अंदेशों के बीच से उभरती उम्मीद
India Today Hindi|July 28, 2021
केंद्र ने जम्मू-कश्मीर में ठप पड़ी राजनैतिक प्रक्रिया शुरू तो की है लेकिन इसमें कामयाबी के लिए उसे यहां के लोगों के दिल जीतने होंगे और उनका भरोसा भी
राज चेंगप्पा

जुलाई के शुरू में जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अधिकारियों का एक छोटा-सा समूह श्रीनगर से लगे हरि पर्वत इलाके में इकट्ठा हुआ. आखिर उनका मिशन क्या था? दरअसल वे इस बात की थाह लेना चाहते थे कि पहाड़ी पर झंडा फहराने के लिए 100 फुट लंबा खंभा गाड़ना मुमकिन है या नहीं, ताकि जब आसमान साफ हो तो उस पर फहराता भारत का विशाल ध्वज 50 किलोमीटर दूर गुलमर्ग से भी नजर आए. यह झंडा इस बात का प्रतीक होना था कि मोदी सरकार के हाथों अनुच्छेद 370 को रद्द करके जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा छीन लिए जाने और उसे केंद्र शासित प्रदेश में पदावनत कर देने के करीब दो साल बाद भारतीय राज्यसत्ता ने घाटी में अपना निर्विरोध दबदबा स्थापित कर लिया है. यह भी कि कश्मीर अब विवादित राज्य नहीं रहा बल्कि भारतीय संघ का अभिन्न अंग है.

इस कदम के एक पखवाड़े पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र शासित प्रदेश के हालात पर चर्चा के लिए जम्मू-कश्मीर के नेताओं की सर्वदलीय बैठक बुलाई थी. 24 जून की इस बैठक में वही नेता बुलाए गए और शामिल हुए जिन्हें केंद्र सरकार तत्कालीन राज्य को बर्बाद कर देने के लिए बदनाम करती रही थी. मोदी और इन नेताओं के लिए यह अपने-अपने घोषित रुख से पीछे हटना और यह स्वीकार करना था कि वे सब समस्या नहीं बल्कि समाधान का हिस्सा हैं. मगर इस बैठक का आयोजन श्रीनगर की बजाए दिल्ली में करके साफ संदेश दे दिया गया कि स्वायत्तता और आजादी की तमाम बातों का अध्याय बंद हो चुका है. यह केंद्र ही था जिसकी तूती बोल रही थी और वही तय कर रहा था कि नए सामान्य हालात लाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का क्रम क्या होगा. एक विशेषज्ञ कहते हैं, 'फतह के बाद प्रधानमंत्री झंडी दिखा रहे थे कि अगला दौर एकजुटता और सौजन्य का होगा.' तो आखिर वे कौन-से मानदंड हैं जिनसे जम्मू-कश्मीर की यथास्थिति को आमूलचूल बदलने के मोदी सरकार के दुस्साहसी गेमप्लान की सफलता निर्धारित की जा सकती है?

इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है, अपने मकसद में उसका दोटूक होना. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन सरकार बनाने और दोस्ताना रिश्ते कायम रखने के लिए पाकिस्तान को संकेत भेजने सहित कई विकल्पों को आजमाने के बाद मोदी सरकार ने तय किया कि अब निर्णायक कदम उठाने और कश्मीर की स्थिति को लेकर अस्पष्टता खत्म करने का वक्त आ गया है. एक बड़े अफसर कहते हैं, "उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए साफ था कि पहले आतंकी कार्ड को बेमानी करना होगा, खलबली पैदा करने वाले हुर्रियत सरीखे नेटवर्कों से लौह इरादों से निबटना होगा और पाकिस्तान के लिए बगावत के समर्थन को कहीं ज्यादा महंगा बनाना होगा.'

ऐसा करने के लिए सरकार ने साम, दाम, दंड, भेद के चाणक्यनुमा हथकंडे अपनाए. पहले उसने तमाम बड़े नेताओं को छह माह से एक साल तक के लिए घरों में नजरबंद कर दिया. सुरक्षा बलों ने उन लोगों को गिरफ्तार किया, जो उनकी राय में हिंसा भड़का सकते और दहशत पैदा कर सकते थे. फिर उसने महीनों घाटी में इंटरनेट बंद करके भीषण ब्लैकआउट थोपा. उधर सुरक्षा बल दहशतगर्दो और उनके कमांडरों की तलाश में जुट गए और उन्होंने नियमित अंतराल से एक-एक करके अहम आतंकियों का सफाया किया. इस सबसे हिंसा के अर्थशास्त्र और टेरर नेटवर्कों की कमर तोड़ने में मदद मिली. जब पाकिस्तानी फौज ने नियंत्रण रेखा पर गरमागरमी बनाए रखते हुए घुसपैठ का अपना पुराना खेल खेलने की कोशिश की, तो भारतीय बलों को निर्देश दिया गया कि दोगुनी ताकत से जवाब दें जिसकी भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़े.

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