टीके पर अनिश्चितता
India Today Hindi|May 12, 2021
राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के सामने आपूर्ति, वितरण और उसकी कीमतों के निर्धारण की चुनौतियां
अमरनाथ के. मेनन और पी.बी.जयकुमार

कोविड-19 महामारी के खिलाफ अभियान के लिए 1 मई से ग्रेट इंडियन वैक्सीन रोलआउट का प्रारंभ हो रहा है जिसके तहत देश भर में करोड़ों लोगों का टीकाकरण किया जाएगा. अभियान विशाल पैमाने पर होने वाला है जो देश में आम चुनाव कराने या एक दशक में होने वाली जनगणना के काम से भी कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा. 16 जनवरी को जब इसे शुरू किया गया था तो चरणबद्ध तरीके से होने वाले इस कार्यक्रम देश में कोविड की वैक्सीनों की उपलब्धता के अनुरूप रखा गया था. तब पहली प्राथमिकता स्वास्थ्य सेवा और फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मियों के टीकाकरण की थी क्योंकि वे ही महामारी का सीधे तौर पर सामना कर रहे थे. इसके बाद नंबर आया 60 साल से ज्यादा उम्र वालों और उनमें इस वायरस से मरने वालों की दर सबसे ज्यादा थी. अब तक सब कुछ ठीक चल रहा था. देश में वैक्सीन की मांग आसानी से पूरी हो सकती थी क्योंकि प्राथमिकता के तहत आने वाले लोग टीका लगवाने से हिचक रहे थे, इसलिए जितनी संख्या में टीका लगाया जाना था, उसकी आधी संख्या में ही टीका लग पाया था. देश में टीकों की उपलब्धता इतनी थी कि भारत जरूरतमंद देशों को 6.5 करोड़ वैक्सीनों का निर्यात कर सकता था.

लेकिन मार्च में अचानक सब कुछ तब पलटना शुरू हो गया जब सरकार ने 1 अप्रैल से वैक्सीन लगवाने की योग्यता रखने वाले लोगों की उम्र घटाकर 45 साल और उससे ऊपर कर दी. इसके बाद आपूर्ति के मुकाबले मांग बड़ी तेजी से बढ़ने लगी. केंद्र सरकार के अधिकारी बचाव करते हुए कहते हैं कि भारत में 14.3 करोड़ लोगों का टीकाकरण हो चुका था और यह भले ही दुनिया में सबसे बड़ी संख्या नहीं है (अमेरिका और चीन इससे ज्यादा बड़ी संख्या में टीकाकरण कर चुके हैं) लेकिन जितने कम समय में इतने लोगों का टीकाकरण किया गया है, उसे देखते हुए यह सबसे तेज टीकाकरण अभियान रहा है. यह आंकड़ा इस तथ्य को छिपा लेता है कि देश की जनसंख्या के हिसाब से अभी तक मुश्किल से 1.5 प्रतिशत लोगों का ही टीकाकरण हो पाया है. जिन लोगों की गिनती सबसे ज्यादा खतरे वालों (60 वर्ष से ऊपर) के तौर पर की गई है, उनकी अनुमानित 12 करोड़ की आबादी में से केवल 6.3 करोड़ को ही टीका लगा है. इनमें 93 लाख लोग ऐसे भी शामिल हैं जिन्हें 27 अप्रैल तक दूसरा टीका भी लगाया जा चुका है. अभी करीब 6 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को टीका लगना बाकी है जबकि 1 अप्रैल से 45 वर्ष से ऊपर वाले 20 करोड़ लोग टीका लगवाने की लाइन में लग गए हैं. सारा मामला तब तेजी से बिगड़ने लगा जब उसी के साथ ही कोविड की दूसरी लहर ने देश को चपेट में ले लिया. वायरस की भयावहता ने बेफिक्र बैठी केंद्र और राज्य सरकारों पर अचानक धावा बोल दिया और धीमी रफ्तार में चल रहे इस अभियान को एकाएक झटका लगा दिया.

