आसन्न खतरे की आहट
India Today Hindi|February 24, 2021
हिमालय में हिमनद खिसकने से अचानक आई बाढ़ की भारी तबाही इलाके के नाजुक पर्यावरण संतुलन की रक्षा और बेरोकटोक विकास गतिविधियों की समीक्षा करने के लिए फौरन कदम उठाने की जरूरत का एहसास दिला गई
अनिलेश एस. महाजन

उत्तराखंड के ऊंचे पर्वतों पर नंदादेवी चोटी की ढलान पर झूलते ग्लेशियर' का एक हिस्सा खिसका तो 7 फरवरी को अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालय के नाजुक पर्यावरण संतुलन से छेड़छाड़ के प्रति खतरे की घंटी बजा दी है. राज्य के चमोली जिले में जोशीमठ के ऊपर रैणी गांव के पास ग्लेशियर के अचानक टूटने से अलकनंदा नदी की सहायक नदियों धौलीगंगा और ऋषिगंगा में भारी बाढ़ के साथ गाद-मिट्टी, चट्टान नीचे की ओर बहे तो प्रमुख पनबिजली परियोजनाओं सहित रास्ते में पड़ने वाले इलाकों में भारी तबाही बरपा हो गई. कम से कम 36 लोग मारे गए और 166 से अधिक लापता हैं.

इससे जून 2013 में केदारनाथ तीर्थ के पास बादल फटने से आई बाढ़ के बाद राज्य में हुए जल प्रलय की यादें ताजा हो गईं, जिसमें लगभग 4,500 लोग मारे गए थे. हालांकि, शाम तक वैसी तबाही की आशंका कम होने लगी क्योंकि नीचे पौड़ी गढ़वाल जिले के श्रीनगर में बांध के फाटक खोल दिए गए और टिहरी बांध के फाटक बंद कर दिए गए ताकि नीचे आने वाला पानी देव प्रयाग पर अलकनंदा के संगम से गंगा में समा जाए.

बाढ़ ने एनटीपीसी की तपोवन विष्णुगाड स्थित 520 मेगावाट की पनबिजली परियोजना ध्वस्त हो गई और निर्माणाधीन ऋषिगंगा छोटी-विद्युत परियोजना, सड़कों, पुलों के साथ-साथ घरों का तो नामोनिशन ही मिट गया. लापता लोगों में से अधिकांश के इन दो बिजली परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे होने की आशंका है. टीएचडीसी इंडिया की 444 मेगावाट की पीपलकोटी और जेपी ग्रुप की 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग पनबिजली परियोजनाओं को भी भारी क्षति की रिपोर्ट मिल रही है. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ), सेना, वायु सेना और राज्य एजेंसियों की टीमें बचाव और निकासी कार्यों में लगी हुई हैं.

"आपदा परियोजनाओं की वजह से नहीं आई...और हम विकास की उपेक्षा नहीं कर सकते"

चमोली में मौजूदा आपदा से एक बार फिर हिमालय के संवेदनशील क्षेत्र में पनबिजली परियोजनाओं और दूसरी विकास योजनाओं पर सवाल खड़े हो गए हैं. लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिह रावत की राय में आपदाओं के डर से विकास को रोका नहीं जा सकता. उनसे अखिलेश पांडे की बातचीत के अंशः

• 2013 की केदारनाथ घाटी आपदा से इस आपदा के बचाव कार्य में क्या फर्क था?

यह आपदा चट्टान खिसकने और हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से हुई. यह सब दिन में हुआ, जब लोग अपनी दैनिक दिनचर्या में मशगूल थे. केदार आपदा अत्यधिक बारिश से चोराबाढ़ी ग्लेशियर के झील में पानी बढ़ने और उसके टूटने से हुई थी. वह आपदा रात के समय आई. इसलिए बचाव की गुंजाइश कम थी लेकिन आपदा का पता दो दिन बाद चला था तो उसका असर कम करने का मौका नहीं था. वर्तमान आपदा रात में आई होती तो मजदूर बच जाते क्योंकि तब वे काम पर नहीं होते.

• क्या आपदा की पूर्व-चेतावनियों को गंभीरता से लिया गया?

किसी विशेषज्ञ ने यह नहीं कहा था कि वर्तमान आपदा के क्षेत्र में कोई ऐसी नाजुक स्थिति बनी हुई है. सावधानी बरतने की तो हमेशा गुंजाइश बनी रहती है. लेकिन हैंगिंग ग्लेशियर टूट जाएगा, यह चेतावनी कभी किसी ने नहीं दी. प्राकृतिक गतिविधियों को कौन रोक सका है. हां, बचाव किया जा सकता है, जो इस दौरान किया गया तो साफ दिखा भी. जिस नंदा घुघटी क्षेत्र में यह सब हुआ, उसको लेकर कभी किसी ने ऐसी आशंका व्यक्त नहीं की.

• ऐसी घटनाओं के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना क्या संभव नहीं है?

बिलकुल संभव नहीं है. हां, कुछ कंपनियों ने संवेदनशील क्षेत्रों की साल भर सैटेलाइट निगरानी का कोई सिस्टम विकसित किया है. मैंने अधिकारियों से कहा है कि वे इन कंपनियों से मालूम करें कि वे कैसे तबाही से बचाने में मदद कर सकती हैं. कहा गया है कि ये कंपनी साल का एक-डेढ़ करोड़ रुपया फीस लेती हैं. सरकार ऐसा करार करने को तैयार है.

• क्या इस क्षेत्र की पनबिजली परियोजनाओं के लिए बने बैराज के कारण तबाही अधिक हुई?

ये पनबिजली परियोजनाएं रन ऑफ द रिवर पर बनी हैं, न कि बड़े बांध बनाकर. इनमें छोटे बैराज टनल तक पानी डाइवर्ट करने के लिए बने हैं. ऐसे में यह कहना कि इन बैराज से तबाही ज्यादा हुई, झूठी बात है. सही यह है कि तपोवन में बने एनटीपीसी के बैराज ने तो इस तबाही को बड़ी होने से बचाया है, ठीक जैसे टिहरी बांध ने 2013 की अत्यधिक बारिश के वक्त पानी की बाढ़ रोककर अधिक तबाही होने से बचाया था.

• कई पर्यावरणविद और विशेषज्ञ तो कह रहे हैं कि ये परियोजनाएं न होतीं तो तबाही नहीं होती. यह सरकारी तबाही है, ग्लेशियर को नाहक दोष दिया जा रहा है.

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