टीका संकट
India Today Hindi|April 28, 2021
कोविड की घातक दूसरी लहर ने लगता है भारत की उत्साही वैक्सीन रणनीति की पोल खोलकर रख दी है. आखिर कमी कहां रह गई और इसे वापस पटरी पर कैसे लाया जाए
सोनाली आचार्जी, साथ में पी.बी.जयकुमार

कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर देश में एक भीषण ज्वार की तरह उभरी है. दो हफ्तों के भीतर प्रतिदिन के संक्रमण के मामले एक लाख के आंकड़े को पार कर गए जो पहली लहर की तुलना में लगभग पांच गुना तेज गति है. एक अन्य डरावनी चीज प्रमुख महानगरों के अस्पतालों में दिख रही है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के 50 अस्पतालों में आइसीयू और वेंटिलेटर बेड पिछले सप्ताह ही भर गए थे. नए मामलों में 40 फीसदी से ज्यादा का योगदान करने वाले महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लोगों के घूमने-फिरने और आर्थिक गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के लिए 'जनता लॉकडाउन' लगाना पड़ा. इस बीच नौ अन्य प्रमुख राज्यों में संक्रमण में खतरनाक वृद्धि दिखी है और देश भर में मिनी लॉकडाउन का खतरा मंडराने लगा है. इससे नाजुक स्थिति से गुजरने के बाद हाल के महीनों में कुछ सुधार की ओर बढ़ी देश की आर्थिक गतिविधियों पर फिर से संकट के बादल मंडराने लगे हैं.

सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला कहती हैं, "यह लहर शहरों में दौड़ रही है. अफरातफरी मची है और दहशत का माहौल है." इस हालत के लिए पूरी तरह भारत ही जिम्मेदार है. 2020 के अंत तक संक्रमण के मामलों में भारी गिरावट के कारण, केंद्र और राज्य सरकारों ने अपनी निगरानी कम कर दी और जनता भी लापरवाह हो गई. हरिद्वार में कुंभ जैसे बड़े स्तर के सार्वजनिक समारोहों और चुनावी राज्यों में बड़ी चुनावी रैलियों को अनुमति देने के अलावा, पहली लहर के सुस्त पड़ने के संकेत मिलने के बाद प्रतिबंधों में दी गई ढील के बाद कोविड-सतर्क व्यवहार को लेकर लोगों में बहुत लापरवाही दिखने लगी. महामारी को लेकर लोगों की लापरवाही का आलम यह था कि मास्क उतार फेंकने समेत सारी सावधानियों को हवा में इस तरह उड़ा दिया मानों महामारी अब पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हो. यह सब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की दूसरी और यहां तक कि तीसरी लहरों के प्रत्यक्ष प्रमाणों, जो पहले की तुलना में अधिक घातक थे, के बावजूद हो रहा था. लगता है कि मौजूदा उछाल के दौरान भारत में वायरस मजबूत और ज्यादा घातक स्ट्रेन में बदल गया है. उदाहरण के लिए, पुणे में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआइवी) की ओर से जनवरी से मार्च तक महाराष्ट्र से लिए गए 361 नमूनों में से 61 प्रतिशत में डबल म्यूटेंट (B.1.617) स्ट्रेन पाया गया. दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया बताते हैं, "ये नए स्ट्रेन पिछले साल के मुकाबले कहीं संक्रामक हैं."

संक्रमण के विस्फोट के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने अल्पकालिक उपाय शुरू किए, जिसमें मरीजों के उपचार के अलावा वायरस के लिए ट्रैकिंग और परीक्षण शामिल हैं. लेकिन दूसरी लहर ने इस बात की पोल खोल दी कि टीके के विकास और उत्पादन में अच्छी शुरुआत के बावजूद अपनी टीकाकरण रणनीति को लेकर देश ने भारी अदूरदर्शिता का परिचय दिया है. कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण एक व्यक्ति को संक्रमित होने से रोक सकता हो या नहीं, लेकिन कई अध्ययनों से पता चला है कि यह वायरस के हमले की तीव्रता को कम कर देता है जिससे अस्पतालों में भर्ती होने की नौबत और मृत्यु की आशंका कम हो सकती है. टीके संक्रमण की लहरों को धीमा करने के लिए आबादी के बीच हर्ड इम्यूनिटी (सामूहिक रोग प्रतिरोधक शक्ति) बनाने में महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये लहरें लौट सकती हैं.

