खाना तो अंडाकरी है, विचार नहीं
India Today Hindi|December 02, 2020
कॉमेडी फिल्मों में एक दौर ऐसा आया जब विचार को पीछे धकेल दिया गया. विचार के अभाव में चीख-चिल्लाहट हावी हो गई. पर अब फिर से इन फिल्मों का स्तर ऊपर उठना शुरू हो गया है
सौरभ शुक्ल

सत्या के एक दृश्य में सौरभ शुक्ल (बीच में), मनोज वाजपेयी (दाएं) और अन्य कलाकार

कॉमेडी बड़ा टर्म है. अंग्रेजी में जब कॉमेडी कहा जाता तो उसका मूल अर्थ होता है सुखांत. मूलत: नाटक दो तरह से लिखे गए ट्रेजडी और कॉमेडी. कॉमेडी का मतलब जरूरी नहीं कि वो आपसे ठहाके लगवाए. फिर तरह-तरह की कॉमेडी लिखी गईं जो शैलियां बन गईं-जैसे फार्स बना, स्लैपस्टिक आया. स्लैपस्टिक यानी स्टिक से स्लैप. मैंने एक दिलचस्प किस्सा पढ़ा है. स्लैपस्टिक कॉमेडी में उछलकूद बहुत होती है और चेहरे बहुत बनाए जाते हैं. ब्रिटिश आर्मी में जब स्टिक लेकर किसी सैनिक को मारते थे तो वह जिस तरह से उछलता था, कूदता था, वह देखने में बड़ा हास्यास्पद लगता था पर उससे बहुत दुख होता था. हिस्टोरिकली ये कितना सही है, मैं नहीं जानता.

ह्यूमर में आप दूसरे की विसंगतियों पर उसकी कमजोरियों पर हंसते हैं, या उसकी सिचुएशन पर हंसते हैं. यहां आप दूसरे पर हंस तो सकते हैं लेकिन उसकी परिस्थिति के कारण उसे हीन नहीं मानते.मसलन, बच्चे किसी मोटे आदमी को देखकर बुलाते हैं, ओ मोटे! पैरेंट्स इस पर टोकते हैं क्योंकि यह बदतमीजी है. पर एक मोटे आदमी की कहानी और उसकी मुश्किलों की बात हो तो स्थितियों से हास्य उभरता है. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि हास्य वह है जो दूसरे की बेइज्जती न करे. पात्र अपने आप पर हंस सके तो यह बड़ी बात है.

व्यंग्य या सेटायर कॉमेडी का ही एक तीसरा पार्ट है, जिसमें आप व्यक्ति या समाज की किसी विसंगति को लेकर एक हास्य उत्पन्न करते हैं. आप सीधे-सीधे नारा नहीं लगा रहे पर नारे में जो कहना चाहते हैं उसी को हंसते-खेलते कह देते हैं. व्यंग्य निजी स्तर पर भी है पर मेरे ख्याल से कभी इतना इस्तेमाल नहीं किया गया. हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल सरीखे मशहूर व्यंग्यकारों के लेखन में आप देखेंगे कि उसमें सामाजिक, राजनैतिक ढांचे को लेके कोई एक बात कही गई है. सेटायर उसका एक खास हिस्सा है. हिंदुस्तानी सिनेमा में एक कमाल का सेटायर बना, वह फिल्म थी जाने भी दो यारो, वह आपको हंसाता है, व्यंग्य करता है. लेकिन अंत में दुखांत हो जाता है. ऐसा कोई कठोर नियम नहीं है कि कॉमेडी में दुखांत आप नहीं ही लिख सकते. अच्छा काम करने वालों ने वह लाइन धुंधली कर दी है.

हमारे यहां हर तरह का काम होता रहा है. अच्छे काम को हमेशा आप अच्छा कहेंगे. बिमल राय की एक बड़ी मजेदार फिल्म है परख. एक छोटा-सा गांव है. खासे अमीर मोतीलाल भेस बदलकर डाकिया बने हैं, जो पोस्टमास्टर नाजिर हुसैन के अधीन काम करते हैं. वे यह पता लगाने की कोशिश में हैं कि गांव के विकास के लिए मोटी रकम किसे देना ठीक होगा. यह पता चलते ही लोग युक्तियां निकालकर दावेदार बनने की कोशिश करने लगते सबका अलग ही व्यक्तित्व निकलना शुरू होता है. यानी पैसा कैसे उन्हें बदलता है. आप उसे देखते और हंसते रहते हैं.

हमारे यहां तो कमाल की कॉमेडी फिल्में बनी हैं. लेकिन बाद में ऐसा दौर आया जहां विचार को पीछे धकेलते गए और ऑडिएंस के नाम पर परची फटती रही. कहा गया कि ऑडिएंस को पसंद नहीं. ऐसे फिल्ममेकर्स आ गए जो दूसरों पर हंस सकते थे, खुद पर नहीं. उन्होंने ऐसी फिल्में बनाई जिसमें बेइज्जती का पुट होता है. 'ओ टकलू, ओ लंगड़े, ओ लूले! उन दिनों ऐसे संवाद चले. समाज में ऐसे लोग भी हैं जो इनका बुरा नहीं मानते. सत्तर के अंत के दशक और अस्सी-नब्बे के दशक में यह खूब हुआ. कोई मोटा किरदार भाग रहा है, या गंजे आदमी के सर पे अंडा गिर गया. यह सब चला. एक और दौर रहा जिसमें टीवी शामिल रहा. मार्केट से कॉमेडी परोसने की मांग थी. अब चूंकि सोच के नहीं किया जा रहा था तो हंसी तो आती नहीं थी. इससे ऐक्टर्स पर बहुत जोर आया. पर आप देखें कि इनमें विचार था नहीं. और हंसी तो विचार पर ही आती है. तो बाद में जरा मुश्किल हो गया. आप देखिए कि हृषिकेश मुखर्जी सरीखे फिल्मकार तब भी उम्दा फिल्में बना रहे थे. मैं थोक भाव में बनने वाली फिल्मों की बात कर रहा हूं, जिसमें एक्टर्स को बोला जाता था कि कुछ कर दो यार. यानी हंसा दो. पर जब टेक्स्ट ही नहीं तो एक्टर कैसे हंसाएगा? ऐसे में वह शरीर के रूप-रंग-आकार का इस्तेमाल करता था. तो ऐसी कॉमेडी अक्सर चीख-चिल्लाहट से भरी हुई थी. तो ये समय रहा काफी.

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