भयावह आपदा
India Today Hindi|May 12, 2021
संक्रमण के बेतहाशा बढ़ते मामलों के बीच ग्रामीण इलाकों में खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवा तंत्र और किसी तरह की तैयारी के अभाव कोविड के खिलाफ लड़ाई में गंभीर बाधाएं
राहुल नरोन्हा

पूर्वी मध्य प्रदेश के बालाघाट के जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर ग्राम काटंग टोला में 50 वर्षीय स्कूल शिक्षक गिरिधारी लाल ठाकरे को 12 अप्रैल को बुखार, खांसी और सर्दी की शिकायत हुई. उन्हें ब्लॉक मुख्यालय वारासिवनी के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में ले जाया गया, जहां अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई. उनकी पत्नी तोमेश्वरी ठाकरे ने भी 14 अप्रैल को ऐसे ही लक्षणों की शिकायत की और उसी शाम उनका भी निधन हो गया. कुछ ही समय बाद गिरिधारी के बड़े भाई कुंवरलाल में भी ऐसे ही लक्षण दिखाई दिए. उन्हें जांच में कोविडग्रस्त पाए जाने पर वारासिवनी के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया गया. काटंग टोला और उससे सटे झालीवाड़ा गांव में कम से कम 300 लोग इन्फ्लूएंजा जैसे लक्षणों से पीड़ित हैं, लेकिन उनमें ज्यादातर लोग कोविड परीक्षण या उपचार का विरोध कर रहे हैं. उनका मानना है कि यह मौसमी फ्लू है. लेकिन अब इन मौतों के बाद से लोग कुछ हद तक चिंतित हुए हैं.

विभिन्न राज्यों के शहरों और कस्बों में स्वास्थ्य तंत्र पर भारी पड़ने के बाद, कोविड अब ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहा है, जो 2020 की पहली लहर में काफी हद तक बचे रहे थे. इसी कारण ऐसी धारणाएं भी बनी थीं कि कोविड संक्रमण सिर्फ शहरियों को लगता है. फिलहाल कोविड मामलों में उछाल केवल मध्य प्रदेश के गांवों में ही नहीं है. ग्रामीण महाराष्ट्र शायद सबसे बुरी तरह से प्रभावित है, जहां से राज्य के शहरी क्षेत्रों से ज्यादा संख्या में पीड़ित निकल रहे हैं. राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में भी कोविड संक्रमण के मामलों में तेजी से वृद्धि की सूचनाएं आई हैं, जबकि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड के प्रसार का दोष अन्य बातों के अलावा अप्रैल माह में हुए पंचायत चुनावों के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पालन न होने को बताया जा रहा है.

परीक्षण और इलाज के प्रति जागरूकता और अनिच्छा के कारण ग्रामीण आबादी को कोविड का खतरा ज्यादा है. यह समस्या इस तथ्य के कारण और जटिल हो गई है कि चिकित्सा का बुनियादी ढांचे के टर्शरी सेंटर (गंभीर मरीजों के इलाज वाले) ज्यादातर शहरों में हैं. देहात के गंभीर रोगी इलाज पाने की उम्मीद में इन्हीं केंद्रों पर पहुंच रहे हैं.

इस ओर से बेपरवाह रही केंद्र और राज्य सरकारें कोविड की दूसरी लहर को बड़ी आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलने से रोकने की रणनीति तलाश रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस के अवसर पर कहा कि कोविड की चुनौती इस साल बड़ी है और इसके गांवों में प्रकोप की रोकथाम की कोशिशें बेहद जरूरी हैं. उन्होंने कहा, "मुझे पूरा विश्वास है कि कोरोनोवायरस के खिलाफ इस लड़ाई में भारत के गांव और इन गांवों का नेतृत्व करने वाले ही सबसे पहले विजयी होंगे. ग्रामीण लोग देश और दुनिया को रास्ता दिखाएंगे.'

राज्य सरकारों ने इस लगातार व्यापक होती महामारी से निपटने के लिए अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. लेकिन सवाल बड़े हैं. शहरी क्षेत्रों में मौजूद चुनौती से जूझने में ही सरकार पस्त हैं, उसकी पूरी शहरों में ही लगी है, ऐसे में क्या ग्रामीण क्षेत्रों पर मंडरा रहे खतरे को रोकने के लिए पर्याप्त सरकार के पास संसाधन बचे हैं? या फिर ऐसी मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति का भी अभाव दिखता है, जो देहात की सेहत न बिगड़ने दे.