मेडिकल इमरजेंसी ने देश को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया, जिसके कारण मोदी सरकार को विपक्ष की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. विपक्ष केवल इस बात को लेकर ही हमलावर नहीं है कि सरकार ने समय से पहले ही कोविड की महामारी पर विजय पाने का दावा करने लगी थी बल्कि यह भी कह रहा है कि सरकार ने टीकाकरण अभियान को पर्याप्त तेजी से नहीं चलाया और वह वैक्सीनों का निर्यात करने में लग गई जबकि उसे पहले अपने देश के लोगों की तरफ ध्यान देना चाहिए था. दूसरी लहर के हमले को झेलने में लाचारगी को लेकर हर तरफ से मिल रही आलोचना झेल रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के टीकाकरण कार्यक्रम को बदलने का फैसला कर लिया. उन्होंने घोषणा की है कि 1 मई से 18 साल से ऊपर वाले भी टीका लगवा सकते हैं. घोषणा के साथ ही टीका लगवाने की योग्यता रखने वालों की संख्या बढ़कर 90 करोड़ तक पहुंच गई. पूर्ण टीकाकरण के लिए हर व्यक्ति को दो टीकों की जरूरत होती है, इस लिहाज से देश को करीब 180 करोड़ वैक्सीनों की जरूरत होगी. वैक्सीन बनाने वाली दो भारतीय कंपनियों की क्षमता प्रतिमाह 11 करोड़ वैक्सीन उत्पादन की ही है. इस हिसाब से 18 साल से ऊपर के सभी लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य पूरा करने में कम से कम डेढ़ साल लग जाएंगे. जाहिर है कोविड की एक के बाद एक आने वाली लहर को देखते हुए यह असंतोषजनक स्थिति है. मोदी ने वैक्सीनों का उत्पादन और उपलब्धता को बढ़ाने के लिए नाटकीय रूप से कई और घोषणाएं की हैं. लेकिन इन घोषणाओं ने जवाब से ज्यादा सवाल ही खड़े कर दिए हैं.

कमी से निपटना

वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने फैसला किया है कि वह देश की दो कंपनियों की न केवल मदद करेगी बल्कि विदेशी वैक्सीनों के आयात का रास्ता भी खोल देगी जिसमें रूस निर्मित वैक्सीन स्पुतनिक-भी शामिल है. देश में कोविशील्ड बनाने वाली सीरम इंस्टीट्यूट (एसआइआइ) और कोवैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक के लिए सरकार ने 4,500 करोड़ रु. की राशि मंजूर कर दी है ताकि वे उत्पादन क्षमता बढ़ा सकें. एसआइआइ जुलाई तक अपना उत्पादन 7 करोड़ वैक्सीन से बढ़ाकर 10 करोड़ तक कर देगी जबकि भारत बायोटेक को अगस्त तक अपना उत्पादन 3 करोड़ से बढ़ाकर 5.8 करोड़ तक करना होगा. इन अनुदानों का पुनर्भुगतान इस बात पर निर्भर है कि दोनों कंपनियां कम लागत पर निर्धारित मात्रा में केंद्र को वैक्सीन बेचेंगी.

लेकिन मांग को देखते हुए प्रतिमाह 11 करोड़ वैक्सीन से बढ़ाकर 15.8 करोड़ वैक्सीन करके चार महीने में लक्ष्य पूरा करना पर्याप्त नहीं होगा. वैक्सीन की कमी से निबटने के लिए सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियां जैसे इंडियन इम्युनोलॉजिकल्स लिमिटेड, भारत इम्युनोलॉजिकल्स लिमिटेड और हाफकिंस इंस्टीट्यूट अगस्त के महीने से प्रतिमाह 5 करोड़ कोवैक्सीन की आपूर्ति करेंगी. इस बीच डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज, जिसके पास रूस की स्पुतनिक फाइव वैक्सीन की 25 करोड़ डोज की मार्केटिंग और वितरण का विशेष अधिकार है, एक बार कीमत तय होने के बाद किसी भी जगह से तैयार वैक्सीनों का आयात कर सकती है. इस तरह अगस्त से हर महीने 22.5 करोड़ डोज तक उपलब्धता बढ़ सकती है. गणना यह है कि योग्यता रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अक्तूबर के मध्य तक पहली डोज ले चुका होगा और अगले साल जनवरी के आखिर तक दूसरी डोज लगवा चुका होगा, बशर्ते बीच में उत्पादन और वितरण की कोई बाधा न खड़ी हो जाए.

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