ममता हैं'आज' और राहुल हैं कल के नेता
Gambhir Samachar|May 16, 2021
सोनिया करें सच का सामना
एम शेखर

सोनिया गांधी जितनी जल्दी सच का सामना कर लें, कांग्रेस का भी कल्याण होगा और राहुल गांधी का भी क्योंकि ममता बनर्जी देश की राजनीति में आज हैं तो राहुल गांधी कल. कल से आशय यहां भविष्य से ही है क्योंकि राहुल गांधी के आज से बेहतर बीता हुआ कल ही था. राहुल गांधी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2009 के आमचुनाव में ही देखने को मिला है जब यूपी में वो कांग्रेस की सीटें बढ़ा कर समाजवादी पार्टी और बीएसपी के करीब ला खड़ा किये थे. बाद में तो हार का ही ठप्पा लगता गया और ये सिलसिला हाल के विधानसभा चुनावों में भी थम नहीं सका.

सोनिया गांधी ने एक समझदारी जरूर दिखायी कि जी-23 की तरफ से कोई कड़ी टिप्पणी आने से पहले ही विधानसभा चुनावों में हार पर अपनी बात कह दी. सोनिया गांधी ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बहुत ही बुरी हार को अप्रत्याशित बताया है. समझा जाये तो सोनिया गांधी को ऐसी उम्मीद नहीं थी. तमिलनाडु में तो कांग्रेस का प्रदर्शन कोई बुरा नहीं लगता, लेकिन केरल में अपनी सरकार बनाने की उम्मीद जरूर रही होगी. केरल में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद थी और कांग्रेस को लग रहा होगा कि बीजेपी को तो वो पछाड़ ही देगी. असम में राहुल गांधी से भी ज्यादा तो प्रियंका गांधी वाड्रा ने मेहनत की, लेकिन सारा एक्सपेरिमेंट फेल रहा. मुश्किल ये है कि राहुल गांधी की तरह प्रियंका गांधी वाड्रा पर भी अब नाकामी का ठप्पा बढ़ता जा रहा है. प्रियंका गांधी के लिए इससे भी बड़ी नाकामी क्या होगी कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी होते हुए भी वो अमेठी में राहुल गांधी की हार नहीं टाल सकी. अगर राहुल गांधी भी ममता बनर्जी की तरह एक ही सीट से चुनाव लड़ने की जिद किये होते तो क्या हाल होता. ममता बनर्जी ने तो पार्टी को जिताने के लिए ही खुद की हार का सबसे बड़ा जोखिम उठाया था. वरना, पहली बार में ही सोमनाथ मुखर्जी जैसे दिग्गज को शिकस्त देने वाली ममता बनर्जी भला नंदीग्राम में अपनी हार का सबसे बड़ा रिस्क क्यों लेती?

ममता बनर्जी ने नंदीग्राम हार कर एक पैर से बंगाल ही नहीं जीता है, दोनों पैरों से दिल्ली जीतने की तरफ भी जल्दी ही रफ्तार भरने की तैयारी कर रही होंगी. देखा जाये तो ममता बनर्जी भी उसी मोड़ पर आ खड़ी हुई हैं, जिस पर 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खड़े थे और राष्ट्रीय स्तर पर वो भी तब नये सिरे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज करने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन ममता बनर्जी और नीतीश कुमार की राजनीति में बड़ा ही बुनियादी फर्क है नीतीश कुमार वो मुकाम आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाने के बाद ही हासिल कर पाये थे, लेकिन ममता बनर्जी ने उन्हीं मोदी और अमित शाह को अकेले शिकस्त दी है. ममता बनर्जी का साथ जिसे छोड़ना था, पहले ही छोड़ चुका है. फिलहाल तो ममता बनर्जी को नीतीश कुमार जैसा टेंशन कतई नहीं है, जैसा वो लालू प्रसाद और महागठबंधन छोड़ने से 10-20 बार पहले जरूर सोचे होंगे. अब ममता बनर्जी को वही छोड़ सकता है जिसे खुद कोई बड़ा लालच न हो या फिर कोई उसे दिला पाये. आज तक के सीधी बात बात में कांग्रेस के सीनियर होने के साथ साथ फिलहाल सोनिया गांधी के करीबी हो चुके कमलनाथ से मौजूदा दौर का महत्वपूर्ण सवाल पूछा गया आपको क्या लगता है कि ममता बनर्जी को विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए लीडरशिप देनी चाहिए?

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