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 5 अप्रैल के बाद से ऐसे करीब U150,000 लोगों की पहचान की गई, जिनमें इन्फ्लएंजा की तरह के लक्षण थे. उनका टेस्ट करने पर करीब 26,000 लोगों का टेस्ट कोविड पॉजिटिव पाया गया जो 17.3 प्रतिशत की पॉजिटिव दर दर्शाता है. यह 27 अप्रैल को राज्य भर की 23 प्रतिशत की पॉजिटिव दर से बहुत पीछे नहीं है. 26,000 ग्रामीण मरीजों की यह संख्या 5 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच मध्य प्रदेश में पाए गए कुल 189,055 नए मामलों की संख्या का करीब 14 प्रतिशत है. कोविड के खिलाफ जंग में सबसे बड़ी बाधा यह आ रही है कि उच्चतर दर्जे के सभी अस्पताल केवल शहरों में स्थित हैं और उनमें मरीजों की भारी भीड़ हो गई है. दूसरे शब्दों में कहें तो गांव अपने ऊपर ही निर्भर हैं. कुल 819 कोविड सेंटरों में से केवल 69 सेंटर ही ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं. राज्य में 21,637 आइसोलेशन बिस्तरों में से केवल 3,039 बिस्तर ही ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. शहरी क्षेत्रों में जहां 22,145 ऑक्सीजन बेड और 9,271 आइसीयू बेड हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 338 ऑक्सीजन बेड और 51 आइसीयू बेड हैं. बड़े शहरों के करीब रहने वाले ग्रामीण लोग वहां के अस्पतालों में बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, "भोपाल के अस्पतालों में करीब 30-35 प्रतिशत मरीज गांवों के हैं या फिर 200 किमी के आसपास के छोटे शहरों से आए हैं. इंदौर का भी यही हाल है."

दूरदराज के इलाकों में संक्रमण में तेजी से उछाल से क्या पता चलता है? दक्षिणी और पूर्वी मध्य प्रदेश का बड़ा हिस्सा आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से महाराष्ट्र के कस्बों और शहरों से जुड़ा हुआ है. महाराष्ट्र में कोविड की दूसरी लहर आने के बाद भी इन क्षेत्रों के लोगों की आवाजाही जारी रही. होली के आसपास महाराष्ट्र में काम करने वाले प्रवासी मजदूर मध्य प्रदेश के अपने गांवों में लौट आए थे. जब मौतें होने लगी तब जाकर वे इलाज के इधर-उधर भागने लगे. वारासिवनी के अनसेरा गांव के सामाजिक कार्यकर्ता गौरव सिंह परधी कहते हैं, "मध्य प्रदेश में बालाघाट जिले के वारासिवनी, कटंगी, बैहर, लांजी और मलाजखंड जैसे कस्बों की ऐसी ग्रामीण आबादी संक्रमण की चपेट में आ गई जो शहरों में काम करने, कुछ खरीदने-बेचने या नौकरी करने के लिए जाती थी."

सरकार की रणनीति यह है कि ग्रामीण इलाकों में संक्रमण के फैलाव पर काबू पाया जाए, लोगों में जागरूकता पैदा की जाए और मरीजों को इलाज मुहैया कराया जाए. संभावित मामलों की पहचान करने के लिए रोजगार सहायकों, आशा कार्यकर्ताओं और पंचायत अधिकारियों को बाहर से आने वाले लोगों पर नजर रखने को कहा गया है, चाहे वे कुंभ से लौटने वाले तीर्थयात्री हों या प्रवासी मजदूर.

5 अप्रैल से 25 अप्रैल के बीच करीब 48,000 लोग गांवों में लौटे थे. जिनमें लक्षण पाए गए, उन्हें घरों या गांवों में बनाए गए करीब 20,500 क्वारंटीन सेंटरों में रखा गया है. स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के जरिए कोविड के मरीजों या इन्फ्लूएंजा जैसे लक्षणों वाले लोगों को एक मेडिसिन किट दी जा रही है, जिसमें बुनियादी एंटी-बॉयोटिक दवाएं, पैरासिटामोल की टैबलेट और विटामिन की गोलियां होती हैं. ग्रामीण विकास के प्रमुख सचिव उमाकांत उमराव कहते हैं, "सभी जिलों में त्वरित सेवा टीमें गठित हो गई हैं. हमने क्वारंटीन सेंटरों में सभी जरूरी सामान के लिए पंचायत कोष का इस्तेमाल करने का अधिकार दे दिया है." उमराव का दावा है कि करीब 90 प्रतिशत पंचायतों में 'जनता कप!' है और बाहर से आने वालों के प्रवेश पर रोक है. -राहुल नरोन्हा

राजस्थान

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