मन की बात, काम की बात
India Today Hindi|December 02, 2020
मन की बात आमने-सामने नहीं की जाती. ऐसा हो तो सुनने वाले हाथ जोड़ सकते हैं कि भाई माफ करो, तुम्हारा मन की बात करने का मन है पर हमारा मन तुम्हारे मन की बात सुनने का नहीं

बात घर बीती हो या परबीती, कुल बात इतनी-सी है कि बात दो ही प्रकार की होती हैं. एक, काम की बात, दूसरी मन की बात. यदि आप मेरी इस बात से सहमत नहीं हैं तो फिर आपकी अलग बात है.

यों तो होती दोनों बात ही हैं, लेकिन दोनों में काम और मन का बेसिक डिफरेंस होता है. जहां काम की बात में मन नहीं होता वहीं मन की बात में काम नहीं होता. असल में तो मन की बात की ही इसलिए जाती है, ताकि काम की बात न करनी पड़े.

काम की बात भले ही दो या कई तरफा होती हो, मन की बात सदैव इकतरफा ही होती है. जैसे देवी-देवता वगैरह मूड आने पर आकाशवाणी कर दिया करते थे. सरल शब्दों में कहा जाए तो मन की बात कथा-प्रवचन टाइप होती है जिसमें सवाल-जवाब का सेशन नहीं होता. मन की बात एक प्रकार का मौखिक प्रसाद होती है जिसे ग्रहण करने के लिए भक्तों को हाथों की बजाए कान फैलाने होते हैं.

काम की बात का सिर्फ एक ही विषय होता है-'काम'. काम शुरू, बात खत्म. मन की बात के साथ विषय का कोई लफड़ा नहीं होता. वाचाल वक्ता मन की बात करने पर उतर आए तो विषय में से विषय निकाल लेता है, बल्कि मन की बात बिना विषय के भी कर लेता है. वह मन की बात इतनी सफाई से करता है कि यदि उसका कोई विषय हुआ भी, तो भी सुनने वाले अंत तक पता नहीं लगा सकते कि बात हो किस विषय पर रही है.

काम की बात न अपना ढोल पीटती है न पिटवाती है. काम की बात अपने काम से काम रखती है. मन की बात का बाकायदा प्रचार-प्रसार करना होता है कि फलां तारीख को इतने बजकर इतने मिनट पर मन की बात होगी. प्रचार-प्रसार के झांसे में आकर सुनने के इच्छुक उछलने लगते हैं कि वाह, फलां तारीख को, इतने बजकर इतने मिनट पर हमारे काम की बात होगी!

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