कोरोना काल में आयुर्वेद की ओर आत्मनिर्भर भारत
Gambhir Samachar|May 01, 2021
आयुर्वेद प्राकृतिक एवं समग्र स्वास्थ्य की पुरातन भारतीय पद्धति है. संस्कृत मूल का यह शब्द दो धातुओं के संयोग से बना है आयुः + वेद 'आयु' अर्थात लम्बी उम्र (जीवन) और 'वेद' अर्थात विज्ञान.अतः आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ जीवन का विज्ञान है.
पण्डित पीके तिवारी

जहाँ एलोपैथिक दवा बीमारी होने की मूल कारण पर ना जाकर इसको दूर करने पर केंद्रित होती है वहीं आयुर्वेद हमें बीमारी होने की मूलभूत कारणों के साथ-साथ इसके समग्र निदान के विषय में भी बताता है. प्रारंभ से भारत में आयुर्वेद की शिक्षा मौखिक रूप से गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ऋषियों द्वारा दी जाती रही है. पर लगभग 5000 साल पहले इस ज्ञान को ग्रंथों का रूप दिया गया. चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय आयुर्वेद के पुरातन ग्रंथ हैं. इन ग्रंथों में सृष्टि में व्याप्त पंच महाभूतों-पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश तत्वों के मनुष्यों के ऊपर होने वाले प्रभावों तथा स्वस्थ एवं सुखी जीवन के लिए उनको संतुलित रखने के महत्ता को प्रतिपादित किया गया है. आयुर्वेद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति पर इन पांच तत्वों में से कुछ तत्वों का अन्य तत्वों की तुलना में अधिक प्रभाव होता है. आयुर्वेद इन संयोगों को तीन दोषों के रूप में वर्गीकृत करता है-

वात दोष-जिसमें वायु और आकाश तत्त्वों की प्रधानता हो.

पित्त दोष-जिसमें अग्नि तत्त्व की प्रधानता हो.

कफ दोष-जिसमें पृथ्वी और जल तत्त्वों की प्रधानता हो.

इन दोषों का प्रभाव न केवल व्यक्ति की शारीरिक संरचना पर होता है बल्कि उसकी शारीरिक प्रवृत्तियों (जैसे भोजन का चुनाव और पाचन) और उसके मन और भावनाओं पर भी होता है. उदाहरण के लिए कफ प्रकृति के मनुष्यों का अधिक वजन वाला होना, उनकी पाचन का अन्य प्रकृति के मनुष्यों की तुलना में धीमा होना, उनकी तेज याददाश्त और भावनात्मक रूप से उनमें स्थिरता का होना पृथ्वी तत्त्व की प्रधानता के कारण होता है. अधिकांश व्यक्तियों की प्रकृति में किन्हीं दो दोषों का संयोग होता है. जैसे पित्त-कफ प्रकृति वाले मनुष्य में पित्त और कफ दोनों दोषों का प्रभाव देखा जाता है पर पित्त दोष की प्रधानता देखी जाती है. अपनी शारीरिक संरचना और प्रकृति के ज्ञान की समझ से हम इन तत्वों को संतुलित और स्वयं को स्वस्थ रखने की दिशा में आवश्यक कदम उठा सकते हैं.

कोरोना महामारी से जब पूरी दुनिया आक्रांत है तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना से लड़ने में आयुर्वेद की भूमिका को न केवल सराहा है बल्कि आयुर्वेदिक औषधियों के वैज्ञानिक प्रमाणन की जरूरत पर भी जोर दिया है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि दुनिया के तमाम देशों ने कोरोना महामारी के दौरान भारत के सदियों पुराने आयुर्वेद के सिद्धांतों को भी अपनाया है. आयुर्वेद के विद्वानों के लिए यह बेहद पुरसुकून और गौरवमयी बात है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह योग और योग दिवस को दुनिया में प्रतिष्ठित किया, वैसा ही कुछ वे आयुर्वेद के साथ भी करेंगे. परंपरागत वैद्य संघ के 23 हजार परंपरागत वैद्यों द्वारा प्रधानमंत्री की राय का स्वागत किया जाना तो कमोबेश इसी ओर इशारा करता है. भारत में अनेक आयुर्वेद ग्रंथों और सिद्धांतों का लिखित संसार है. बहुत सारे ग्रंथ मुगल शासकों ने नष्ट कर दिए थे. नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में लगी आग ने भारत के दुर्लभ ज्ञानविज्ञान को नष्ट करने का काम किया था. अंग्रेजों की दासता के दौरान भी बहुत सारे आयुर्वेदिक ग्रंथ नष्ट हुए.

इसमें संदेह नहीं कि भारत ने दुनिया को स्वास्थ्य का ज्ञान दिया. 'विषस्य विषमौषधं' का प्रथम प्रतिपादन भी भारत ने ही किया था. प्लाज्मा थेरेपी या चमगादड़ से कोरोना वायरस रोधी वैक्सीन के उत्पादन की परिकल्पना के मूल में भी भारत का 'विषस्य विषमौषधं' अर्थात विष ही विष की औषधि होती है का सिद्धांत ही प्रमुख है. आचार्य सुश्रुत ने तो यहां तक कहा था कि जो रोग जहां पैदा होता है, उसकी औषधि भी वहीं पैदा होती है. गड़बड़ी जहां होती है, उसका इलाज भी वहीं होता है. आचार्य सुश्रुत ने अपने गुरु से यह भी कहा था कि उन्हें एक भी पौधा, एक भी वनस्पति और घास ऐसी नजर नहीं आती जिसमें कोई न कोई औषधीय गुण न हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विषम कोरोना काल में आयुर्वेद व हर्बल की प्रशंसा कर देश-विदेश में मौजूद आयुवेर्दाचार्यों व हर्बल थेरापिस्टो का दिल जीत लिया है. आयुर्वेदिक औषधियों के वैज्ञानिक प्रमाणन पर जोर देकर उन्होंने इस बात का संकेत दिया है कि यह देश अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धति के गौरवशाली दिनों को न केवल याद करता है बल्कि उसे लौटाने की दिशा में भी आगे बढ़ने वाला है.

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