सांस लेने का संघर्ष
India Today Hindi|May 12, 2021
खतरनाक दूसरी लहर और ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी ने कोविड के खिलाफ लड़ाई को बेहद मुश्किल बना दिया, सरकार इससे क्यों बेपरवाह बनी रही और अब नाकामी दूर करने तथा हालात पर काबू पाने के लिए क्या कर सकती है
संदीप उन्नीथन

उस 23 अप्रैल की रात स्वास्थ्य सेवा से जुड़े 53 वर्षीय सुभाष वर्मा और उनकी पत्नी अनुजा दक्षिणी दिल्ली के द्वारका स्थित अपने फ्लैट में थके-मांदे लौटे. उन्होंने अपने घर से करीब 22 किमी दूर रोहिणी में कोविड के लिए बनाए गए जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल के इमरजेंसी वार्ड में अनुजा की गंभीर रूप से बीमार बहन तनुजा को भर्ती कराने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए पूरा दिन बिता दिया था. करोलबाग के एक स्कूल में अध्यापिका 53 वर्षीय तनुजा का कोविड का टेस्ट 16 अप्रैल को पॉजिटिव आया था. उनके ऑक्सीजन का स्तर जब गिरकर 70 पर पहुंच गया तो उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया.

रात करीब 1.30 बजे इस दंपती के पास अस्पताल से फोन आया. तनुजा की हालत बिगड़ गई थी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. अस्पताल से उन्हें बताया गया, "हम नहीं जानते कि क्या किया जाए. कृपया आप सुबह आ जाइए." पांच घंटे बाद वर्मा दंपती जब अस्पताल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि तनुजा रात नहीं निकाल पाईं, उनकी मौत से कम हो चुकी थी. दूसरे मरीजों के फूट-फूटकर रो रहे रिश्तेदारों को देख उन्हें एहसास हुआ कि ऐसा कैसे हो गया, "मेरी बहन अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म हो जाने से मर गई...' उस दिन उस अस्पताल में कम 20 मरीजों की मौत हो गई थी क्योंकि अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पाइप के जरिए पहुंचने वाली ऑक्सीजन खत्म हो गई थी. मरीज धीरे-धीरे बेहोशी की हालत में पहुंच गए. उनमें से ज्यादातर के चेहरों पर अब भी मास्क लगे हुए थे. उनके खून में ऑक्सीजन खत्म हो चुकी था, इस स्थिति को हाइपोक्सिया कहा जाता है.

नए म्यूटेंट स्ट्रेन इतने आक्रामक हैं कि अगर पहले या दूसरे दिन दवा नहीं देते, तो मरीज गंभीर हालत में पहुंच जाता है.- डॉ.संदीप दत्ता श्वास रोग विशेषज्ञ, पश्चिम दिल्ली आइएमए के सचिव

उस दिन अस्पताल के एक वकील ने दिल्ली हाइकोर्ट को बताया, "हम अक्षरशः सांस लेने के लिए झटपटा रहे हैं." अस्पताल में लिक्विड ऑक्सीजन की आपूर्ति रात 10 बजे तक खत्म हो चुकी थी. ऑक्सीजन का जो टैंकर शाम 5.30 बजे तक पहुंचना था, वह लगभग आधी रात को पहुंचा. अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जब बैकअप सिलिंडरों को चालू किया तो प्रेशर में गिरावट आने से मरीजों की मौत हो गई.

अस्पतालों ने समय पर ऑक्सीजन न मिलने के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार बताया है. इसके जवाब में राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है कि समय पर ऑक्सीजन पहुंचाने में देरी न होने को आश्वस्त नहीं किया. आरोपों का यह खेल जारी रहा, जबकि कोविड की दूसरी खतरनाक लहर ने देश को महामारी के केंद्र में तब्दील कर दिया. संक्रमण का ग्राफ जो सीधा ऊपर की ओर बढ़ता गया, 26 अप्रैल को पूरी दुनिया में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया-3,50,000 से ज्यादा नए मामले दर्ज हो चुके थे. पहली लहर के समय सबसे ज्यादा केस पिछले साल 16 सितंबर कोभारत में नए मामलों की संख्या 96,424 तक रिकॉर्ड की गई थी.

