'कॉमेडी में मुश्किल बात कहने का माद्दा'
India Today Hindi|December 02, 2020
गुदगुदाने वाले किरदारों को संजीदगी से निभाने वाली दिग्गज अभिनेत्री और ज्वलंत मौज विषयों को कॉमिक अंदाज में लाने वाले लेखक-निर्देशक के बीच एक संजीदा संवाद
सीमा पाहवा और हितेश केवल्या

सीमा पाहवा: आप राइटर हैं, डाइरेक्टर हैं, ऐक्टर नहीं. मैं राइटर हूं, डाइरेक्टर हूं और ऐक्ट्रेस भी हूं. मेरा पलड़ा आपसे भारी हो गया. (दोनों हंसते हैं) तो हम बात करेंगे इन तीनों पर जिनसे हमारी फिल्में बनती हैं. हम शुरू करते हैं पुरानी फिल्मों से.

हितेश केवल्याः आपकी पुरानी फिल्में या मेरी पुरानी फिल्में?

सीमाः जस्ट शटअप (दोनों की हंसी). चलो, हमारे जमाने की बात करते हैं, या उससे भी पहले हमारे पैरेंट्स के दौर की. तब की फिल्मों में मुझे जो सबसे खूबसूरत चीज लगती थी वो थी कि उनमें भोलापन था और सचाई थी.टेक्नोलॉजी उतनी एडवांस नहीं थी इसलिए बहुत-सी मुश्किलों से जूझते हुए फिल्में बनानी पड़ती थीं.मुगले आजम को लीजिए, उसमें लड़ाई के सीन में टैंक लगाए गए थे. हमारी मदर बताती थीं कि बड़ी तादाद में लोग बुलाए गए थे. ऐसा नहीं था कि ग्राफिक्स से कमाल कर दिया गया था. कितना स्ट्रगल रहा होगा उतना सब कुछ क्रिएट करने में. फिर कैमरा कहां छुपाएं कि मिरर में वह न दिखे. उस संघर्ष का रिफ्लेक्शन फिल्मों में दिखाई देता है.

हितेशः मुझे लगता है कि उस समय के लोग सामाजिक जिम्मेदारी समझते थे. सिनेमा इज ए सोशल मीडियम, नॉट जस्ट ए बिजनेसयह बात उनके जेहन में सबसे ऊपर थी. उस हिसाब से आज के दौर की फिल्मों को देखें तो बीस साल बाद हमें शर्मिंदगी महसूस होगी.

सीमा: अब मिसाल के लिए लेते हैं पड़ोसन जैसी फिल्म को. या चलती का नाम गाड़ी को. प्यारी-सी फिल्म है, तीन भाई हैं और उनका स्ट्रगल है. एक गाड़ी है, गाड़ी का गैराज है. उस टाइम में लड़की ढूंढ़ना या लड़का ढूंढ़ना या शादी हो जाना बहुत बड़ा चैप्टर होता था. इसके अलावा जो कैरेक्टर्स थे वो बहुत क्लीयर थेकॉमेडियन, हीरो, विलेन, साइड कैरेक्टर. अब ये खत्म होते जा रहे हैं.

हितेश: अब ये मिक्स होता जा रहा है.

सीमा: ऐसा नहीं था कि हीरो नहीं हंसाते थे. किशोर कुमार हीरो थे तो वो ही हंसाते थे. लेकिन बैलेंस रहता था हर चीज का.

हितेशः और सिंप्लिसिटी थी इन फिल्मों में. हमारा हीरो है हमें पता है, वो सिर्फ एक मस्सा लगाके और मूंछ लगाके एक अलग कैरेक्टर बन जाता था. और दर्शक उसे स्वीकार भी करते थे. एक जो चीज होती है सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ, कि आपने कह दिया और हमने मान लिया-वो बहुत बड़ी बात थी. आज चीजों को मनवाने के लिए हमें कंप्यूटर ग्रॉफिक्स और बहुत सी दूसरी चीजों की जरूरत पड़ती है.

सीमा: आपको ज्यादा लॉजिक ढूंढ़ने पड़ते हैं. आज हम सेवेंटीज या एटीज की फिल्में देखते हैं तो हंसी आती है कि ये कैसे हो सकता है. अमर अकबर एंथोनी में मां को एक साथ तीन लोगों का ब्लड चढ़ जाना बहुत बड़ा हिट था, लेकिन बतौर एक्ट्रेस मेरी एक अलग शिकायत है: अब कॉमेडियन मां-बाप में ढूंढ़ने शुरू कर दिए गए हैं. आपने मां-बाप को नमूना बना दिया है. अरे ऐसे नहीं होते हैं मांबाप. कोई एक खास कैरेक्टर हो सकता है जो थोड़ा-सा नमूना हो. मगर क्योंकि, कुछ तो हमारा हीरो नहीं कर सकता, हीरोइन नहीं कर सकती तो हमें लगता है कि उसके साथ बैलेंस करने के लिए उसके मां-बाप को इतना फनी बना दो कि हम हंसें मां-बाप को देखकर.