केंद्र सरकार का दावा है कि 16 जनवरी को टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद से 11 करोड़ से ज्यादा लोगों को टीका लगाया जा चुका है, लेकिन तथ्य यह भी है हमारी आबादी के 7.9 प्रतिशत से कम का टीकाकरण किया गया है जबकि अमेरिका में यह औसत 57 प्रतिशत और ब्रिटेन में 60 प्रतिशत है. इससे भी बुरी बात यह है कि महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने टीकों की कमी की शिकायत की, केंद्र ने भी आंकड़े दिए कि स्टॉक में 3 करोड़ से अधिक खुराक थी और राज्यों को ही उनकी खराब योजना और वितरण के लिए दोषी ठहराया.

एक दूसरे पर दोषारोपण को अगर परे कर दें तो इसमें कोई शक नहीं है कि भारत एक टीका आपातकाल का सामना कर रहा है. देश को हर्ड इम्यूनिटी हासिल करने के लिए 75 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण करना होगा. टीकाकरण की वर्तमान दर को देखते हुए यह लक्ष्य 2022 की गर्मियों तक ही पूरा हो पाएगा. विशेषज्ञों का कहना है कि आदर्श स्थिति के लिए अगले तीन महीनों में ऐसा कर दिखाना होगा. इसका मतलब है कि भारत को प्रतिदिन 40 लाख लोगों के टीकाकरण की मौजूदा क्षमता को बढ़ाकर 2 करोड़ प्रतिदिन करना होगा, यानी पांच गुणा वृद्धि की जरूरत है. अगर हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो निश्चित रूप से मौजूदा लहर के बाद एक तीसरी लहर आएगी.

चूंकि कोवैक्सीन को सार्वजनिक क्षेत्र की लैब के साथ साझेदारी में विकसित किया गया इसलिए सरकार सप्लाइ बढ़ाने के लिए इसके उत्पादन का लाइसेंस दूसरी निजी फर्मों को दे सकती थी

कुछ महीने पहले की आरामदेह स्थिति से हम इस भयावह स्थिति तक कैसे पहुंच गए? टीकाकरण की गति बढ़ाने और वायरस का प्रसार रोकने के लिए हमें क्या करने की आवश्यकता है?

हम कहां चूके?

एक ऐसे देश के लिए, जिसके पास विश्वस्तर पर टीके बनाने की सबसे बड़ी क्षमता के अलावा दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण कार्यक्रम को चलाने का अनुभव है, उसे कोविड टीके के उत्पादन और इसे लोगों को लगाने के बड़े कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए प्रबंधन के स्तर पर बेहतर प्रदर्शन की जरूरत थी. हमारे पास एक अतिरिक्त फायदा भी था. पिछले साल के अंत तक जब दुनिया भर में लगभग एक दर्जन टीकों के लिए अंतिम चरण का नैदानिक परीक्षण अभी चल ही रहा था, भारत के पास पहले से ही कोविड के दो टीके-कोविशील्ड और कोवैक्सीन-निर्माण की प्रक्रिया में पहुंच चुके थे. भारत सरकार को इस का श्रेय जाता है कि एनआइवी ने एक निजी फार्मा दिग्गज भारत बायोटेक के सहयोग से कोवैक्सीन को विकसित किया. दूसरी ओर कोविशील्ड को ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी ने फार्मा की दिग्गज कंपनी एस्ट्राजेनेका के सहयोग से विकसित किया था और उन्होंने भारत सहित दुनियाभर के देशों में आपूर्ति के लिए विश्व की सबसे बड़ी टीका निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआइआइ) के साथ शुरुआत में एक अरब खुराक के निर्माण के लिए करार किया.

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