यानी बज गई घंटी!
India Today Hindi|May 19, 2021
विधानसभा चुनावों में निराशाजनक नतीजों ने ब्रांड मोदी पर भाजपा की निर्भरता को लेकर सवाल खड़े किए
अनिलेश एस. महाजन

भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के झटके से कराह रही है, जहां उसके पास अपनी छलांग भरती महत्वाकांक्षाओं के बावजूद 294 सदस्यों के सदन में महज 77 विधायक हैं. भाजपा ने राज्य के चुनाव को नाक का सवाल बनाकर चुनाव प्रबंधन में माहिर देश भर के अपने तीरअंदाजों को तैनात किया था और चीजों को झकझोरने के लिए अमित शाह की 'स्तब्ध और अवाक' करने की रणनीति अपनाई थी. पार्टी और खासकर खुद शाह 200 से ज्यादा सीटें जीतने का नगाड़ा पीटते घूम रहे थे. अब उसके पास 2019 के अपनी 40.7 फीसद वोट हिस्सेदारी बनाए नहीं रख पाने की समीक्षा करना भर बाकी रह गया है.

उत्तरपूर्व में भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने असम में दूसरा कार्यकाल हासिल कर लिया है, पर बिल्कुल पड़ोस के घटनाक्रम ने इस जीत को फीका कर दिया. बंगाल में भाजपा का राज्यारोहण पार्टी के मंसूबों के लिए बेहद अहम था, लेकिन इसने पार्टी की कमजोरियों को और खासकर इस बात को उजागर कर दिया कि उसके बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को गोलबंद करने के लिए बीच के स्तर के कार्यकर्ताओं का अभाव है. इस कमी को पूरा करने के लिए पार्टी दूसरी राज्य इकाइयों से पार्टी नेताओं को लेकर आई, पर पीछे मुड़कर देखने पर यह रणनीति गलत दिखाई देती है. लगता है 'बंगाल के गौरव' का कार्ड खेलना ममता के हक में काम कर गया. प्रवासी कार्यकर्ताओं को लेकर उनके तंज ने भाजपा को आखिर बैकफुट पर ला ही दिया था. असम में जहां पार्टी के पास सर्वानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्व सरमा सरीखे स्थानीय नेता हैं, वहीं बंगाल में चुनाव में उतारे गए कई उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वाम दलों से आयातित' थे. भाजपा की 'वैचारिक मातृ संस्था' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का कहना है कि उसे "भूल (नेताओं को आयात करने की) और चूक (अपनी ही पार्टी के लोगों के दावों)" की कीमत चुकानी पड़ी.

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