हितेशः जैसे आप आज यूपी वाली मां बन चुकी हैं.

सीमाः हां, मुझ पर ठप्पा लग चुका है-यूपी की मां का मतलब सीमा पाहवा. ईस्टर्न यूपी की मां यानी बावली-सी, पता नहीं साड़ी कहां जा रही है...जिसको तैयार होने की भी जरूरत न पड़े. वो आपको चाहिए तो मुझे कास्ट कर सकते हैं क्योंकि मेरी जुबान में भी यूपी आ चुका है. आपको याद होगा, ऐसा ही दौर चला था दिल्ली की पंजाबी औरतों का जो लाउड बोलती हैं. फिर उसमें आपको लाल कपड़े पहनने पड़ेंगे, नाम होगा लवली, बबली, पिंकी.

"मुझ पर ढप्पा लग चुका है-ईरटर्न यूपी की मांयानी सीमा पाहवा, बावली-सी, साड़ी पता नहीं कहां जा रही है. मेरी जबान में भी यूपी आ चुका है.

हितेश: यूपी की मां की तरह यूपी का राइटर भी बन गया है. जैसे शुभ मंगल सावधान-जिसमें आप भी थीं-आधी दिल्ली में सेट थी, पर किसी ने दिल्ली देखी नहीं. जबकि ये पंजाबी वाली दिल्ली की नहीं एक मिडिल क्लास सरकारी मुलाजिम के घर की कहानी थी. और सेकंड हाफ में हरिद्वार सिर्फ शादी के लिए दिखाया, पर सबको उसमें यूपी दिखा. तो क्या ऑडिएंस ने ही ऐसा चश्मा चढ़ाया हुआ है ? या यह कोई ट्रेंड चल रहा है? यह ट्रेंड भी खत्म होगा, क्योंकि कोई नया ट्रेंड आकर इसको तोड़ेगा. जैसे कंटेंट. कंटेंट भी एक ट्रेंड है, ये हम बोल रहे हैं कि कंटेंट इज किंग. लेकिन इस वक्त क्या सच में ऐसा है, मुझे नहीं पता.

सीमा: अभी जब भी कोई डाइरेक्टर एप्रोच करता है तो कहता है कि हमारे पास डिफरेंट कंटेंट है. लेकिन जब आप स्क्रिप्ट पढ़ने लगते हैं तो लगता है कि जैसे यह कहानी देखी हुई है. इसमें थोड़ासा कांशस होना पड़ेगा, वर्ना बहुत जल्दी हम लोगों को बोर करना शुरू कर देंगे. जैसे, मैंने एक फिल्म बनाई रामप्रसाद की तेरहवीं, जिसमें मैंने यह कोशिश की है. आपने भी यह फिल्म देखी है. है यह भी यूपी में बेस्ड, लेकिन यूपी की कोई रेगुलर चीज इसमें नहीं है. न मां वैसी है और न ही भाई-बहन वैसे हैं.

हितेशः जब मैं लिखता हूं और मुझे लगता है कि कोई मुश्किल बात कहनी है तो मुझे कॉमेडी या ह्यूमर के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखता. दरअसल कॉमेडी बहुत ही अहम हथियार है कहानीकार के हाथ में. इसे बहुत सोच-समझ कर सुलझे तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए. मैं जब कुछ देखता हूं और हंसता हूं तो उस वक्त मैं ऐक्टर के साथ, कहानी के साथ, उस सिचुएशन के साथ एक रिलेशनशिप कायम करता हूं. उस हंसी के बाद मैं जो बात कहना चाहता हूं उसको ऐज ऐन ऑडिएंस मैं बहुत आसानी से लूंगा बावजूद इसके कि सीधी-सीधी बात कह दूं.

सीमाः आपने सही कहा कि कॉमेडी के जरिए लाइट मूड में अपनी बात कह दें, क्योंकि थका-हारा आदमी सिनेमा देखने जाता है तो वह एंटरटेन होने जा रहा है. फिर भी, बैलेंस जरूर ढूंढ़ना चाहिए.

हितेशः सीमा जी आप थिएटर, टेलीविजन और फिल्मों में भी सक्रिय रही हैं. कॉमेडी को प्रजेंट करना या कॉमेडी का एक रोल करना किस तरह से आपके लिए डिफरेंट था इन तीनों माध्यमों में.

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