हजारों की संख्या में गंभीर रूप से बीमार मरीज, जिनके फेफड़े सार्स-कोवी2 स्ट्रेन से खराब हो चुके थे, सबसे ज्यादा प्रभावित 12 राज्यों के अस्पतालों में भर चुके थे. मेडिकल ऑक्सीजन की मांग 10 गुना बढ़ गई थी-अप्रैल के अंत तक प्रतिदिन 700 मीट्रिक टन से बढ़कर 6,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी. देश की लचर चिकित्सा व्यवस्था बड़ी संख्या में नए मामलों के आने से चरमरा उठी है और देश भर के अस्पतालों ने मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति में खतरनाक हद तक कमी दर्ज करनी शुरू कर दी. गुजरात में 350 मीट्रिक टन की कमी रिकॉर्ड की गई थी, अप्रैल के मध्य तक कम से कम 19 मरीज राजकोट, बनासकांठा, नवसारी, मेहसाणा और सुरेंद्रनगर जैसे जिलों में ऑक्सीजन की कमी के चलते जान गंवा चुके थे. यहां तक कि औद्योगिक राज्य महाराष्ट्र, जिसके आठ ऑक्सीजन प्लांट 1,250 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, को गुजरात, छत्तीसगढ़ और दूरदराज के राज्य झारखंड और आंध्र प्रदेश से फोन पर संपर्क करना पड़ा.

देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ऑक्सीजन की मांग प्रतिदिन 2,000 मेडिकल सिलिंडरों से बढ़कर 7,000 सिलिंडरों तक पहुंच गई. वहां के एक स्थानीय निवासी रहमत अली शहर में गैस बनाने वाले दो प्लांटों में से एक मुरारी गैसेस के बाहर अपना खाली सिलिंडर लेकर पांच घंटे से लाइन में लगकर इंतजार कर रहे थे. इस बीच वे एक फोन कॉल को याद कर रहे थे जिसमें रोते हुए उन्हें बताया गया था कि उनकी बीमार मां की मौत हो चुकी थी. प्लांट के मैनेजर सुशील सिंह ने असहाय होकर विनती करने के अंदाज में बताया, "हम प्रतिदिन 800 सिलिंडर गैस का उत्पादन करने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं. लेकिन मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं.'

लेकिन सबसे बुरा हाल दिल्ली का था. राष्ट्रीय राजधानी में 27 अप्रैल को 24,149 नए मामले और 381 मौतें दर्ज की गई थीं. दिल्ली में अपना कोई ऑक्सीजन प्लांट नहीं है, इसलिए दिल्ली को मेडिकल ऑक्सीजन के लिए उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की सप्लाई पर निर्भर रहना पड़ता है. 20 अप्रैल तक दिल्ली के अस्पतालों को 700 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत थी लेकिन उसे केवल 480 मीट्रिक टन ऑक्सीजन ही मिल पाई थी. जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल का हादसा, जिसे अब यही नाम दे दिया गया है, शहर के बाकी कई हिस्सों में भी दोहराया जा रहा था. अस्पताल वाले बेबस होकर सोशल मीडिया पर अपील कर रहे थे क्योंकि उनके यहां ऑक्सीजन का स्टॉक बड़ी तेजी से घटता जा रहा था. अस्पताल के स्टाफ मरीजों के परिजनों से ऑक्सीजन की व्यवस्था करने को कह रहे थे. लेकिन यह दशा देखकर भी सरकारी तंत्र पर जूं नहीं रेंगी.

