हिमता बिस्व सरमा- बीजेपी के नये पॉलिटिकल टूलकिट के सैंपल!
Gambhir Samachar|May 16, 2021
हिमंता बिस्व सरमा उन नेताओं के लिए रोल मॉडल बन गये हैं, जो अपनी मातृसंस्था छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन कर चुके हैं या फिर जहां भी हैं वहीं से ऐसा करने की सोच रहे हैं. वकालत के पेशे से 15 साल कांग्रेस और 5 साल बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहने के बाद असम के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने जा रहे, हिमंता बिस्व सरमा सपनों के उड़ान का खुशनुमा एहसास लगते हैं, सपनों को हकीकत में बदलने वाली कामयाबी की दास्तां लगते हैं और अपने जैसे तमाम नेताओं के लिए उम्मीदों की नयी किरण बिखेर रहे हैं.
एम शेखर

हिमंता बिस्व सरमा निराश हो चुके मुकुल रॉय और टॉम वडक्कन जैसे नेताओं का आत्मविश्वास बढ़ाने वाली शख्सियत बन गये हैं.शुभेंदु अधिकारी और हाल फिलहाल बीजेपी ज्वाइन करने वाले नेताओं के लिए वो आशा की किरण नजर आ रहे होंगे और बकाये के भुगतान का बेसब्री से इंतजार कर रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं के लिए सकारात्मक सोच की वजह बन गये हैं. ऐसा भी नहीं कि हिमंता बिस्व सरमा को बैठे बिठाये अच्छे कर्मों का फल मिल गया है, बल्कि उसके लिए सरमा ने साम, दाम, दंड और भेद जैसे सियासी हथियारों और औजारों की बदौलत अपना हक और हिस्सा हासिल किया है.

मान लेते हैं कि देर से ही सही, हिमंत बिस्व सरमा को बीजेपी से एक्सचेंज ऑफर में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली है, लेकिन बीजेपी भी कोई कच्ची गोटी तो खेलती नहीं कुछ भी करने से पहले सौ बार सोच विचार होती है और तब कहीं जाकर तमाम पेंच फंसाते हुए ऐसे फैसले लिये जाते हैं जिनसे प्रभावित होने वाले को फायदा मिले न मिले एक उम्मीद जरूर बन जाये कि कभी न कभी फायदा मिल तो सकता ही है.

ऐसा लगता है हिमंता बिस्व सरमा, बीजेपी के 'अच्छे दिनों...' के लेटेस्ट वर्जन वाले पॉलिटिकल-टूल-किट के सैंपल के तौर पर पेश किये गये हैं अब तो ये भी लगता है कि मोदी-शाह के नये एक्शन प्लान से बीजेपी विरोधी राजनीतिक दलों में नये सिरे से भारी तोड़-फोड़ की आशंका तेज रफ्तार पकड़ने वाली है. आइये, अब ये समझने की कोशिश करें कि बीजेपी के लेटेस्ट पॉलिटिकल टूल किट में और क्या क्या हो सकता है और आने वाले दिनों में वे किस रूप में दिखायी पड़ सकते हैं "

• ब्रांड मोदी पर निर्भरता कम करने की कोशिश मुमकिन है: आपको याद होगा दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद संघ के मुखपत्र में एक लेख छपा था बाकी बातों के अलावा बीजेपी को दिये गये सुझावों का लब्बोलुआब यही था कि पार्टी को स्थानीय स्तर पर नेताओं की नयी पौध खुद ही तैयार करनी होगी मोदी-शाह हैं तो चुनाव जिता ही देंगे, ऐसी मानसिकता को छोड़ कर आगे बढ़ना होगा. 2019 के आम चुनाव के बाद से देखें तो बिहार को छोड़ कर ब्रांड मोदी झारखंड और दिल्ली दोनों ही जगह पूरी तरह फेल रहा रघुबर दास की हालत तो पहले से ही सबको मालूम थी.ये अमित शाह ब्रांड मोदी पर भरोसा ही था कि वो गठबंधन साथी सुदेश महतो की जरा भी परवाह करते नहीं दिखे और सरयू राय को भी घास नहीं डाली, लेकिन नतीजा क्या हुआ. असम और पुदुचेरी को छोड़ दें तो बीजेपी को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में ये कमी ठीक से महसूस हुई है ऐसे में लगता है कि आगे से बीजेपी में राज्यों में संगठन को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश हो सकती है.

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