बेपेंदी का सच
India Today Hindi|December 02, 2020
सफेद दांतों के साथ अदालत में आत्मविश्वास के साथ झूठी गवाही की सेवा देते हैं कोटरा के रामटहल. पंडिज्जी के टहलदार मुन्ना मास्साब एक मामले में उन्हें राजी करने को पधारे हैं
ज्ञान चतुर्वेदी

सुबह का समय है.

कविता में इसे सुबह की बेला कहते हैं परंतु कोटरा की इस कच्ची गली में, जिसमें दोनों तरफ अधकच्चे मकान बने हैं, हम इसे बस सुबह का समय ही बोलेंगे. ऐसी गली में उतरी सुबह के वर्णन में अलंकृत भाषा की गुंजाइश नहीं है.

तो सुबह का समय है.

इस समय अपने कच्चे-पक्के मकान के दरवाजे पर रामटहल बैठे हुए हैं. बड़ी देर से मुंह में दातुन डाले हुए हैं. उसे दांतों में दबाए हुए भी हैं, शनै-शनै चबा भी रहे हैं और इस प्रक्रिया से सतत पैदा हो रहे थूक को सामने गली में थूकते भी जा रहे हैं.उनके ठीक बगल में पानी भरा लोटा धरा है. जब वे दातुन चबा-चबाकर थक और ऊब जाएंगे तो लोटे के पानी से गली में ही कुल्ला करेंगे. अभी तो बड़ी देर से दांत साफ किए जा रहे हैं. दांत सफेद रहें तो अदालत में सफेद झूठ बोलने में एक किस्म का आत्मविश्वास बना रहता है. वैसे अभी तो दातुन चबाकर समय ही काटा जा रहा है. कुल्ला करने और अन्य नित्य क्रियाओं से निवृत्ति के पश्चात उन्हें दिन भर कोई काम नहीं है, वे अभी भी दातुन नहीं समय काट रहे हैं.

तो क्या कोई धंधा नहीं करते हैं वे?

ऐसा भी नहीं है.

यूं तो कोटरा में फालतू बैठकर सुबह से शाम कर डालने वाले बहुत-से लोग हैं. दरअसल कोटरा में रोजगार नहीं के बराबर हैं. आदमी का होना ही यहां रोजगार है. वैसे रामटहल के पास एक जमा-जमाया रोजगार भी है-झूठी गवाही देने का रोजगार. वे विशेषज्ञ किस्म के गवाह हैं. वे सच्ची लगने वाली झूठी गवाही देने के विशेषज्ञ हैं. अदालत में वे ऐसी विश्वसनीय किस्म की झूठी गवाही देते हैं कि लोग उनकी इस सेवा के लिए मुंह मांगे दाम देने को तैयार रहते हैं. कहने को उनकी कुछ छोटी-मोटी खेती भी है पर वह काम उन्होंने अब बच्चों के हवाले कर रखा है. तीन बच्चे तो लफंगे निकल गए. एक कुछ कमजोर-सा था. लफंगई की रेस में नहीं उतर सका. वही खेती देखता है.

तो रामटहल की विशेषज्ञता एकदम सच जैसी लगने वाली झूठी गवाही देने में है.

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