कालाबाजारी

कालाबाजारियों ने रातोरात पैसा बनाने का मौका देखकर सिलिंडरों की जमाखोरी शुरू कर दी और सिलिंडर की कीमत 64,000 रु. तक मांगने लगे. दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के दशरथपुरी में एक कालाबाजारी करने वाले के घर से 32 ऑक्सीजन सिलिंडर जब्त किए गए. उसने उन सिलिंडरों की गैस को छोटे सिलिंडरों में डाल दिया था और उन्हें 12,500 रु. की दर से बेच रहा था. देश भर में कुछ जगहों पर ऑक्सीजन की आपूर्ति पूरी तरह से टूट चुकी थी. रिसाव और कम दाब के चलते बहुत से मरीजों की मौत हो गई थी. मरीजों के रिश्तेदार जब सोशल मीडिया पर सहायता की मांग करने लगे तो सिविल सोसायटी के लोग और स्वयंसेवी लोग सिलिंडरों और आइसीयू की व्यवस्था करने में लग गए.

तनुजा विद्यार्थी के रिश्तेदारों ने देखा कि अस्पतालों में बिस्तर पाना बहुत कठिन काम हो गया है और यह तो उनकी परेशानी की बस एक शुरुआत है. यह तो नहीं बताया जा सकता है कि ऑक्सीजन के अभाव में कितने लोगों की जान जा चुकी है लेकिन समय पर अगर ऑक्सीजन मिल गई होती तो बहुत से लोगों की जान बचाई जा सकती थी.

धीमी गति से काम करने वाली सरकारी नौकरशाही नींद से तब जागी जब संकट उसके मुंह के सामने आकर खड़ा हो गया. उसे एहसास हुआ कि देश के पूर्वी हिस्सों के औद्योगिक केंद्रों से अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचने में अभी कई दिन लग जाएंगे. 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल तक कोविड से प्रभावित 6 राज्यों में आपूर्ति में कमी आने की आशंका बताई (देखें ग्राफिक: ऑक्सीजन चेतावनी). उत्तर प्रदेश, जहां मांग और आपूर्ति के बीच 400 टन का अंतर है, शायद सबसे ज्यादा प्रभावित था. ऑक्सीजन पहुंचाने वाले ट्रकों की आवाजाही की रफ्तार तेज करने के लिए हिंडन स्थित भारतीय वायु सेना के एयरलिफ्ट स्क्वाड्रन से सी-17 ग्लोबमास्टर्स ने खाली ऑक्सीजन ट्रकों को पूर्वी भारत की ऑक्सीजन फैक्टरियों तक पहुंचाया. विदेश मंत्रालय ने चिकित्सा सहायता के लिए दूसरे देशों में एसओएस भेजे. इस सहायता की सूची में क्रायोजेनिक ऑक्सीजन टैंक, सिलिंडर और ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर शामिल हैं. लेकिन दुख से बेहाल रिश्तेदारों के लिए अब तक बहुत देर हो चुकी थी. वर्मा कहते हैं, "मेरी साली की जान बचाई जा सकती थी. उन लोगों ने उनकी हत्या कर दी."

तूफान से पहले शांति

1 मार्च, 2021 को, भारत ने 12,286 नए मामले दर्ज किए. यह कोविड -19 ग्राफ में एक गिरावट थी, जो वर्ष की शुरुआत से ही सपाट थी. ऐसा लग रहा था, महामारी दूर जा रही है. भारत वापस सामान्य हो रहा था. महामारी की पहली लहर के दौरान देश भर में स्थापित किए गए चिकित्सा सुविधाओं को बंद करना शुरू कर दिया गया था. उदाहरण के लिए, फरवरी 2021 में, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले साल जून में दक्षिण दिल्ली के छतरपुर में राधास्वामी सत्संग व्यास में बनाए गए दुनिया के सबसे बड़े 10,000 बिस्तरों वाले कोविड केंद्र को बंद कर दिया था. 26 मार्च को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की थी.

फिर, 6 अप्रैल को भारत में सिर्फ 24 घंटों में 1,15,000 संक्रमण के मामले आ गए, महामारी की शुरुआत के बाद से यह सबसे बड़ा दैनिक मामलों का रिकॉर्ड था. कोविड सूनामी की लहरें दस्तक देने लगी थीं.

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