना और अल कायदा सरीखे आतंकी धड़ों से रिश्ते तोड़ना-बातचीत के नतीजों में बदल दी गईं.
राकेश सूद

तालिबान को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करवाने में पाकिस्तान के दशक भर लंबे निवेश का प्रतिफल मिल रहा था. अगला लक्ष्य उसे वैधता दिलाना था, जो 1990 के दशक में उसे हासिल नहीं थी, क्योंकि तब केवल तीन देशों (पाकिस्तान, यूएई और सऊदी अरब) ने उसे मान्यता दी थी. वैधता दिलाने की यह प्रक्रिया 2013 में दोहा में दफ्तर खोलने से शुरू हुई. उसके बाद पाकिस्तान की पहल पर चतुर्पक्षीय समन्वय समूह (अमेरिका, अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान) की तालिबान के साथ बातचीत हुई और काबुल, हार्ट ऑफ एशिया और मॉस्को प्रक्रियाएं आईं. इस दौरान अमेरिका ने अपनी भूमिका 'अफगान नेतृत्व वाली, अफगान स्वामित्व वाली' शांति प्रक्रिया में मददगार होने तक सीमित रखी.

रास्ता तब खुला जब ट्रंप प्रशासन ने राजदूत जल्मे खलीलजाद को अफगानिस्तान सुलह के लिए विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करके तालिबान से सीधी बातचीत शुरू की. उन्होंने चार उद्देश्यों-युद्धविराम, अल कायदा, आइएस और दूसरे आतंकी धड़ों से रिश्ते तोड़ना, अफगान के भीतर शांति वार्ता और विदेशी बलों की वापसी के खाके के साथ शुरुआत की और जोर दिया कि "जब तक हर चीज पर सहमति नहीं तब कोई सहमति नहीं." अलबत्ता उनके पास प्लान बी नहीं था और तालिबान ने उनके झांसे की कलई खोल दी. अंततः अमेरिका ने तालिबान/आइएसआइ प्लान ए (सुरक्षित रास्ता देने के एवज में समयबद्ध बिना शर्त अमेरिकी वापसी) स्वीकार कर लिया. यही नहीं, तालिबान ने अपनी वैधता भी बढ़ा ली, उस काबुल सरकार की कीमत पर, जिस पर अमेरिका उसकी हिरासत से करीब 5,000 तालिबान विद्रोहियों को रिहा करने के लिए जोर डाल रहा था.

दोहा समझौता 2020 न तो अफगान नेतृत्व वाला था और न स्वामित्व वाला, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक राय से उसका अनुमोदन किया. शायद यह भी अच्छा ही है कि इस पर 29 फरवरी को दस्तखत हुए, क्योंकि 2024 में जब इसकी सालगिरह आएगी, इसका शर्मनाक अंत इतिहास बन जाएगा.

राष्ट्रपति जो बाइडन अरसे से मानते आए हैं कि अमेरिका को अपनी आतंक-विरोधी भूमिका को सीमित करते हुए अफगानिस्तान में विद्रोहियों के खिलाफ अंतहीन कार्रवाइयों से बाहर निकलने की जरूरत है. 14 अप्रैल को जब उन्होंने 9/11 तक अमेरिकी वापसी की अंतिम समय सीमा घोषित की, तालिबान का 76 जिलों पर नियंत्रण था. आज यह संख्या 220 के करीब है. तालिबान की इस बढ़त के बाद भी बाइडन ने यही कहा कि अमेरिका 'राष्ट्र निर्माण में शामिल नहीं है' और अपना भविष्य तय करने का अधिकार और जिम्मेदारी 'अफगान लोगों की है.

तालिबान के भीतर धड़े

अब जब अमेरिका का जाना हकीकत है, पाकिस्तान, ईरान, रूस और चीन शायद एक पुरानी कहावत याद कर रहे हों-अपनी मुरादों के बारे में संभलकर रहो. खासकर जब वे एक नई चुनौती के लिए कमर कस रहे हैं कि वे तालिबान को अपनी सैन्य ताकत पर ज्यादा जोर न देकर सत्ता में साझेदारी स्वीकार करने के लिए कैसे मनाएं.

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