नाकामियों की त्रासदी
India Today Hindi|May 19, 2021
सामूहिक अत्येष्टियां, अस्पताल में बिस्तरों के लिए मारामारी चिकित्सा ऑक्सीजन के लिए हायतौबा, हर तरफ हाहाकार, पारिवारिक त्रासदियां-कोविड की दूसरी लहर के डरावने नजारों देश की राज्यसत्ता की धीर नाकामी को बेनकाब कर दिया

सामूहिक चिताएं और कफन में लिपटे शवों की सर्पिल कतारें. बीमार को भर्ती कर लेने की गुहार लगाते हांफते-चिल्लातें स्त्री-पुरुष. मातम मनाते टूटे और रोते-बिलखते लोग. नई दिल्ली में आज, देश के किसी भी दूसरे महानगर की तरह, सड़कें खामोश और बाजार बंद हैं. लेकिन किसी भी अस्पताल का रुख करें तो आपको सड़कों का जाना-पहचाना कोलाहल मिलेगा, जो कभी निस्तब्ध रहने वाले आइसीयू में चरम पर पहुंच जाएगा, जहां बदहवास और मरते लोगों की चीखें और कराहें गूंज रही हैं. बेशक हममें से ज्यादातर लोग अपने घरों में बंद हैं, और ऐसे दृश्यों को केवल अपने टीवी के परदे पर देख रहे होते हैं. हालांकि हम अपने परिजनों, मित्रों, मित्रों के मित्रों को अस्पताल में एक बिस्तर या ऑक्सीजन सिलिंडर, रेमडेसिविर या ज्यादा ऑक्सीजन की गुहार लगाते फोन कॉल नहीं कर रहे या टेक्स्ट मेसेज नहीं भेज रहे होते हैं, तो फेसबुक और व्हॉट्सऐप पर हमदर्दी जता रहे होते हैं.

कोविड-19 की दूसरी लहर अभी अपने चरम की तरफ बढ़ ही रही है, लेकिन इसकी दहशत हम सबके चारों ओर पसर आई है और हममें से कई सारे दुखों से घिरे हैं. हम सभी को यह दुखद एहसास हो चुका है कि हम बार-बार लौटकर आते दुःस्वप्न, पहले से सुन रखी त्रासदी के बीच असहाय खड़े हैं. उन दिनों की कटु यादें हमारे भीतर हैं जब हम बार-बार की गई मूर्खताओं से भरमाए गए थे. भारतीयों की अतिमानवनीय रोगप्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी मूर्खता याद है? स्टील के बर्तन बजाना याद है? दुनिया को यह बताना याद है कि भारत ने कोविड-19 पर फतह हासिल कर ली है?

इस फतह का ऐलान जनवरी में हुआ था. उस अट्टहास जैसी शेखी और आज 3,80,000 नए संक्रमणों तथा रोज 4,000 मौतों के बीच चार महीनों में गंवाए गए मौकों की दास्तान बाबस्ता है. यह सब इसके बावजूद हुआ है कि केंद्र सरकार के पास कोविड के प्रबंधन के लिए शीर्ष अफसरों और विशेषज्ञों के अधिकार प्राप्त समूहों और कार्यबलों का पूरा जत्था है (साथ का ग्राफिक देखें). यह कार्रवाई का वक्त था. जाहिर चीजों यानी डॉक्टरों, अस्पतालों में बिस्तरों, कोविड की दवाइयों और टीकों, ऑक्सीजन, वायरस रिसर्च और केंद्र-राज्य तालमेल की प्राथमिकताएं तय करने का वक्त था. आप कह सकते हैं कि कोविड की सबसे अधिक पस्त तो शिकार तो देश की राज्यसत्ता है, लेकिन यह बात को अधिक खींचना होगा.

हकीकत यह है कि राज्यसत्ता और उसे चलाने वालों ने हमें नाकाम किया है-उसी तरह जैसे जिंदगी में कोई हिमालय के आकार की भारी-भरकम भूल हो जाए. अलबत्ता वह राज्यसत्ता अब भी मौजूद है, उसकी सारी शाखाएं भी पूरी तरह साबुत हैं और कोविड-19 के मौजूदा उभार को शांत करने और इसके संक्रमण की तीसरी लहर के खतरे को रोकने की चुनौती पर खरा उतरने के लिए हमें इस पर भरोसा करना ही होगा. इस प्रक्रिया की शुरुआत इस बात की पड़ताल से होनी चाहिए कि हम कहां और कैसे नाकाम हुए.

