बीजापुर का रक्तपात
India Today Hindi|April 21, 2021
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के आखिरी किले को ध्वस्त करने के लिए आगे बढ़ रहे सुरक्षाबल आ गए जानलेवा हमले की चपेट में
संदीप उन्नीथन और राहुल नरोन्हा

लगभग 2,000 सुरक्षाकर्मी, 2 अप्रैल की रात ऑपरेशन के लिए छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के एक गांव तर्रेम में बने अपने कैंप से रवाना हुए. इस मिश्रित समूह में राज्य पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी), बस्तर बटालियन और माओवादियों से लड़ने वाले सीआरपीएफ के विशेष बल कोबरा के कमांडो शामिल थे. उनके पास फरार माओवादी फील्ड कमांडर, माडवी हिड़मा के एक जगह पर छिपे होने की पक्की खुफिया जानकारी थी. अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवानों के नरसंहार सहित सुरक्षाबलों पर घात लगाकर किए गए कई हमलों का जिम्मेदार हिड़मा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के सबसे घातक लड़ाकू गुट बटालियन नंबर 1 का कमांडर है. करीब 180 कुशल प्रशिक्षित लड़ाकों वाला यह ग्रुप राज्य के दक्षिणी छोर पर स्थित दोरनापाल और जगरगुंडा के गांवों के बीच 80 किलोमीटर के इलाके में सक्रिय रहता है. इस इलाके में हाल के वर्षों में माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच सबसे भीषण लड़ाई देखी गई है. ऑपरेशन की शुरुआत धीमी गति से तैनाती के साथ हुई थी. पिछले कुछ महीनों में सुरक्षाबलों ने सुकमा और बीजापुर जिलों की सीमाओं के आसपास चार नए कैंप स्थापित किए और पांच बटालियनों को तैनात कर दिया था. दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय और सीआरपीएफ के अधिकारियों की तरफ से निर्देशित ऑपरेशन ने जंगल के अंदर विशेष अभियानों के लिए केंद्रीय आतंकवाद निरोधक बल, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के उपयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा की थी.

सुरक्षाबल नए क्षेत्रों में प्रवेश करते जा रहे थे और हर नए कैंप के साथ माओवादियों की पकड़ वाले क्षेत्र का दायरा सिकुड़ता गया. एक दशक पहले जब माओवादियों का प्रभुत्व चरम पर था तो वे दक्षिणी छत्तीसगढ़ में केरल के बराबर क्षेत्र को नियंत्रित करते थे. पिछले कुछ वर्षों में सड़क निर्माण गतिविधियों में तूफानी गति की तेजी और सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ने से माओवादियों का प्रभाव अब सिमटकर, आकार में सिक्किम से थोड़े बड़े क्षेत्र में रह गया है. माओवादी नेता नंबला केशव राव उर्फ बसवराज और उसका 21 सदस्यीय पोलित ब्यूरो, जिसने 2004 के बाद से हिंसक विद्रोह को तेज कर दिया है, के बारे में माना जाता है कि वह

छह हमले, एक जैसी कहानी

सुरक्षाबलों पर बार-बार माओवादियों के बड़े समूह बरसों से एक जैसी रणनीति का इस्तेमाल करते हुए हमले कर रहे हैं. यह सब आखिर इस तरह से कैसे जारी है?

1.6 अप्रैल, 2010, दंतेवाड़ा

माओवादियों ने 15 सीआरपीएफ जवानों और राज्य पुलिस के एक कांस्टेबल को मौत के घाट उतार दिया. आंतरिक सुरक्षा के मामले में यह एक दिन में हुई सबसे बड़ी जनहानि थी. चूक कहां हुई: अधिकारी स्थानीय भूभाग से परिचित नहीं थे, जवान आदिवासी गांव में रुके और उनकी संख्या का पता चल गया, वे जिस रास्ते से आए, उसी से लौट रहे थे

2.11 मार्च, 2014, सुकमा

सीआरपीएफ के 11 जवान, चार पुलिसकर्मी और एक नागरिक की मौत सुकमा जिले के तहकवाड़ा गांव में हुई. चूक कहां हुई: सुरक्षाबलों का ध्यान खींचने के लिए तीन गाड़ियों में आग लगाई. तीन सीआरपीएफ दल बैच में आए, माओवादियों ने ऊंचे स्थान से हमला किया, 15 हथियार चुराए

3.12 मार्च, 2017, सुकमा

सड़क निर्माण के काम को सुरक्षा देने जा रहे सीआरपीएफ जवानों पर घात लगाकर हमला किया गया. 12 सीआरपीएफ जवान मारे गए. चूक कहां हुईः बाकी बचे बल ने माओवादियों पर फायर करने और जवाब देने की कोई कोशिश नहीं की

4.24 अप्रैल, 2017, सुकमा

300 माओवादियों ने सड़क मजदूरों की सुरक्षा कर रहे 99 सीआरपीए जवानों पर घात लगाकर हमला किया. हमले में 25 जवान मारे गए और 1 गंभीर रूप से घायल हुए. चूक कहां हुई: सीआरपीएफ ने निगहबानी ढीली कर दी थी. हमले हुआ तब वे सब खाना खा रहे थे

5.21 मार्च, 2020, सुकमा

छत्तीसगढ़ पुलिस के 17 जवान घात लगाकर किए हमले में मारे गए, 15 घायल हुए और 16 हथियार लूट लिए गए. चूक कहां हुई: नेतृत्व की नाकामी, तीन सुरक्षा दल तीन अलग दिशाओं में चले, जब एक पर हमला हुआ तो बाकी बचाने नहीं आए

6.3 अप्रैल, 2021, बीजापुर

घात लगाकर हुए हमले में 22 जवान शहीद, एक सीआरपीएफ जवान को माओवादियों ने बंधक बना लिया. चूक कहां हुईः खाली गांवों के चेतावनी संकेत की अनदेखी. मदद देर से पहुंची. इसी अंतिम माओवादी गढ़ में कहीं रहता है. इसलिए इस क्षेत्र में प्रवेश करने के सुरक्षा बलों के उद्देश्य के लिए बटालियन नंबर 1 और उसके कमांडर को ढेर करना जरूरी था.

योजना जोनागुडा, टेकलगुडम और जीरागांव जैसे आदिवासी गांवों में घेरने की थी. पांच दलों में से एक ने भोर में गांवों में प्रवेश किया तो एक डरावनी शांति ने उनका स्वागत किया था. वहां किसी के नहीं मिलने पर एक टीम ने बगल की पहाड़ी पर खोज शुरू की. थोड़ी देर बाद, कुछ टीमों ने तरैम के अपने कैंप की ओर लौटना शुरू किया. तभी, एक अन्य पहाड़ी से जुगाड़ से बनाए गए (इम्प्रॉवाइज्ड) रॉकेटों और एलएमजी से उनपर जोरदार हमला हुआ और वे बचने के लिए वापस गांव की ओर लौटने को विवश हुए. यह एक फंदा था. गांव के पास, नक्सलियों ने दूर तक सीध में घात की एक लंबी श्रृंखला सजा रखी थी-घात लगाकर बैठा कोई भी नक्सली आमने-सामने नहीं था और मोर्चा ज्यादा से ज्यादा जवानों को मारने की नीयत से तैयार किया गया था.

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