बलई काका माइ बाप
India Today Hindi|December 02, 2020
पिताजी इतवार को और इतनी ही दूर कवि सम्मेलनों में जाते कि रात या भोर तक लौट आएं. अम्मा के डर से वे खुलकर मेरे साथ नहीं आते थे पर उनकी मौन सहमति से ही मुझे हौसला मिला
राजू श्रीवास्तव

मेंरे पिता रमेशचंद्र श्रीवास्तव मंचों पर बलई काका के नाम से जाने जाते थे. ये उनका उपनाम था. इसी से उनकी पहचान बनी. उन दिनों रमई काका और बालकवि बैरागी प्रसिद्ध थे, पर मेरे पिता काका हाथरसी से ज्यादा प्रभावित रहे. वे मंचों पर कविता पढ़ने जाते थे. लेकिन उस जमाने में कविता या हास्य की लाइन को घर वाले बड़ा असुरक्षित मानते थे. इससे रोजी-रोटी कैसे चलेगी, खर्चा कैसे चलेगा यह चिंता का विषय था. आजकल तो कवियों को अच्छा सम्मान और पैसा मिलता है. कुमार विश्वास और कुछ दूसरे लोग कवि सम्मेलनों में प्राइज को हजारों से लाखों की तरफ ले आए, लेकिन फादर के टाइम पर ये स्थिति नहीं थी. इसीलिए वे अपनी सरकारी नौकरी कभी नहीं छोड़ पाए. जब कभी इरादा बनाते तो हमारे बाबा उनको यह कहकर मना कर देते कि कवि सम्मेलनों में यहां-वहां जाकर कविता पढ़ देते हो, हार-फूल मिलता है, एक शॉल मिलती है. इससे बच्चे पलेंगे? इसलिए पिताजी इतवार के दिन ही कवि सम्मेलन में जा पाते थे, वो भी इतनी दूर कि दिन में जाएं और रात को या भोर तक लौट आएं. इसलिए वे कानपुर, लखनऊ, उन्नाव, फतेहपुर, प्रतापगढ़ या सीतापुर तक ही मंचों पर जा पाते थे.

ये छुटपने की बात बता रहे हैं हम आपको.

नौकरी की वजह से वो बंधे हुए थे. स्वतंत्र रूप से इस क्षेत्र में नहीं आ पाए. इसलिए उनकी पहचान तो बनी लेकिन सीमित एरिया तक, उस तरफ के जो खांटी कविताप्रेमी लोग हैं वे जानते हैं उनको. अवधी में ज्यादा कविता करते थे. लखनउवै में देख मेम साब, कहव तनिक हमरौ संग बैठो... इस भाषा में वो कविता करते थे.

जाहिर है कि गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश या बिहार आदि की तरफ वे गए ही नहीं. लेकिन उनके पक्के चाहने वाले थे, वो आज तक उनको याद करते हैं. एक-दो बार अम्मा ने कहा कि 'देखौ बहुत देर है गई, अभी लउटे नहीं हैं. जाव लइकै आओ, कहूं बइठे होइहैं कवि सम्मेलन के बाद'. फिर किसी दोस्त से रिक्वेस्ट करके फलानी जगह स्कूटर लेकर गए-देखा, वहां पैसा खत्म हो गया है तो बस के इंतजार में बैठे हैं ठंडी में. उनको स्कूटर पर बिठाकर घर लाए. ऐसा हमने पांच-छह बार किया होगा.

दिन में जब वे कचहरी चले जाते थे तो उनका झोला रखा होता था, जिसमें उनकी डायरी होती थी. हम ऊपर छत पर धूप में उसके पन्ने पलटते. उनके आने से पहले जल्दी-जल्दी पढ़के उसी तरह से रख देते. उनको बड़ा ध्यान रहता था कि उनकी डायरी कोई छुए नहीं. तो उसमें से कुछ लाइनें हम याद कर लेते थे. हमारे स्कूल में जब छब्बीस जनवरी या पंद्रह अगस्त पड़ते थे तो प्रिंसिपल साहब हर कक्षा में पुछवाते थे कि कोई है जो झंडारोहण के बाद गाना-वाना गाना या कविता पढ़ना चाहता हो. हम अपना नाम लिखवा देते या लिख लिया जाता. वहां उनकी कविता हम सुनाते थे. ये बात होगी, आप सोच लीजिए, यही कोई 40-42 साल पीछे की.

पिताजी कविता पाठ करते और मैं नकल करके लोगों को हंसाया करता था. लेकिन माता जी मुझसे परेशान होती थीं कि ये कौन-सा काम है. माता जी पूछती थीं, 'कल कहां गए रह्यौ बाबू?' कोई बता देता कि 'सनीमा देखके आए हैं अमिताभ बच्चन का.' माता जी कहती, 'अम्ताब् बच्चन रोटी नाई देत हैं. सनीमा हाल जाये से दाल, चावल, रोटी नाई मिलत है. हमैं रोटी चाही, बनाय-बनाय कै देहैं?' बाद में हमलोग मजाक करते थे कि 'अब अम्ताब् बच्चनै रोटी देहैं.' उन्हीं की नकल कर-कर के हमारी पेमेंट बढ़ी या उनकी डबिंग करके बहुत पैसे मिले. एक तरह से अमिताभ से पहचान बनी. अम्मा को पता नहीं था तो चिढ़ती थीं. मैं ये बातें इसलिए बता रहा हूं कि इसमें पिताजी का रोल आने वाला है. बार-बार कहतीं, 'ठीक से नंबर लाव तौ किताबें खरीदवाएं. अगर तुमका अइसै सनीमा हाल में घुसे रहना है तौ रहै देव, तब किताबन के पइसा से हम घर मा गेहूं-चावल भरवाई. लेकिन तब तक मुझे तालियों की आदत लग गई थी. अम्मा पिताजी से शिकायत करतीं, 'कुछ सुने हौ? काल फिर पिच्चर देखी गई है. कउन-सी...का नाम है मकान कि दीवार, अइसै कुछ देखके आए हैं. पता नहीं कहां देखत हैं जाइ कै.' पिताजी कहते, 'तुम मंदिर जाती हो, उधर ही कोल्ड स्टोरेज जैसा घर है. वहीं जात हैं. सिनेमाहाल है.'

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