अगले पन्नों में हम अपने राजनैतिक नेतृत्व की लापरवाही, उदासीनता और नाकामी की दुखद कहानी बेपरदा कर रहे हैं. संस्थाओं का ढह जाना और अफसरशाही की कायरता जिसने सुपर स्प्रेडर धार्मिक मेलों और आठ चरण लंबे चुनाव अभियान के राजनैतिक उत्सव की सुविधा प्रदान की, वह भी तब जब महामारी की दूसरी लहर फूट पड़ी थी. वह अहंकार जिसकी बदौलत हमारे नेता विशेषज्ञ समूहों की चेतावनियों को नजरअंदाज कर पाए. राष्ट्रीय आपदा के बीचोबीच केंद्र और राज्यों के बीच सर्वदलीय गठबंधन बनाने की उनकी अक्षमता.

अब जब देश की कुछ सबसे मुखर और तेज आवाजें खामोश हो गई हैं, कोविड की दूसरी लहर को संभालने में सरकार की नाकामी को लेकर पूछे जा रहे परेशान और नाराज करने वाले सवालों पर सत्ताधारियों की खामोशी कानफोडू हो सकती है. हमारी रिपोर्ट इनमें से कुछ सवालों के जवाब देती हैं और विशेषज्ञों के सुझाव सामने रखती हैं कि गलतियों की इस अनवरत त्रासदी से निकलने का रास्ता कैसे खोजें. सबसे ज्यादा जरूरत है कि सरकार के सक्रिय होकर काम करे और तेजी से कदम उठाए.

कोविड-19 के इंतजामों के लिए मोदी सरकार का खास व्यवस्था तंत्र

केंद्र सरकार ने 29 मार्च 2020 को कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई के विभिन्न पहलुओं से निपटने के लिए 11 अधिकार प्राप्त समितियों का गठन किया था. 11 सितंबर को उन्हें छह छोटे समूहों में बदल दिया गया और प्रत्येक को ज्यादा बड़ी भूमिका सौंपी गई. ये समूह मुख्य सचिवों या दूसरे निर्दिष्ट अधिकारियो के जरिए राज्य सरकारों के साथ तालमेल करके अपने काम करते हैं. इन अधिकार-प्राप्त समूहों की तो प्रमुख भूमिकाएं हैं ही, असल मुद्दा, राज्यों के साथ तालमेल बिठाने और अक्तूबर के आसपास पहली लहर के मंद पड़ने तथा मार्च में दूसरी लहर के आने के बाद, उनकी धीमी पड़ती रफ्तार का है. अब ये समूह चिकित्सा के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने और मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटे हैं

प्रमुख अधिकार-प्राप्त समूह

चिकित्सा ढांचा और कोविड प्रबंधन

अध्यक्षः डॉ. विनोद पॉल, नीति आयोग सदस्यः बॉयोटक्नोलॉजी विभाग की सचिव डॉ. रेणु स्वरूप; एनडीएमए के वी. तिरुप्पुगझ; केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, केंद्रीय कैबिनेट और पीएमओ में डायरेक्टर स्तर का एक अधिकारी; एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया; आइसीएमआर के डॉ. रमण आर.

गंगाखेडकर; रक्षा मंत्रालय के विशेष सचिव जीवेश नंदन कार्यक्षेत्रः कोविड के प्रकोप को रोकना, मानक प्रोटोकॉल प्रकियाओं का सुझाव देना और वैक्सीन के विकास उत्पादन की निगरानी करना. यह अस्पताल में बिस्तरों, आइसोलेशन और क्वारंटीन सुविधाओं की उपलब्धता की समीक्षा भी करता है और रोग की निगरानी तथा टेस्टिंग भी संभालता है

ऑक्सीजन की आपूर्ति को बढ़ाना और उसका प्रबंधन

अध्यक्षः गुरुप्रसाद महापात्र, सचिव, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग सदस्यः फार्मास्यूटिकल्स की सचिव एस. अपर्णा; टेक्सटाइल्स सचिव यू.पी.सिंह; आयुष सचिव राजेश कोटेचा और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आपात चिकित्सा रिस्पॉन्स डिविजन के अधिकारी डॉ. पी. रवींद्रन कार्यक्षेत्रः ऑक्सीजन और संबंधित संसाधनों और बुनियादी ढांचे का प्रबंधन और मांग तथा आपूर्ति का समन्वय बनाना

आपूर्ति श्रृंखलाओं और लॉजिस्टिक्स प्रबंधन को आसान बनाना

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